भारतकोश
संग्रह पर लौटें

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

( ८४ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । पुरुष दूसरा कामदेव होजायगा अर्थात् कामदेवके समान शोभितहोगा और उसको क्षुधा तृषा निद्रा मूर्च्छा कभी न उत्पन्न होगी ॥ ९७ ॥ मूलम्-अनेनैव विधानेन योगीन्द्रोऽवनिम- ण्डले ॥ भवेत्स्वच्छन्दचारी च सर्वाप- त्परिवर्जितः ॥ ९८ ॥ न तस्य पुनरावृत्ति- र्मोदते ससुरैरपि ॥ पुण्यपापैर्न लिप्येत एतदाचरणेन सः ॥ ९९ ॥ टीका-इस विधानसे योगी संसारमें सर्व दुःखसे रहित होके स्वेच्छाचारी होजायगा और इस आचर- णसे योगी पुण्यपापमें लिप्त नहीं होगा न फिर संसा- रमें उसका जन्म होगा और देवतोंके साथ आनन्दपूर्वक विचरेगा ॥ ९८ ॥ ९९ ॥ मूलम्-चतुरशीत्यासनानि सन्ति नानावि- धानि च ॥ १०० ॥ तेभ्यश्चतुष्कमादाय मयोक्तानि ब्रवीम्यहम् ॥ सिद्धासनं ततः पद्मासनञ्चोग्रं च स्वस्तिकम् ॥ १०१ ॥ टीका-बहुत प्रकारके चौरासी आसनहैं उनमें उत्तम जो चार आसन हैं, उनको हम कहतेहैं, सिद्धासन, पद्मासन, उग्रासन,स्वस्तिकासन.तात्पर्य यह है कि, और

तृतीयपटलः। (८५) आसन करनेसे नाडी शुद्ध होतीहै परन्तु यह चार आ- सनसे वायु धारण करके बैठनेमें कष्ट नहीं होता और प्रधान नाडी शीघ्र वश होजाती है ॥ १०० ॥ १०१ ॥ मूलम्–योनिं संपीड्य यत्नेन पादमूलेन सा- धकः ॥ मेढ्रोपरि पादमूलं विन्यसेद्योग- वित्सदा ॥ १०२ ॥ ऊर्ध्वं निरीक्ष्य भ्रूम- ध्यं निश्चलः संयतेन्द्रियः ॥ विशेषोऽवक्र कायश्च रहस्युद्वेगवर्जितः ॥ एतत्सिद्धा- सनं ज्ञेयं सिद्धानां सिद्धिदायकम् ॥१०३॥ टीका–योगवेत्ता साधक पादमूल अर्थात् एडीसे योनिस्थानको पीडित करे और दूसरे पादके एडीको मेढ्र अर्थात् लिंगके मूलस्थानपर रक्खे और ऊपर भ्रूके मध्यमें निश्चल दृष्टि रक्खे जितेन्द्रियपुरुष विशेष सीधा शरीर करके विधानपूर्वक वेगवर्जित सावधान होके बैठे इसको सिद्धासन कहते हैं यह आसन सिद्धों- को सिद्धि देनेवालाहै ॥ १०२ ॥ १०३ ॥ मूलम्–येनाभ्यासवशाच्छीघ्रं योगनिष्पत्ति माप्नुयात् ॥ सिद्धासनं सदा सेव्यं पवना- भ्यासिना परम् ॥ १०४ ॥ .टीका–इस अभ्याससे जो पहिले कहाहै शीघ्र योग-

