भारतकोश
शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation

महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा

स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

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तृतीय विकास : २५ देशान्तरादि में गमन) नहीं होता । 'न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति अत्रैव समवलीयन्ते-२' इस प्रकार श्रुति कहती है । अतः 'चैतन्यमात्मा'-(१/१) इस प्रकार स्वभावभूत तात्त्विक स्वरूप के प्रतिपादन से यहाँ पूर्णात्मा ही लक्षित होता है । शाक्तपरामर्श में रंगा हुआ यह आत्मा 'चित्तं मन्त्रः' -(२-१), अहं-परामर्श में मग्न आराधन करने वाले का मन है । आणव विमर्श में यह आत्मा मन, बुद्धि, अहंकार के व्यापार वाला चित्त है (आत्मा चित्तम्-३-१) ॥१॥ सम्बन्ध-चित्त के बन्धन का कारण कहते हैं । ज्ञानं बन्धः ॥२॥ ज्ञानं-(सत्त्व, रज, तम रूप विषयवासना का) ज्ञान बन्धः- (भेद प्रथामय होने के कारण) बन्धन है । व्याख्या-सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण की विषय वृत्तियों वाला जीव विषय वासनाओं में रंगा रहता है । इससे उसे भेदमयज्ञान के कारण सुख-दुःख, राग- द्वेष तथा मोह आदि में निश्चय और विकल्प में अभिमान होता है । अतः भेदप्रथा का ज्ञान ही जीव को बन्धन में डाल कर उसे जन्म-मरण के चक्र में यातनादेह धारण करवाता है ॥२॥ सम्बन्ध-यहाँ यह शङ्का होती है कि सर्वशब्द वाच्य ज्ञेयजात ज्ञान से पृथक् नहीं हो सकता, अतः यह ज्ञान कैसे बन्धन का कारण हो सकता है ? इसके समाधान में कहते हैं कि यह बात सत्य है । परन्तु ऐसा तब ही हो सकता है जब योगी को पर- मेश्वर के प्रसाद से इस प्रकार के प्रत्यभिज्ञान का विमर्श हो । किन्तु जब परमेश्वर की मायाशक्ति से ऐसा विमर्श न हो तब माया के प्रभाव से अज्ञान का ज्ञान स्वरूपोपलब्धि में बाधक है । अतः तत्त्वों का अविवेक माया है, यह कहते हैं । कलादीनां तत्त्वानामविवेको माया ॥३॥ कलादीनां - कला तत्त्व से पृथ्वी तत्त्व तक तत्त्वानां - (इन) तत्त्वों का अविवेकः--अज्ञान (ही) माया --माया (कहलाती है) । व्याख्या--मालिनीविजयोत्तर तन्त्र के अनुसार अवरोह-क्रम में परमशिव की स्वा- तन्त्र्य शक्ति से पाँच शक्तियाँ प्रकाशित हैं (१) चित् (२) आनन्द (३) इच्छा (४) ज्ञान

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