शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(९०) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । ऊपर नीचे धरे और समकाय अर्थात् बराबर शरीर करके सुखपूर्वक बैठे उसको स्वस्तिकासन कहते हैं. इस विधानसे बुद्धिमान् योगी वायुका साधनकरे तो उसके शरीरमें व्याधी प्रवेश नहीं करती और उसको वायु सिद्धहोजातीहै इसको सुखासन कहते हैं यह सर्वदुःखका नाशक है यह स्वस्तिकासन योगी लोगोंको गोप्य रख- ना उचितहै इसकारणसे की उत्तम कल्याणका का- रकहै ॥ ११८ ॥ ११९ ॥ १२० ॥ इति श्रीशिवसंहितायां हरगौरीसंवादे योगाभ्यासतत्त्व- कथनं नाम तृतीयः पटलः समाप्तः ॥ ३ ॥ अथ चतुर्थपटलः । मूलम्-आदौ पूरकयोगेन स्वाधारे पूरये- न्मनः॥ गुदमेढ्रान्तरे योनिस्तामाकुंच्य प्रवर्तते ॥ १ ॥ टीका-पहिले पूरक योगविधानसे आधारपद्ममें वायुको मन सहित पूरक करके स्थित करे और गुदामे- ढके मध्यमें जो योनिस्थान है उसको यत्नसे आकुञ्चन करनेमें प्रवृत्तहोय ॥ १ ॥ मूलम्-ब्रह्मयोनिगतं ध्यात्वा कामं कन्दुक- सन्निभम्॥सूर्यकोटिप्रतीकाशंचन्द्रकोटि-