( ८६ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमता । का ज्ञान होताहै इस हेतुसे यह सिद्धासन पवनाभ्या- सीको सदा सेवनेके योग्यहै ॥ १०४ ॥ मूलम्-येन संसारमुत्सृज्य लभते परमां गतिम् ॥१०५॥ नातः परतरं गुह्यमासनं विद्यते भुवि ॥ येनानुध्यानमात्रेण योगी पापाद्विमुच्यते ॥ १०६ ॥ टीका-इस सिद्धासनके प्रभावसे साधक संसारको छोडके परमगतिको पाताहै और इससे उत्तम वा गोप्य संसारमें दूसरा आसन नहीं है जिसके ध्यानमात्रसे यो- गी सर्व पापसे मुक्त होजाताहै ॥ १०५॥१०६॥ मूलम्-उत्तानौ चरणौ कृत्वा ऊरुसंस्थौ प्रयत्नतः ॥ ऊरुमध्ये तथोत्तानौ पाणी कृत्वा तु तादृशौ ॥ १०७ ॥ नासाग्रे वि- न्यसेद्दृष्टिं दन्तमूलञ्च जिह्वया ॥ उत्तोल्य चिबुकं वक्ष उत्थाप्य पवनं शनैः ॥१०८॥ यथाशक्त्या समाकृष्य पूरयेदुदरं शनैः॥ यथा शक्त्यैव पश्चात्तु रेचयेदविरोधतः ॥ १०९ ॥ इदं पद्मासनं प्रोक्तं सर्वव्याधि- विनाशनम् ॥ दुर्लभं येन केनापि धीमता लभ्यते परम् ॥ ११० ॥

तृतीयपटलः । (८७) टीका-दोनों चरणोंको उत्तान करके यत्नसे ऊरू अर्थात् जंघापर रक्खे उसीप्रकार दोनों हाथको सीधा करके ऊरुके मध्यमें रक्खे और नासिकाके अग्रभागमें दृष्टि और दांतके मूलमें जिह्वा स्थितकरे और वक्ष अर्था- त् हृदयस्थानपर चिबुक अर्थात् ठोडी स्थापन करे और अपानवायुको उठाके प्राणको शनैःशनैः यथाशक्ति पूरक करके धारणाकरे पश्चात् धीरे धीरे रेचक अर्थात् वायुको त्यागदे इसको पद्मासन कहतेहैं यह सर्व व्याधिका ना- शक है यह आसन बहुत दुर्लभहै परंतु कोई बुद्धिमान् साधकको प्राप्त होताहै ॥१०७॥१०८॥१०९॥११०॥ मूलम्-अनुष्ठाने कृते प्राणः समश्चलति त- त्क्षणात् ॥ भवेदभ्यासने सम्यक्साध- कस्य न संशयः ॥ १११ ॥ टीका-पूर्वोक्त अनुष्ठान करनेसे उसी समय प्राण सम होके सुषुम्णामें प्रवेश करेगा अभ्याससे साधक- का वायु सम होजायगा इसमें संशय नहीं ॥ १११ ॥ मूलम्-पद्मासने स्थितो योगी प्राणापान विधानतः ॥ पूरयेत्स विमुक्तः स्यात्सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ॥ ११२ ॥ टीका-ईश्वर श्रीपार्वतीजीसे कहते हैं कि पद्मासन-

( ८८ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । स्थित योगी प्राण अपानके विधानसे वायु पूरण करेगा सो संसारबन्धसे मुक्तहोजायगा इसमें संशय नहीं है हम सत्य कहते हैं ॥ ११२ ॥ मूलम् -प्रसार्य चरणद्वन्द्वं परस्परमसंयुतं। स्वपाणिभ्यां दृढं धृत्वा जानूपरि शिरो न्यसेत् ॥ ११३ ॥ आसनोग्रमिदं प्रोक्तं भवेदनिलदीपनम् ॥ देहावसानहरणं प- श्चिमोत्तानसंज्ञकम् ॥११४॥ यएतदासनं श्रेष्ठं प्रत्यहं साधयेत्सुधीः ॥ वायुः पश्चि- ममार्गेण तस्य सञ्चरति ध्रुवम् ॥ ११५ ॥ टीका-दोनों चरणोंको संग परस्पर लम्बाकरके दोनों हाथोंसे बलसे धरे और जानु पर शिरको स्थितकरे उसको उग्रासन कहतेहैं, और पश्चिमतान भी संज्ञा है इससे वायुदीपन होताहै और मृत्युका नाशकरता है यह सब आसनोंमें श्रेष्ठ है और बुद्धिमान् इसको नित्य साधन करे तो उसका वायु पश्चिम मार्गसे अवश्य सञ्चार करेगा ॥ ११३ ॥ ११४ ॥ ११५ ॥ मूलम्-एतदभ्यासशीलानां सर्वसिद्धिः प्र- जायते ॥ तस्माद्योगी प्रयत्नेन साधये- त्सिद्धमात्मनः ॥ ११६ ॥

