शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थपटलः । ( ९५ ) मूलम्-तस्मादभ्यसनं नित्यं कर्तव्यं मोक्ष- कांक्षिभिः ॥ अभ्यासाज्जायते सिद्धिर्- भ्यासान्मोक्षमाप्नुयात् ॥ १७ ॥ टीका-इस हेतुसे मोक्षकांक्षीको उचित है कि, नित्य अभ्यास करे अभ्याससे सिद्धि होती है और अभ्यासही- से मुक्ति प्राप्त होती है ॥ १७ ॥ मूलम्-संविदंलभतेऽभ्यासाद्योगोभ्यासात्प्र- वर्तते ॥ मुद्राणां सिद्धिरभ्यासादभ्यासा- द्वायुसाधनम् ॥ १८ ॥ कालवञ्चनमभ्या- सात्तथा मृत्युञ्जयो भवेत् ॥ वाक्सिद्धिः कामचारित्वं भवेदभ्यासयोगतः ॥ १९ ॥ टीका-अभ्याससे ज्ञान प्राप्त होताहै और अभ्याससे योगमें प्रवृत्ति होती है और अभ्याससे मुद्रा सिद्ध होती हैं और अभ्याससे वायुका साधन होताहै और अभ्याससे मनुष्य कालसे बचताहै और अभ्याससे मृत्युंजय होजाताहै और अभ्यासयोगसे वाक्यसिद्धि और मनुष्य इच्छाचारी होजाताहै. तात्पर्य यह है कि, सब वस्तुके सिद्धिका कारण अभ्यास है. इस हेतुसे आ- लस्यको छोडके जिस वस्तुमें मनुष्य अभ्यास करेगा वह अवश्य सिद्ध होजायगा ॥ १८ ॥ १९ ॥