शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation
महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा
स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंX श्रीशम्भुनाथ, जो एक गृहस्थी थे, श्रीअभिनवगुप्त के त्रिकमार्ग (अभेद शैवमत) के गुरु थे। नरसिंह गुप्त की पूर्व वंश-परम्परा में ही वसुगुप्त का जन्म हुआ था। वसुगुप्त ने बौद्धमत का खण्डन करने के लिए अपना प्रयत्न सफल करना चाहा परन्तु वह असमर्थ रहा। शैव-शासन के अभिभव को सहन न करते हुए, वसुगुप्त ने कश्मीर में श्रीनगर से बारह मील दूर हार्वन के पास महादेव पर्वत के किसी भाग में तपस्या आरम्भ करके भगवान् शिव की आराधना की। आशुतोष भगवान् शिव ने उसे स्वप्न में आदेश दिया कि 'दाछीगाम की वनस्थली में एक बड़ी शिला है। इस पर शिव-सूत्र खुदे हुए हैं। इन सूत्रों का मनन करके कश्मीर में शैव-शासन का प्रचार करो'। फलतः वसुगुप्त ने ऐसा ही किया। प्रातः जब वह ढूँढ़ते हुए इस विशाल शिला के पास आया तो इसके स्पर्श- मात्र से ही शिला उलट गई और शिव-सूत्र इस पर खुदे हुए मिले। वसुगुप्त ने इन सूत्रों का भली भाँति विचार तथा मनन किया और देश में इनका प्रचार करने लगा। यह विशाल शिला अब भी दाछीगाम के वन में मौजूद है और इसे 'शंकर-पल' के नाम से जाना जाता है। कश्मीर में त्रिक-शासन का प्रचार, इस तरह, वसुगुप्त के शिव-सूत्रों से हुआ। फिर इन्हीं शिव-सूत्रों के आधार पर श्रीवसुगुप्त जी ने स्पन्द-सूत्रों की रचना की जिन सूत्रों पर उनके सच्छिष्य कल्लटाचार्य ने व्याख्या की। अतः कल्लट को स्पन्दशास्त्र का प्रथम आचार्य गिना जाने लगा। त्रिक-शासन का दूसरा शास्त्रीय रूप श्री सोमानन्द रचित शिवदृष्टि से प्रवर्तन में आया, जिसकी उन्हीं के सच्छिष्य श्रीउत्पल देव ने प्रत्यभिज्ञा- दर्शन के रूप में व्याख्या की। कहते हैं कि उत्पलदेव ने अपने पुत्र विभ्रमाकर की प्रार्थना से प्रेरित होकर ही शिवदृष्टि की व्याख्या 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा' शास्त्र की कारि- काओं में लिखी। श्रीसोमानन्दनाथ और श्रीवसुगुप्त के स्थिति काल आठवीं-नौवीं शताब्दी में माने जाते हैं। अतः कई शताब्दियों से दबे हुए इस शिव-शासन का पुनरु- त्थान इसी समय श्रीवसुगुप्त द्वारा आरम्भ हुआ। क्योंकि इस समय से आरम्भ हुए इस उत्तर-कालिक अद्वैत-शैव दर्शन का प्रचार-क्षेत्र कश्मीर ही रहा, अतः इसका नाम भी कश्मीर शैव दर्शन पड़ गया। इस समय से पूर्व चौथी-पाँचवीं शताब्दी में कश्मीर में ही कुल-शाखा और क्रम- शाखा के प्रचार भी हुए थे। शैव-दर्शन के ये चारों क्रम-प्रत्यभिज्ञा, स्पन्द, कुल और क्रम-त्रिक शासन के अन्तर्गत ही माने जाते हैं क्योंकि इन चारों क्रमों में शिव, शक्ति और नर (अणु) की विधात्मक सत्ता पर ही अद्वैत परम तत्त्व का विमर्श किया गया है। यह समय तो शैव-दर्शन के पूर्वकाल से सम्बन्धित है। उत्तरकाल में गुरु-शिष्य परम्परा आगे चलती रही। उत्पलाचार्य के शिष्य श्री लक्ष्मणगुप्त थे जो श्रीअभिनवगुप्त-पाद के तर्क-गुरु थे। इनके त्रिकमार्ग अर्थात् अद्वैत