तृतीयपटलः । ( ८९ ) टीका-ऐसे पूर्वोक्त अभ्यासमें जो लोग तत्परहैं उन- को सर्व सिद्धि उत्पन्न होती है. इस हेतुसे यत्न करके योगी आत्माके सिद्धहोनेकी साधना करे ॥ ११६ ॥ मूलम्-गोपनीयं प्रयत्नेन न देयं यस्यकस्य चित् ॥ येन शीघ्रं मरुत्सिद्धिर्भवेद्दुःखौ- घनाशिनी ॥ ११७ ॥ टीका-यह आसन जो पहिले कहा है यत्नसे गोप- नीयहै सबको देना उचित नहीं है परंतु अधिकारीको देना योग्यहै इससे बहुत शीघ्र वायु सिद्ध होजाताहै और यह सिद्धि दुःखके समूहको नाश करने- वाली है ॥ ११७ ॥ मूलम्-जानूर्वोरन्तरे सम्यग्धृत्वा पादतले उभे ॥ समकायः सुखासीनः स्वस्तिकं तत्प्रचक्षते ॥ ११८ ॥ अनेन विधिना यो- गी मारुतं साधयेत्सुधीः ॥ देहे न क्रमते व्याधिस्तस्य वायुश्च सिध्यति ॥ ११९ ॥ सुखासनमिदं प्रोक्तं सर्वदुःखप्रणाशनम् ॥ स्वस्तिकं योगिभिर्गोप्यं स्वस्तीकरण- मुत्तमम् ॥ १२० ॥ टीका-जानु और ऊरुके मध्यमें बराबर पादको

(९०) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । ऊपर नीचे धरे और समकाय अर्थात् बराबर शरीर करके सुखपूर्वक बैठे उसको स्वस्तिकासन कहते हैं. इस विधानसे बुद्धिमान् योगी वायुका साधनकरे तो उसके शरीरमें व्याधी प्रवेश नहीं करती और उसको वायु सिद्धहोजातीहै इसको सुखासन कहते हैं यह सर्वदुःखका नाशक है यह स्वस्तिकासन योगी लोगोंको गोप्य रख- ना उचितहै इसकारणसे की उत्तम कल्याणका का- रकहै ॥ ११८ ॥ ११९ ॥ १२० ॥ इति श्रीशिवसंहितायां हरगौरीसंवादे योगाभ्यासतत्त्व- कथनं नाम तृतीयः पटलः समाप्तः ॥ ३ ॥ अथ चतुर्थपटलः । मूलम्-आदौ पूरकयोगेन स्वाधारे पूरये- न्मनः॥ गुदमेढ्रान्तरे योनिस्तामाकुंच्य प्रवर्तते ॥ १ ॥ टीका-पहिले पूरक योगविधानसे आधारपद्ममें वायुको मन सहित पूरक करके स्थित करे और गुदामे- ढके मध्यमें जो योनिस्थान है उसको यत्नसे आकुञ्चन करनेमें प्रवृत्तहोय ॥ १ ॥ मूलम्-ब्रह्मयोनिगतं ध्यात्वा कामं कन्दुक- सन्निभम्॥सूर्यकोटिप्रतीकाशंचन्द्रकोटि-

चतुर्थपटलः । ( ९१ ) सुशीतलम् ॥ २ ॥ तस्योर्ध्वं तु शिखासूक्ष्मा चिद्रूपा परमाकला ॥ तया सहितमात्मा- नमेकीभूतं विचिन्तयेत् ॥ ३ ॥ टीका-ब्रह्मयोतिके मध्यमें कामपुष्प अर्थात् काम- बाणके समान कोटिसूर्यके सदृश प्रकाश और कोटि चन्द्रमाके समान शीतल कामदेवका ध्यान करे और उसके ऊर्ध्व भागमें सूक्ष्म ज्योति शिखा चैतन्यस्वरू- पा परमाशक्तिसहित एक परमात्माका चिन्तन करै ॥ २ ॥ ३ ॥ मूलम्-गच्छतिब्रह्ममार्गेण लिंगत्रयक्रमेण वै॥ सूर्यकोटिप्रतीकाशं चन्द्रकोटिसुशी- तलम्॥४॥अमृतं तद्धि स्वर्गस्थं परमान- न्दलक्षणम्॥ श्वेतरक्तं तेजसाढ्यं सुधाधा- राप्रवर्षिणम् ॥ ५ ॥ पीत्वा कुलामृतं दि- व्यं पुनरेव विशेत्कुलम् ॥ टीका-उसी ब्रह्मयोनिसे जीव सुषुम्णा रन्ध्रद्वारा क्रमसे तीन लिङ्ग अर्थात् स्थूल सूक्ष्म कारणस्वरूपसे प्रस्थान करताहै और स्वर्गस्थ अमृत परम आनन्द- का लक्षण श्वेत रक्त-वर्ण कोटि सूर्यके सदृश तेज प्रकाश और कोटि चन्द्रमाके समान शीतल सुधाधारा-

