भारतकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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पृष्ठ 88

( ८४ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । पुरुष दूसरा कामदेव होजायगा अर्थात् कामदेवके समान शोभितहोगा और उसको क्षुधा तृषा निद्रा मूर्च्छा कभी न उत्पन्न होगी ॥ ९७ ॥ मूलम्-अनेनैव विधानेन योगीन्द्रोऽवनिम- ण्डले ॥ भवेत्स्वच्छन्दचारी च सर्वाप- त्परिवर्जितः ॥ ९८ ॥ न तस्य पुनरावृत्ति- र्मोदते ससुरैरपि ॥ पुण्यपापैर्न लिप्येत एतदाचरणेन सः ॥ ९९ ॥ टीका-इस विधानसे योगी संसारमें सर्व दुःखसे रहित होके स्वेच्छाचारी होजायगा और इस आचर- णसे योगी पुण्यपापमें लिप्त नहीं होगा न फिर संसा- रमें उसका जन्म होगा और देवतोंके साथ आनन्दपूर्वक विचरेगा ॥ ९८ ॥ ९९ ॥ मूलम्-चतुरशीत्यासनानि सन्ति नानावि- धानि च ॥ १०० ॥ तेभ्यश्चतुष्कमादाय मयोक्तानि ब्रवीम्यहम् ॥ सिद्धासनं ततः पद्मासनञ्चोग्रं च स्वस्तिकम् ॥ १०१ ॥ टीका-बहुत प्रकारके चौरासी आसनहैं उनमें उत्तम जो चार आसन हैं, उनको हम कहतेहैं, सिद्धासन, पद्मासन, उग्रासन,स्वस्तिकासन.तात्पर्य यह है कि, और