शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थपटलः । ( ९१ ) सुशीतलम् ॥ २ ॥ तस्योर्ध्वं तु शिखासूक्ष्मा चिद्रूपा परमाकला ॥ तया सहितमात्मा- नमेकीभूतं विचिन्तयेत् ॥ ३ ॥ टीका-ब्रह्मयोतिके मध्यमें कामपुष्प अर्थात् काम- बाणके समान कोटिसूर्यके सदृश प्रकाश और कोटि चन्द्रमाके समान शीतल कामदेवका ध्यान करे और उसके ऊर्ध्व भागमें सूक्ष्म ज्योति शिखा चैतन्यस्वरू- पा परमाशक्तिसहित एक परमात्माका चिन्तन करै ॥ २ ॥ ३ ॥ मूलम्-गच्छतिब्रह्ममार्गेण लिंगत्रयक्रमेण वै॥ सूर्यकोटिप्रतीकाशं चन्द्रकोटिसुशी- तलम्॥४॥अमृतं तद्धि स्वर्गस्थं परमान- न्दलक्षणम्॥ श्वेतरक्तं तेजसाढ्यं सुधाधा- राप्रवर्षिणम् ॥ ५ ॥ पीत्वा कुलामृतं दि- व्यं पुनरेव विशेत्कुलम् ॥ टीका-उसी ब्रह्मयोनिसे जीव सुषुम्णा रन्ध्रद्वारा क्रमसे तीन लिङ्ग अर्थात् स्थूल सूक्ष्म कारणस्वरूपसे प्रस्थान करताहै और स्वर्गस्थ अमृत परम आनन्द- का लक्षण श्वेत रक्त-वर्ण कोटि सूर्यके सदृश तेज प्रकाश और कोटि चन्द्रमाके समान शीतल सुधाधारा-