(९२) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । वर्षी दिव्यकुलामृतको पान करके फिर योनिमंडल- में स्थित होजाताहै ॥ ४ ॥ ५ ॥ मूलम्-पुनरेव कुलं गच्छेन्मात्रायोगेन ना- न्यथा ॥ सा च प्राणसमाख्याता ह्यस्मि- स्तन्त्रे मयोदिता ॥ ६ ॥ टीका-फिर ब्रह्मयोनिसे प्राणायामयोग करके प्राण कुलमंडलमें जाताहै इस तंत्रमें जो हमने कहाहै हे देवी ! उस ब्रह्मयोनिको प्राणके समान कहते हैं ॥ ६ ॥ मूलम्-पुनः प्रलीयते तस्यां कालाग्न्यादि- शिवात्मकम् ॥ ७ ॥ योनिमुद्रा पराह्येषा बन्धस्तस्याः प्रकीर्तितः ॥ तस्यास्तु बन्धमात्रेण तन्नास्ति यन्न साधयेत् ॥ ८ ॥ टीका-फिर तीसरे बार काल अग्नि आदि शिवा- त्मक जीव प्रस्थानपूर्वकं चंद्रमण्डलमें दिव्य अमृत- पान करके फिर ब्रह्मयोनिमें लय होजाता है हे देवी ! इस बन्धको योनिमुद्रा कहते हैं केवल बन्धमात्रसे संसारमें असाध्य कोई वस्तु नहीं है अर्थात् सब सिद्ध होसक्ताहै ॥ ७ ॥ ८ ॥ मूलम्-छिन्नरूपास्तु ये मन्त्राः कीलिताः स्तंभिताश्च ये ॥ दग्धा मन्त्राः शिरोहीना

चतुर्थपटलः । (९३) मलिनास्तु तिरस्कृताः ॥ ९ ॥ मन्दा बा- लास्तथा वृद्धाः प्रौढा यौवनगर्विताः ॥ भे- दिनो भ्रमसंयुक्ताः सप्ताहं मूर्च्छिताश्च ये ॥ १० ॥ अरिपक्षे स्थिता ये च निर्वी- र्याः सत्त्ववर्जिताः॥ तथा सत्त्वेन हीनाश्च खण्डिताः शतधाकृताः ॥ ११ ॥ विधानेन च संयुक्ताः प्रभवन्त्याचिरेण तु ॥ सिद्धिमोक्षप्रदाः सर्वे गुरुणा वि- नियोजिताः ॥ १२ ॥ यद्यदुच्चरते योगी मंत्ररूपं शुभाशुभम्॥ तत्सिद्धिं समवाप्नो- ति योनिमुद्रानिबन्धनात् ॥ १३ ॥ दीक्ष- यित्वा विधानेन अभिषिच्य सहस्रधा ॥ ततो मंत्राधिकारार्थमेषा मुद्रा प्रकी- र्त्तिता ॥ १४ ॥

टीका-जो मन्त्र छिन्नरूप हैं और कीलित हैं स्तम्भि- त हैं और जो मन्त्र दग्ध हैं शिरहीन हैं मलीन हैं और जिनका अनादर है और मन्द हैं बाल हैं वृद्ध हैं प्रौढ हैं और जो यौवनगर्वित हैं और भेदित हैं भ्रमसंयुक्त हैं सप्ताहसे मूर्च्छित हैं और जो शत्रुके पक्षमें हैं निर्वीर्य हैं

