भारतकोश
शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation

महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा

स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

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३२ : शिवसूत्र विमर्श धारणा परमात्मत्वं धार्यते येन सर्वदा । धारणा सा विनिर्दिष्टा भवपाशनिवारिणी ॥ स्वपरस्थेषु भूतेषु जगत्यस्मिन्समानधीः । शिवोऽहमद्वितीयोऽहं समाधिः स परः स्मृतः ॥ —(अ० ८, श्लो० ११-१८) अर्थ—प्राण और अपान की गति के बीच में मध्यम प्राण अर्थात् उदान के संविद्रूप प्राणीय मध्यमभाग में निमज्जन करके ज्ञानशक्ति अर्थात् चिद्व्याप्ति में निमज्जित होकर ठहरने को आसन कहते हैं। चिद्रूपता के सदोदित होने के कारण यहाँ बुद्धि का अभाव रहता है क्योंकि अभेद चिन्मय अवस्था में ही शुद्धबोध होता है। स्थूल प्राणायाम रेचकपूरकादि स्वभाव वाला होता है। इसको छोड़कर आन्तर मध्यपथ से रेचनपूरणादि रूप प्राणायाम सूक्ष्म होता है। इस सूक्ष्म प्राणायाम से अतीत स्पन्दन का प्रादुर्भाव होता है। इसे परम-स्पन्द कहते हैं। यहाँ प्राणादि चित्स्फुरण का अभाव रहता है। यही उत्कृष्ट प्राणायाम कहा गया है। इसका आसाधन स्थिर होने पर योगी चित्प्रमातृमयता को कभी नहीं छोड़ता, परप्रमातृभाव में सदा आनन्दमय रहता है जिससे फिर संसार-सरणि में नहीं आने पाता है। शब्द, स्पर्श आदि में सात्त्विक या तामसिक जो कोई वृत्ति अस्पष्ट रूप से अनुभव की जाती है उसका अनादर करके योगी प्रमाताचित्त से अविकल्प संवित्परामर्श के द्वारा पर-चित् धाम में प्रवेश करता है। इसी को संसार पाश को काट डालने वाला प्रत्याहार कहते हैं। अविकल्प संवित्परामर्श के द्वारा बुद्धि के सत्त्वादि गुणों का शमन करने से नियत आकारादि ध्येय वस्तु का तथा धारणा देशों का उल्लङ्घन किया जाता है। ऐसा होने पर योगी का ध्येय स्वसंवेद्य स्वप्रकाशता ही होती है जो व्यापक, अव्यय और नित्य है। इसी दशा को बुद्धिमान् जन ध्यान कहते हैं। जो योगी सर्वदा आत्मसमावेश द्वारा चैतन्यरूप परमात्मभाव का आलम्बन लेता है उसकी उस चैतन्य विमर्शनात्मा वृत्ति को धारणा कहते हैं। यह धारणा भव-पाश को हटाती है। जगत् में ग्राह्य-ग्राहक रूप से ठहरे हुए भावों में जब 'यह सब कुछ मैं ही हूँ' यह निश्चय हो और 'अहंता' व 'इदंता' की समानाधिकरणरूप शुद्धविद्या टिक जाय तो पर- समाधि सिद्ध होती है। अतः शिवव्याप्ति से परतत्त्व में ही समावेश होता है। आत्मव्याप्ति में सम्भव मित-सिद्धियां नहीं। यह अगले सूत्र में कहते हैं।