शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation
महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा
स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३८ : शिवसूत्र विमर्श आसनस्थः सुखं ह्रदे निमज्जति ॥१६॥ आसनस्थः- (योगो) आत्मा के साथ एकरूप होकर सुखं-स्वभाव से अर्थात् आयासरहित सुख से ह्रदे-चित्स्वरूप के परमामृत समुद्र में निमज्जति - डूब जाता है। व्याख्या-जिस दशा में योगी आत्मा के साथ सदा एकरूप होकर स्थिर रहता है उसे आसन कहते हैं । जैसे नेत्रतन्त्र में : मध्यं प्राणमाश्रित्य प्राणापानपथान्तरम् आलम्ब्य ज्ञानशक्तिं च तत्स्थं चैवासनं लभेत् ॥ अर्थ-प्राण तथा अपान के रास्ते में मध्यम प्राण (अर्थात् कुम्भक भाव) का आश्रय लेकर ज्ञानशक्ति के सहारे उसमें ठहरने का आसन धारण करे । 'न तु ऋजुत्वं शुष्कवृक्षवत् इति' । यही उसका परम शाक्त बल अथवा चिद्बल है। इस दशा में उसे पर अथवा अपर (निराकार अथवा साकार) ध्यान, धारणा आदि क्रियाओं (अभ्यास) में प्रयास (अथवा प्रयत्न) नहीं करना पड़ता है । वह नित्य अन्तर्मुख भाव में आत्मा के साथ एकता के परामर्श में ही आकर्षित रहता है । इसी को निराभास पद कहते हैं । इस निराभास पद का वर्णन श्री नेत्रतन्त्र में अवलोकनीय है । पूर्वावस्था में दृढ़ तथा निरन्तर अभ्यास करने से योगी को आत्मा के साथ यह लगन स्वाभाविक बन चुकी होती है । अतः अब इस सूत्र में उसे ध्यानादि प्रयास नहीं करने पड़ते । इस प्रकार वह सुखस्वरूप होकर, विश्व के प्रवाह तथा प्रसर (निर्म- लता तथा उत्पत्ति) के हेतु परमामृत समुद्र में, देहादि में आत्माभिमान रूप संकोच और उसके सम्बन्ध में सब संस्कारों से निवृत्त होकर, तन्मय हो जाता है । जैसे अष्टावक्रगीता में कहा है : निर्वासनं हरिं दृष्ट्वा तूष्णीं विषयदन्तिनः । पलायन्ते न शक्तास्ते सेवन्ते कृतचाटवः ॥ न मुक्तिकारिकां धत्ते निःशङ्को युक्तमानसः । पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्नास्ते यथासुखम् ॥ अर्थ-वासना रहित पुरुष-सिंह को देखकर विषय रूपी हाथी असमर्थ होकर चुप- चाप भाग जाते हैं और उसकी ओर आकर्षित होकर स्वयं सेवा में रहते हैं। इस प्रकार संशय रहित और निश्चलमन वाला ज्ञानी यम-नियमादि योग क्रिया को आग्रह से नहीं करता है किन्तु लोकदृष्टि से देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूंघता हुआ, भोजन करता हुआ भी आत्मसुख में ही निमग्न रहता है ।