( ९४ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । सत्वरहित हैं खण्डितहैं सौ खण्ड होगएहैं इस विधिसे युक्त होके साधन करनेसे शीघ्र प्रकर्ष करके सिद्ध होजायगा गुरुशिक्षासे सब सिद्ध और मोक्षप्रद होजाताहै योगीसे जो मन्त्र शुभ वा अशुभरूप उच्चा- रण होताहै सो सब योनिमुद्राके बन्धनमात्रसे सिद्ध होजाताहै विधानपूर्वक मंत्रके अधिकारार्थ गुरुको उचि- तहै कि इस योनिमुद्राके दीक्षाका अभिषेक सहस्रधा शिष्यको करे ॥९॥ १० ॥११॥ १२ ॥ १३ ॥ १४ ॥ मूलम्-ब्रह्महत्यासहस्राणि त्रैलोक्यमपि घातयेत् ॥ नासौ लिप्यति पापेन योनि- मुद्रानिबन्धनात् ॥ १५ ॥ टीका-यदि एक सहस्र ब्रह्महत्याकरके और त्रैलो- क्यकाभी घात करदे अर्थात् प्राणिमात्रका नाश करदे तो भी वह इस योनिमुद्राके बन्धमात्रसे पापमें लिप्त न होगा अर्थात् उसको पाप नलगेगा ॥ १५ ॥ मूलम्-गुरुहा च सुरापी च स्तेयी च गुरुत- ल्पगः ॥ एतैः पापैर्न बध्येत योनिमुद्रा- निबन्धनात् ॥ १६ ॥ टीका-गुरुघातक मद्यपाई चोर गुरुकी शय्यामें रमण करनेवाला ऐसे अनेक पातकसेभी साधक यो- निमुद्राके बन्धप्रभावसे बन्धायमान नहोगा ॥ १६॥

चतुर्थपटलः । ( ९५ ) मूलम्-तस्मादभ्यसनं नित्यं कर्तव्यं मोक्ष- कांक्षिभिः ॥ अभ्यासाज्जायते सिद्धिर्- भ्यासान्मोक्षमाप्नुयात् ॥ १७ ॥ टीका-इस हेतुसे मोक्षकांक्षीको उचित है कि, नित्य अभ्यास करे अभ्याससे सिद्धि होती है और अभ्यासही- से मुक्ति प्राप्त होती है ॥ १७ ॥ मूलम्-संविदंलभतेऽभ्यासाद्योगोभ्यासात्प्र- वर्तते ॥ मुद्राणां सिद्धिरभ्यासादभ्यासा- द्वायुसाधनम् ॥ १८ ॥ कालवञ्चनमभ्या- सात्तथा मृत्युञ्जयो भवेत् ॥ वाक्सिद्धिः कामचारित्वं भवेदभ्यासयोगतः ॥ १९ ॥ टीका-अभ्याससे ज्ञान प्राप्त होताहै और अभ्याससे योगमें प्रवृत्ति होती है और अभ्याससे मुद्रा सिद्ध होती हैं और अभ्याससे वायुका साधन होताहै और अभ्याससे मनुष्य कालसे बचताहै और अभ्याससे मृत्युंजय होजाताहै और अभ्यासयोगसे वाक्यसिद्धि और मनुष्य इच्छाचारी होजाताहै. तात्पर्य यह है कि, सब वस्तुके सिद्धिका कारण अभ्यास है. इस हेतुसे आ- लस्यको छोडके जिस वस्तुमें मनुष्य अभ्यास करेगा वह अवश्य सिद्ध होजायगा ॥ १८ ॥ १९ ॥

