शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation
महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा
स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंॐ नमः श्री शाम्भवे स्वात्मानन्दप्रकाशवपुषे शिवसूत्र विमर्श प्रथम विकास पहले विकास में शाम्भव उपाय की दृष्टि से शिवस्वरूप के अनुभव का स्फुरण कहा है । शाम्भव उपाय इस प्रकार है : 'अकिञ्चिच्चिन्तकस्यैव गुरुणा प्रतिबोधतः । जायते यः समावेशः शाम्भवोऽसावुदाहृतः ॥' (मालिनीविजयोत्तर तन्त्र अधिकार २, श्लोक २३) अर्थ—गहरे और गम्भीर स्वरूप-ज्ञान के द्वारा निर्विकल्पभाव में स्थिति पाये हुये योगी को (सद्गुरु कृपाकटाक्ष से) जो भगवदावेश होता है उसे (शाम्भवोपाय से प्राप्त) शाम्भव मुद्रा कहते हैं । अब प्रस्तुत सूत्र में सूचित किया जाता है कि शिव कौन है, उसका स्वरूप क्या है और शैवदर्शन में उसका वर्णन किस प्रकार हुआ है । चैतन्यमात्मा ॥१॥ चैतन्यम्—ज्ञानरूप क्रिया में स्वातन्त्र्य आत्मा—भाव और अभावरूप जगत् का स्वरूप (है) । व्याख्या—जिससे चेतना प्रधान होती है वह चेतन है। उसका ज्ञानरूप क्रिया में स्वातन्त्र्य ही चैतन्य है । यही आत्मा अर्थात् चेतनता का स्वरूप है । चेतनता ही भूः भुवः स्वः रूप इस सारे जगत् का स्वरूप है । यह लौकिक देह, प्राण, पुर्यष्टक, शून्य, बुद्धि, जाग्रत्, आदि आत्मा नहीं हैं । अतः इस भावरूप और अभावरूप जगत् का जो स्वभाव है वही आत्मा है । वह सब प्रकार की ज्ञानरूप क्रिया में स्वतन्त्र है । अतः जानने की क्रिया में स्वातन्त्र्य ही आत्मा है । इस सम्बन्ध में यह वार्तिक है : “चैतन्यमात्मनो रूपं सिद्धं ज्ञानक्रियात्मकम् । तस्यानावृतरूपत्वाच्छिवत्वं केन वार्यते ॥” (भट्टभास्कर विरचित शिवसूत्र वार्तिक-१५) अर्थ—जानने की क्रिया में स्वतन्त्रता ही चैतन्य-आत्मा का स्वरूप है । मलत्रय के आवरण से रहित होने के कारण उसके शिवभाव में कोई बाधा नहीं रहती ।