शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation
महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा
स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंviii ३. भेद—नानाता में ही इस सिद्धान्त के सार का अवलोकन होना। इन शास्त्रों को शिव-शास्त्र कहते हैं। कलियुग के पूर्व ऋषि-मुनि इन शैव-सिद्धान्तों का प्रवचन तथा प्रचार मौखिक रूप में ही किया करते थे। अतः यह दर्शन शिष्य-प्रशिष्यों द्वारा कथन-श्रवण से ही संसार के जीवों का उद्धार करता रहा। परन्तु कलियुग का आविर्भाव होते ही वे ऋषि-मुनि गुफाओं और गिरि-कन्दराओं में छिप गए; सम्भवतः इसलिए कि वे अपने शान्त वातावरण में ही रहा करते थे और कलियुग में होने वाले अन्यायों तथा विक्षेपों से दूर रहकर ही परम-तत्त्व के अभ्यास में रहना चाहते थे। परिणाम यह हुआ कि कलियुगीय वातावरण के बढ़ने के साथ-साथ कालान्तर में इस क्रम का लोप हो गया। ऐसी दशा में भगवान् शिव पीड़ित जनता पर दया करते हुए कैलाश पर्वत पर श्रीकण्ठ के रूप में प्रकट हुए और ऋषि दुर्वासा को शैव-शास्त्रों का उपदेश किया। श्रीकण्ठनाथ ने दुर्वासा को पृथ्वीतल पर जीवों का पुनरुत्थान करने के लिए इसी त्रिक- शासन का फिर से प्रचार करने को कहा। इस प्रकार त्रिक-शासन की प्रणाली फिर से आगे बढ़ने लगी। ऋषि दुर्वासा त्रिक-शासन के विज्ञाता थे। उन्होंने प्रचार कार्य को आगे बढ़ाने के लिए अपनी अलौकिक मानसिक शक्ति से तीन मानसिक पुत्रों को जन्म दिया। उनके नाम त्र्यम्बक, आमर्दक और श्रीनाथ हुए। इन तीनों मानसिक पुत्रों को क्रमशः अभेद, भेद और भेदाभेद शाखाओं में प्रचार द्वारा जनता का आध्यात्मिक जीवन-स्तर उन्नत करने का आदेश मिला। त्र्यम्बक ने स्त्री-समुदाय के शिक्षार्थ अपनी ध्यान-शक्ति से एक कन्या को उत्पन्न किया। इससे अर्ध-त्र्यम्बक शाखा आरम्भ हुई। अतः साढ़े तीन मठिकाओं में त्रिक-दर्शन जगत् में फिर से आरम्भ हुआ और इसे सर्वश्रेष्ठ माना गया। जैसे तन्त्रालोक की टीका में कहा है— वेदाच्छैवं ततो वामं ततो दक्षं ततः कुलम्। ततो मतं ततश्चापि त्रिकं सर्वोत्तमं परम्॥ अद्वैत शैव-शासन का प्रचार त्र्यम्बक और अर्धत्र्यम्बक से हुआ। यह परम्परा चौदह पीढ़ियों तक चलती रही। इन शिष्यों को सिद्ध कहा जाता था। आमर्दक की भेद शाखा तथा श्रीनाथ की भेदाभेद शाखा के बारे में कोई परिचय प्राप्त नहीं होता है। सम्भवतः यह दोनों शाखाएँ कुछ अनावश्यक प्रतीत हुई हों जिससे इनका आगे प्रचार होना रुक गया हो। पन्द्रहवीं पीढ़ी में मानसिक पुत्रों द्वारा गुरु-शिष्य क्रम भंग हुआ। इस पीढ़ी का प्रति- निधि, जिसके नाम का पता नहीं चलता है, मानसिक पुत्र को उत्पन्न करने में असफल