भारतकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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तृतीयपटलः । ( ८३ ) अष्टसिद्धिका लाभ होय और सर्व भूतगण आपही वश में होजाय ॥ ९२ ॥ ९३ ॥ ९४ ॥ मूलम्-रसनामूर्ध्वगां कृत्वा क्षणार्धं यदि तिष्ठति ॥ क्षणेन मुच्यते योगी व्याधिमृ- त्युजरादिभिः ॥ ९५ ॥ टीका-योगीकी जिह्वा यदि क्षणमात्र उपर स्थिर होजाय तो उसी क्षणसे सर्वव्याधि और वृद्धावस्था और मृत्युका नाश होजाय. तात्पर्य यह है कि, खेचरीमुद्रासे किंचित्मात्र भी अमृतपान करलेगा तो उसकी मृत्यु न होगी ॥ ९५ ॥ मूलम्--रसनां प्राणसंयुक्तां पीड्यमानां वि- चिंतयेत् ॥ न तस्य जायते मृत्युः सत्यं सत्यं मयोदितम् ॥ ९६ ॥ टीका-जिह्वाको प्राणसहित पीडित करके जो पुरुष ब्रह्मरन्ध्रमें ध्यानसंयुक्त स्थिर करेगा. हेदेवी ! हम वारं- वार कहतेहैं कि, निश्चय उसकी मृत्यु न होगी ॥ ९६ ॥ मूलम्-एवमभ्यासयोगेन कामदेवो द्विती- यकः ॥ न क्षुधा न तृषा निद्रा नैव मूर्च्छा प्रजायते ॥ ९७ ॥ टीका-इस योगअभ्याससे जो पहिले कहाहै वह