भारतकोश
शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation

महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा

स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

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२६ : शिवसूत्र विमर्श और (५) क्रिया। इन शक्तियों के पाँच ऐश्वर्य क्रमशः (१) सर्वज्ञता (२) सर्वकर्तृता (३) पूर्णता (४) नित्यता और (५) सर्वव्यापकता हैं। यही शक्तियाँ मायाशक्ति द्वारा क्रमशः (१) विद्या (२) कला (३) राग (४) काल और (५) नियति में परिवर्तित होती हैं। उपरोक्त ऐश्वर्य फलतः पाँच गुणों में परिवर्तित होते हैं। यह गुण क्रमशः इस प्रकार हैं-- (१) अल्पज्ञता (२) अल्पकर्तृता (३) अपूर्णता (४) अनित्यता तथा (५) नियति (अर्थात् नियतरूपता) यह गुण मायाशक्ति के प्रभाव से अज्ञान का ही बोध कराने वाले हैं। इनके साथ साथ तीन मलों अर्थात् कोशत्रय का उद्भव होता है। वे तीन मल इस प्रकार हैं-- (१) आणव मल-इस मल से स्वातन्त्र्य का अभाव अर्थात् अपूर्णता का अनुभव होने लगता है-स्वरूप के अन्दर नहीं रहा जा सकता है। (२) मायीय मल-इस मल से भिन्न वेद्य प्रथा अर्थात् द्वैत प्रथा का भान होने लगता है। (३) कार्म मल-इस मल से कर्माशय के कारण शुभ और अशुभ वासनाएँ प्रकट होती हैं और स्थूल शरीरों का आश्रय लिया जाता है। ऐसे ही छत्तीस तत्त्वों का विकास होने में आता है। परमशिव ने अवरोह क्रम में सात प्रमाता प्रकाशमान किये, जिनके अन्तर्गत छत्तीस (३६) तत्त्व, सात (७) अवस्थायें, परामर्श और वाणी के चार रूप हैं। इनकी तालिका यहाँ पाठकों के सुबोधार्थ दी जाती है :-- छत्तीस तत्त्व इस प्रकार हैं-- १. शिव } | १४. अहंकार २७. शब्द ] पंच २. शक्ति } | १५. बुद्धि २८. स्पर्श ] तन्मा- ३. सदाशिव } शुद्धाध्वा १६. मन २९. रूप } त्राणि- ४. ईश्वर } १७. श्रोत्र } ३०. रस ] ५. शुद्ध विद्या ] १८. त्वक् } पंच ३१. गन्ध ] ६. माया (माया तथा महामाया) १९. चक्षु } ज्ञाने- ३२. आकाश ] ७. कला ] २०. जिह्वा } न्द्रिय ३३. वायु ] पंच ८. विद्या ] पंच २१. घ्राण } ३४. अग्नि ] भूतानि ९. राग } कञ्चुक २२. वाक् } ३५. जल ] १०. काल ] २३. पाणि } पंच ३६. पृथिवी ] ११. नियति ] २४. पाद } कर्में- १२. पुरुष २५. पायु } न्द्रिय १३. प्रकृति २६. उपस्थ }

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