( ९६ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । मूलम्-योनिमुद्रा परं गोप्या न देया यस्य कस्यचित् ॥ सर्वथा नैव दातव्या प्राणैः कण्ठगतैरपि ॥ २० ॥ टीका-यह योनिमुद्रा परमगोपनीय है अनधिका- रीको कदापि न दे यह सर्वथा देनेके योग्य नहीं है यदि कण्ठगत प्राण होजायँ तो भी देना उचित नहीं है ॥२०॥ मूलम्--अधुना कथयिष्यामि योगसिद्धि- करं परम् ॥ गोपनीयं सुसिद्धानां योगं परमदुर्लभम् ॥ २१ ॥ टीका-हे देवी ! अब जो योग कहेंगे वह परमसिद्धिका देनेवाला है सिद्ध लोगोंको इस परम दुर्लभ योगको गोप्य रखना उचितहै ॥ २१ ॥ मूलम्-सुप्ता गुरुप्रसादेन यदा जागर्ति कु- ण्डली ॥ तदा सर्वाणि पद्मानि भिद्यन्ते ग्रन्थयोपि च ॥ २२ ॥ टीका-गुरूके प्रसादसे निद्रिता कुण्डलिनी देवी जब जागृत होती है तब सर्व पद्म और सर्व ग्रंथी वेधित हो जाती हैं अर्थात् सुषुम्णा रन्ध्रद्वारा प्राणवायु ब्रह्मरन्ध्र- पर्यंत संचार करने लगजाताहै ॥ २२ ॥ मूलम्-तस्मात्सर्वप्रयत्नेन प्रबोधयितुमीश्व-

चतुर्थपटलः । ( ९७ ) रीम् ॥ ब्रह्मरन्ध्रमुखे सुप्तां मुद्राभ्यासं स माचरेत् ॥ २३ ॥ टीका-इसकारणसे यत्नपूर्वक ब्रह्मरन्ध्रके मुखमें जो ईश्वरी कुण्डलिनी देवी शयन करती हैं उनको उठानेके अर्थ मुद्राका अभ्यास उचित है ॥ २३ ॥ मूलम्-महामुद्रा महाबन्धो महावेधश्च खे- चरी ॥ जालंधरो मूलबंधो विपरीतकृति- स्तथा ॥२४॥ उड्डानं चैव वज्रोली दशमे शक्तिचालनम् ॥ इदं हि मुद्रादशकं मुद्रा णामुत्तमोत्तमम् ॥ २५ ॥ टीका-अब उत्तम मुद्राबन्ध वेध कहते हैं महामुद्रा, महाबन्ध, महावेध, खेचरीमुद्रा, जालन्धरबन्ध, मूल- बन्ध, विपरीतकरणीमुद्रा, उड्डानबन्ध, वज्रोलीमुद्रा और दशवीं शक्तिचालनमुद्रा, यह दशों मुद्रा सबमें अतिउत्तम हैं ॥ २४ ॥ २५ ॥ अथ महामुद्राकथनम् । मूलम्-महामुद्रां प्रवक्ष्यामि तन्त्रेऽस्मिन्म- मवल्लभे ॥ यां प्राप्य सिद्धाः सिद्धिं च कपिलाद्याः पुरा·गताः ॥ २६ ॥ ५

( ९८ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका-हे प्रिये पार्वती ! इस तन्त्रमें महामुद्रा जो हम कहतेहैं इसको लाभ करके पूर्व कपिलआदिक सिद्ध- वरको सिद्धि प्राप्त भई ॥ २६ ॥ मूलम्--अपसव्येन संपीड्य पादमूलेन सा- दरम् ॥ गुरूपदेशतो योनिं गुदमेढ्रान्तरा- लगाम् ॥२७॥ सव्यं प्रसारितं पादं धृत्वा पाणियुगेन वै ॥ नवद्वाराणि संयम्य चि- बुकं हृदयोपरि ॥ २८ ॥ चित्तं चित्तपथे दत्त्वा प्रभवेद्वायुसाधनम् ॥ महामुद्रा भ- वेदेषा सर्वतन्त्रेषु गोपिता॥ २९ ॥वामाङ्गे- न समभ्यस्य दक्षाङ्गेनाभ्यसेत्पुनः ॥ प्रा- णायामं समं कृत्वा योगी नियतमा- नसः ॥ ३० ॥ टीका-वामपादके एडीसे गुदा और मेढ़के मध्यमें जो योनि है उसको आदरसहित गुरुके उपदेशपूर्वक पीडितकरे अर्थात् दबावे और दक्षिणपाद प्रसारके अ- र्थात् लम्बा करके दोनों हाथोंसे धरे और नवद्वारोंको रोक करके चिबुक अर्थात् ठोडीको हृदयपर स्थित करे और चित्तवृत्तिको चैतन्यमें स्थिर करके वायुका साधन कर- ना उचित है यह महामुद्रा सर्वतन्त्रोंके प्रमाणसे गो-

