भारतकोश
शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation

महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा

स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

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रहा। उसने एक ब्राह्मण की कन्या से विवाह किया जिससे एक पुत्र का जन्म हुआ। उसका नाम संगमादित्य था। यह पहला पुत्र था जिसका जन्म इस शाखा में माता के गर्भ से हुआ। संगमादित्य को पिता ने उपदेश किया। आगे पिता-पुत्र के रूप से ही गुरु-शिष्य क्रम जारी रहा। संगमादित्य अपनी यात्रा के क्रम से कश्मीर आया और शान्त तथा सात्त्विक वातावरण में रहने की इच्छा से बाद में यहीं निवास करने लगा। उसने वर्षादित्य को जन्म दिया। वर्षादित्य से अरुणादित्य, उससे आनन्द और आनन्द से सोमानन्द का जन्म हुआ। आगे भौतिक रूप में पिता-पुत्र द्वारा गुरु-शिष्य क्रम नहीं रहा। अब यह परम्परा गुरु-शिष्य क्रम से ही चलने लगी, जो इस प्रकार रही — सोमानन्द → उत्पलदेव → लक्ष्मणगुप्त → अभिनव गुप्त → क्षेमराज आदि । संगमादित्य कश्मीर में उस समय आये थे जिस समय महाराजा ललितादित्य यहाँ राज्य करते थे। ललितादित्य एक धर्मनिष्ठ, कर्त्तव्य-परायण तथा योग्य शासक थे। वह अपने कल्याण के साथ-साथ जनता के कल्याण का भी ध्यान रखते थे। प्रजा में धर्म-प्रेरणा के भाव जगाने में उन्होंने श्लाघनीय योग-दान दिया। कश्मीर में शैव-शासन के प्रचार का कारण बनने का श्रेय इसी प्रजावत्सल तथा प्रसिद्ध महाराजा को प्राप्त हुआ। भारतवर्ष में गंगा-जमुना के बीच में एक सुन्दर स्थान अन्तर्वेदी में अत्रिगुप्त नाम से एक शैवाचार्य रहा करते थे। वह एक सद्गृहस्थ थे और शैव-शासन के उत्तम अभ्यास में ही अपने जीवन को दिव्य तथा धन्य बनाने में व्यस्त थे। एक बार महाराजा ललितादित्य भ्रमण करते हुए इस उत्तम स्थान अन्तर्वेदी में गये। वहाँ उनका सम्पर्क शैव-आचार्य श्री अत्रिगुप्त के साथ हुआ। महाराजा उनके ज्ञान तथा प्रतिभा से प्रभा- वित हुए। उन्होंने आचार्य को कश्मीर आने की प्रार्थना की। इसे ऋषि ने स्वीकार किया। अत्रिगुप्त कश्मीर आये। महाराजा ने उनका बड़ा आदर-सत्कार किया और यहाँ ही निवास करने की प्रार्थना की। उस समय महाराजा का राज्य-भवन श्रीनगर से कुछ पांच मील दूर दक्षिण-पूर्व में ल्यतपुर के स्थान पर था। वहाँ से आगे दो-तीन मील (सम्भवतः पाम्पोर में) राजा प्रवरसेन का पुराना राज्य-भवन था। इसी राज्य- भवन को अत्रिगुप्त और उनके गृहस्थ के रहने के योग्य बनाने के लिए मरम्मत किया गया। शैवाचार्य ने यहीं रहकर कश्मीर में शैव-शास्त्र का प्रचार किया और शेष जीवन यहीं बिताया। आगे लगभग चार पीढ़ियों की इसी परम्परा में वराहगुप्त को एक पुत्र-रत्न प्राप्त हुआ जिसका नाम नरसिंह गुप्त था। इनसे ही तन्त्रालोक के रचयिता स्वनामधन्य अभिनवगुप्तपाद का जन्म हुआ। उनके तर्क-गुरु श्रीलक्ष्मणगुप्ताचार्य थे।