शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयपटलः। (८५) आसन करनेसे नाडी शुद्ध होतीहै परन्तु यह चार आ- सनसे वायु धारण करके बैठनेमें कष्ट नहीं होता और प्रधान नाडी शीघ्र वश होजाती है ॥ १०० ॥ १०१ ॥ मूलम्–योनिं संपीड्य यत्नेन पादमूलेन सा- धकः ॥ मेढ्रोपरि पादमूलं विन्यसेद्योग- वित्सदा ॥ १०२ ॥ ऊर्ध्वं निरीक्ष्य भ्रूम- ध्यं निश्चलः संयतेन्द्रियः ॥ विशेषोऽवक्र कायश्च रहस्युद्वेगवर्जितः ॥ एतत्सिद्धा- सनं ज्ञेयं सिद्धानां सिद्धिदायकम् ॥१०३॥ टीका–योगवेत्ता साधक पादमूल अर्थात् एडीसे योनिस्थानको पीडित करे और दूसरे पादके एडीको मेढ्र अर्थात् लिंगके मूलस्थानपर रक्खे और ऊपर भ्रूके मध्यमें निश्चल दृष्टि रक्खे जितेन्द्रियपुरुष विशेष सीधा शरीर करके विधानपूर्वक वेगवर्जित सावधान होके बैठे इसको सिद्धासन कहते हैं यह आसन सिद्धों- को सिद्धि देनेवालाहै ॥ १०२ ॥ १०३ ॥ मूलम्–येनाभ्यासवशाच्छीघ्रं योगनिष्पत्ति माप्नुयात् ॥ सिद्धासनं सदा सेव्यं पवना- भ्यासिना परम् ॥ १०४ ॥ .टीका–इस अभ्याससे जो पहिले कहाहै शीघ्र योग-