चतुर्थपटलः । ( ९९ ) प्यहै पहिले वामांगसे अभ्यास करके फिर दक्षिण अं- गसे अभ्यास करे योगी स्थिरबुद्धिको उचित है कि, इस प्रकारसे प्राणायामको समकरे ॥२७॥२८॥२९॥३०॥ मूलम्--अनेन विधिना योगी मन्दभाग्यो- ऽपि सिध्यति॥ सर्वासामेव नाडीनां चालनं बिन्दुमारणम् ॥३१॥जीवनन्तु कपायस्य पातकानां विनाशनम् ॥ कुण्डलीतापनं वायोर्ब्रह्मरन्ध्रप्रवेशनम् ॥ ३२ ॥ सर्वरो- गोपशमनं जठराग्निविवर्धनम् ॥ वपुषा कान्तिममलांजरामृत्युविनाशनम्॥ ३३॥ वांछितार्थफलं सौख्यमिन्द्रियाणाञ्च मा- रणम्॥ एतदुक्तानि सर्वाणि योगारूढस्य योगिनः ॥ ३४ ॥ भवेदभ्यासतोऽवश्यं नात्र कार्या विचारणा ॥ टीका-इस विधानसे मन्दभाग्य योगीभी सिद्ध होजा- यगा और इस महामुद्राके प्रभावसे सर्व नाडीका च- लन सिद्ध होजायगा और बिन्दु स्थिर होगा और जी- वनको आकर्षित रक्खेगा और सर्व पातकका नाश हो- जायगा और कुण्डलिनीको हठात् उठाय वायुको ब्रह्मर- न्ध्रमें प्रवेश करेगा और ज़ठराग्नि प्रज्वलित होके सर्वरो-

(१००) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । गोंका नाश करदेगा और शरीरमें सुन्दर कान्ति होगी और वृद्धावस्थासहित मृत्युका नाश होजायगा और सुखसहित वाञ्छित फल लाभ होगा और इन्द्रियोंका निग्रह रहेगा यह सब जो कहा है सो योगारूढ यो- गीको अभ्याससे वश होजाताहै इसमें संशय नहीं है निश्चय है ॥ ३१ ॥ ३२ ॥ ३३ ॥ ३४ ॥ मूलम्-गोपनीया प्रयत्नेन मुद्रेयं सुरपूजि- ते ॥ यां तु प्राप्य भवाम्भोधेः पारं गच्छ- न्ति योगिनः ॥ ३५ ॥ टीका-हेसुरपूजिते देवी ! यह मुद्रा यत्न करके गो- पनीय है योगीलोग इसको लाभ करके संसाररूपी स- मुद्रके पार होजाते हैं ॥ ३५ ॥ मूलम्-मुद्रा कामदुघा ह्येषा साधकानां म- योदिता ॥ गुप्ताचारेण कर्त्तव्या न देया यस्य कस्यचित् ॥ ३६ ॥ टीका-हेदेवी ! यह मुद्रा जो हमने कही है साधकोंको कामधेनुरूप है अर्थात् वाञ्छितफलकी दाता है इसको गुप्त करके अभ्यास करना उचित है और सबको अर्थात् अनधिकारीको देना उचित नहीं है ॥ ३६ ॥ अथ महाबन्धकथनम् । मूलम्-ततः प्रसारितः पादो विन्यस्य तमूरु-

