भारतकोश
शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation

महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा

स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

पृष्ठ 24, कुल 108 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 24

xxii या काचिद् वै क्वचिदपि दशा किञ्चिदभ्यासपूरा- दानन्दाख्या भवभयहरा स्यात् सुभक्तस्य सद्यः । सिद्धिः सैषा सुरपितृनृणां यस्य भक्त्या भवेन्नु तं स्वात्मानं विभववपुषं सद्गुरुं वै प्रपद्ये ॥ अर्थ—'कहीं किसी दीर्घकाल तक निरन्तर चलने वाले धारावाहिक अभ्यास से किसी श्रेष्ठ भक्त को तो तत्काल कोई अनिर्वचनीय, भवभयहारिणी आनन्दा- वस्था प्राप्त हो जाती है, वही उसकी सिद्धि है । देवताओं, पितरों तथा मनुष्यों को यह उत्कृष्ट सिद्धि, जिनकी भक्ति (सेवा-पूजा) से उपलब्ध होती है. उन ज्ञानादि ऐश्वर्यमय स्वरूप वाले निजात्म-स्वरूप सद्गुरु की मैं शरण लेता हूं।'