शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation
महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा
स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय विकास : ३३ मोहजयादनन्ताभोगात्सहजविद्याजयः ॥७॥ मोहजयात्—(समाधि में आत्मव्याप्ति तक) मोह के विजय होने पर अनन्त—अनन्तता अर्थात् शिवव्याप्ति आभोगात्—के विस्तार से सहजविद्या—सात्त्विक विद्या (समाधि और व्युत्थान दोनों में चिद्रूप आनन्द) जयः—की प्राप्ति होती है । व्याख्या—अख्याति (अज्ञान) रूप पाश को मोह-माया कहते हैं । इसका प्रभाव समना अवस्था तक होता है । योगी को तुर्य अर्थात् शक्ति-व्यापिनी समना तक माया- जाल का रंग रहता है । स्वच्छन्द तन्त्र में शिव पार्वती से कहते हैं : “समनान्तं वरारोहे पाशजालमनन्तकम् ।” अर्थ—हे पार्वती ! (योगी को) समना अवस्था तक भी माया-पाश का अन्त नहीं होता है । इस माया के मोह पर विजय पाने से योगी के सब संस्कारों का शमन होता है और यही अनन्तता का विस्तार है । इसे उन्मना अवस्था अथवा शिव-व्याप्ति कहते हैं जो चैतन्य स्वरूप में स्थिरता पाने का हेतु बनती है, क्योंकि आणवोपाय में ध्यानादि- साधन का शुद्ध चिन्तनादि में ही पर्यवसान होता है । श्री स्वच्छन्द-तन्त्र में आगे कहा है : पाशावलोकनं त्यक्त्वा स्वरूपालोकनं हि यत् । आत्मव्याप्तिर्भवेत्येषा चैतन्ये हेतुरूपिणी ॥ सार्वज्ञादिगुणा येऽथा व्यापकान्भावयेद्यदा । शिवव्याप्तिर्भवेदेषा चैतन्ये सेतुरूपिणी ॥ अर्थ—माया पाश को छोड़कर जो स्वरूप का अवलोकन (अनुभव) समाधि में होता है उसे आत्मव्याप्ति कहते हैं । शिवव्याप्ति इससे कुछ और ही है । जब योगी सर्वज्ञता आदि गुणों के भावों को अहं-व्यापकता की भावना में लाता है तो यह शिवव्याप्ति है जो योगी को चैतन्यस्वरूपता में प्रेरित करती है । इस प्रकार आत्मव्याप्ति के अन्त तक मोह पर विजय पाने से उन्मना अर्थात् शिव- व्याप्ति रूप सात्त्विक विद्या योगी को प्राप्त होती है । यही वह सहजावस्था है जहाँ योगी को अनायास ही स्वाभाविक रूप से समाधि अथवा व्युत्थान दशा में संकोच रहित परमशिवरूपता ही रहती है । यह शिव-व्याप्ति की पहली किरण है जिस में सहज-विद्या प्राप्ति होती है । यह स्वानुभूति प्रकाशरूप है जिस में अहंता पूर्णविमर्शरूप होती है ॥७॥ सम्बन्ध—अब शक्तिरूपता का वर्णन करते हैं । ३