चतुर्थपटलः । ( १०१ ) परि ॥ ३७ ॥ गुदयोनिं समाकुंच्य कृत्वा चापानमूर्ध्वगम् ॥ योजयित्वा समानेन कृत्वा प्राणमधोमुखम् ॥ ३८ ॥ बन्धयेदू- र्ध्वगत्यर्थं प्राणापानेन यः सुधीः ॥ कथि- तोऽयं महाबन्धः सिद्धिमार्गप्रदायकः ॥ ॥ ३९ ॥ नाडीजालाद्रसव्यूहो मूर्धानं याति योगिनः ॥ उभाभ्यां साधयेत्प- द्भ्यामेकैकं सुप्रयत्नतः ॥ ४० ॥ टीका-तदनन्तर पादको प्रसारके अर्थात् फैलाके दक्षिणचरणको वाम ऊरूपर स्थित करके और गुदा और योनिको आकुञ्चन करके अपानको ऊर्ध्व करके समानवायुके साथ सम्बन्ध करके और प्राणवायुको अधोमुख करे यह बन्ध प्राण अपानके ऊर्द्धगतिके हेतु बुद्धिमान् साधकके प्रति कहाहै और यह महाबन्ध सिद्धिमार्गका दाता है और योगीलोगोंके नाडियोंका रससमूह इस बन्धसे ऊपरको गमन करताहै यह दोनों मुद्रा और बन्ध एक एकको दोनों अंगसे यत्न करके करना उचितहै ॥ ३७ ॥ ३८ ॥ ३९ ॥ ४० ॥ मूलम्-भवेदभ्यासतो वायुः सुषुम्नामध्य- सङ्गतः॥अनेन वपुषः पुष्टिर्दृढबन्धोऽस्थि-

३. तृतीय पटल: प्राणायाम, पवन-विजय व यौगिक सिद्धियाँ

( १०२ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । पञ्जरे ॥ ४१ ॥ संपूर्णहृदयो योगी भव- न्त्येतानि योगिनः॥ बन्धेनानेन योगी- न्द्रः साधयेत्सर्वमीप्सितम् ॥ ४२ ॥ टीका-अभ्याससे प्राणवायु सुषुम्णाके मध्यमें स्थित होगा और इस महाबंधके प्रभावसे शरीर पुष्ट रहेंगा और अस्थिपंजर और शरीरका सब बन्ध दृढ अर्थात् बलिष्ठ होजायगा और योगीका हृदय सन्तोषसे पूर्ण और आनन्दित रहेगा. यह सब योगीको इस महा- बन्धके प्रभावसे स्वयं लाभ होजायगा और इसी बन्धके साधनसे योगी अपनी इच्छाके अनुसार सब सिद्ध करलेगा ॥ ४१ ॥ ४२ ॥ अथ महावेधकथनम् । मूलम्-अपानप्राणयोरैक्यं कृत्वा त्रिभुवने- श्वरि॥महावेधस्थितो योगी कुक्षिमापूर्य वायुना ॥ स्फिचौ संताडयेद्धीमान्वेधो- ऽयं कीर्तितो मया ॥ ४३ ॥ टीका-हे त्रिभुवनेश्वरी ! अपान और प्राणको एक करके महावेधस्थित योगी उदरको वायुसे पूर्ण करके बुद्धिमान् दोनों स्फिच् अर्थात् पार्श्वको ताडन करे इसको हमने वेध कहा है ॥ ४३ ॥

चतुर्थपटलः । ( १०३ ) मूलम्-वेधेनानेन संविध्य वायुनायोगिपुंग- वः ॥ ग्रंथिं सुषुम्णामार्गेण ब्रह्मग्रंथिं भि- नत्त्यसौ ॥ ४४ ॥ टीका-बुद्धिमान् योगी इस वेधद्वारा वायुसे सर्व ग्रन्थीको वेधन करके सुषुम्नारन्ध्रद्वारा ब्रह्मग्रंथीको भेदन करताहै ॥ ४४ ॥ मूलम्-यःकरोति सदाभ्यासं महावेधं सुगो- पितम् ॥ वायुसिद्धिर्भवेत्तस्य जरामरण नाशिनी ॥ ४५ ॥ टीका-जो मनुष्य इस उत्तम महावेधको गोपित करके सर्वदा अभ्यास करेगा उसकी जरामरण नाशि- नी वायुसिद्धि होजायगी ॥ ४५ ॥ मूलम्-चक्रमध्ये स्थिता देवाः कम्पन्ति वायुताडनात् ॥ कुण्डल्यपि महामाया कैलासे सा विलीयते ॥ ४६ ॥ टीका-शरीरस्थ चक्रमें जो देवता हैं वह वायुके ताडनसे कम्पायमान होते हैं और महामाया कुण्डलि- नी देवी कैलास अर्थात् ब्रह्मस्थानमें लय होती है तात्प- र्य यह है कि, चक्रस्थित देवता अर्थात् गणेशजी, ब्रह्मा, विष्णु, महादेवजी, मायाधीश ज्योतिस्वरूप ईश्वर क्रमसे