भारतकोश
शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation

महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा

स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

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xi शैव मत के गुरु श्रीशम्भुनाथ थे जो एक गृहस्थ थे । श्रीअभिनवगुप्त ब्रह्मचारी थे । वे बड़ी आयु तक अपनी बहुमुखी प्रतिभा से त्रिक-मत का प्रचार-प्रसार करते रहे । इससे पूर्व इन्होंने संस्कृत साहित्य में ध्वनि-शास्त्र ओर नाट्य-शास्त्र को अत्युत्तम योगदान दिया । तन्त्रालोक में इन्होंने शैवदर्शन को क्रमपूर्वक ओर विस्तार से समझाया । इसके अतिरिक्त इनके ग्रन्थ तन्त्रसार, परा-त्रिंशिका, परमार्थसार आदि और अपने परमगुरु उत्पलाचार्य की ईश्वर प्रत्यभिज्ञा कारिकाओं पर विशद टीकाएँ प्राप्य हैं । सारांश यह कि कश्मीर शैव दर्शन को इन्होंने भावी समय के लिए परिपुष्ट तथा प्रभावित किया । अभिनवगुप्तपाद का आविर्भाव ईसवी की दसवीं-ग्यारहवीं शताब्दी में हुआ था । इनके प्रतिभाशाली शिष्य श्रीक्षेमराज ने शिवसूत्र पर विमर्शिनी लिखी जिसकी अन्य टीकाओं की अपेक्षा सराहना की गई है । इन्होंने स्वच्छन्द-तन्त्र पर भी टीका लिखी है । इनके शिष्य श्रीयोगराज ने अभिनवगुप्तपाद के परमार्थसार पर टीका लिखी है । इन्होंने श्रीअभिनवगुप्त से ही शिक्षा प्राप्त की थी । इनके कार्य को आगे श्रीजयरथ ने चलाया । इनका स्थितिकाल बारहवीं शताब्दी कहा जाता है । इन्होंने तन्त्रालोक पर अति सुन्दर टीका लिखी । फिर इस परम्परा में श्रीशिवोपाध्याय का नाम आता है । यह अठारहवीं शताब्दी के उत्तम शैव सन्त माने जाते हैं । इनका निवास स्थान हब्बाकदल के आस- पास वितस्ता नदी के पश्चिम तट पर था । इन्होंने विज्ञानभैरव-तन्त्र की विवृति लिखी है । बीच-बीच में इस परम्परा का लोप होता जैसा दिखाई देता है । परन्तु सरिता की तरह जो बीच-बीच में घने बनों में से गुजरने के कारण दिखाई भी नहीं देती है और मैदानों में पहुँच कर प्रकट होती है, यह परम्परा कश्मीर में आगे बढ़ती गई । उन्नी- सवीं शताब्दी में मनुदेव एक उत्तम कोटि के शैव-सन्त हुए । इनके सुयोग्य शिष्य स्वामी राम एक सिद्ध शैव-सन्त हुए जो बीसवीं शताब्दी के आरम्भ में शिव-स्वरूप में समा गए । इनकी सिद्धियों से कश्मीर के लोग, क्या हिन्दू क्या मुसलमान अभी तक प्रभावित हैं । इनके शिष्यों में मुख्य स्वामी महताब काक हुए जो बड़े युक्ति-कुशल तथा सिद्ध सन्त थे । इनका आश्रम अपने ही गुरु महाराज से स्थापित श्रीराम (त्रिक) आश्रम, फतेहकदल, श्रीनगर में ही रहा । पूर्व दो शताब्दी में हुए इन सिद्ध-सन्तों ने कोई ग्रन्थ लेख आदि नहीं लिखे । परन्तु शिष्यों द्वारा शैव-दर्शन का प्रचार-प्रसार करते रहे । पूर्वाचार्यों के ग्रन्थ शिव-सूत्र और ईश्वर-प्रत्यभिज्ञा कश्मीर शैव दर्शन की विशेषता आप रखते हैं । इन्हीं का प्रचार ग्रन्थ तथा टीकाएँ लिखने से जो आगे बढ़ता चला आया था ? अब अध्यापन तथा उपदेश आदि के द्वारा आगे बढ़ता रहा है । स्वामी महताबकाक के सह-शिष्य स्वामी विद्याधर जी एक महान् तपस्वी थे । इन का भी स्थापित किया 'श्रीविद्याधर आश्रम' करणनगर, श्रीनगर में अब भी अपने दैनिक सत्संग कार्य में व्यस्त है । इसके अतिरिक्त उन के शिष्य स्वामी महादेव जी ने रतनीपोरा