भारतकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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पृष्ठ 98

( ९४ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । सत्वरहित हैं खण्डितहैं सौ खण्ड होगएहैं इस विधिसे युक्त होके साधन करनेसे शीघ्र प्रकर्ष करके सिद्ध होजायगा गुरुशिक्षासे सब सिद्ध और मोक्षप्रद होजाताहै योगीसे जो मन्त्र शुभ वा अशुभरूप उच्चा- रण होताहै सो सब योनिमुद्राके बन्धनमात्रसे सिद्ध होजाताहै विधानपूर्वक मंत्रके अधिकारार्थ गुरुको उचि- तहै कि इस योनिमुद्राके दीक्षाका अभिषेक सहस्रधा शिष्यको करे ॥९॥ १० ॥११॥ १२ ॥ १३ ॥ १४ ॥ मूलम्-ब्रह्महत्यासहस्राणि त्रैलोक्यमपि घातयेत् ॥ नासौ लिप्यति पापेन योनि- मुद्रानिबन्धनात् ॥ १५ ॥ टीका-यदि एक सहस्र ब्रह्महत्याकरके और त्रैलो- क्यकाभी घात करदे अर्थात् प्राणिमात्रका नाश करदे तो भी वह इस योनिमुद्राके बन्धमात्रसे पापमें लिप्त न होगा अर्थात् उसको पाप नलगेगा ॥ १५ ॥ मूलम्-गुरुहा च सुरापी च स्तेयी च गुरुत- ल्पगः ॥ एतैः पापैर्न बध्येत योनिमुद्रा- निबन्धनात् ॥ १६ ॥ टीका-गुरुघातक मद्यपाई चोर गुरुकी शय्यामें रमण करनेवाला ऐसे अनेक पातकसेभी साधक यो- निमुद्राके बन्धप्रभावसे बन्धायमान नहोगा ॥ १६॥