शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation
महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा
स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय विकास : ३९ श्रीमद्भगवद्गीता में ऐसे ही योगी के लिए संकेत है— ‘तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च’ अर्थ—अतः विषय-इन्द्रिय संयोग के सब व्यवहारों में मेरा (मुझ परमात्मा का) स्मरण कर और मलों से ऊपर उठने का अभ्यास-रूप युद्ध भी कर ॥१६॥ सम्बन्ध—आणवोपाय क्रम से नाडीसंहारादि (उ० ३, सू० ५) द्वारा मोह पर विजय पाकर शुद्धविद्यारूप (उ० १, सू० २१) शाक्तबल के प्रकर्ष से योगी शाम्भवपद- रूप परामृत समुद्र में तन्मय हो जाता है। इस स्वतन्त्र पद पर अधिरूढ़ होकर योगी वेद्य तथा वेदक के अवभासरूप जगत् का अपनी इच्छा से निर्माण करता है। अब यह बतलाते हैं। स्वमात्रानिर्माणमापादयति ॥१७॥ स्वमात्रा—(तब योगी) अपनी इच्छा के अनुसार निर्माणं—जगत् के जाग्रत् तथा स्वप्न में सब सिद्धियों का आपादयति—सम्पदावान् बन जाता है। व्याख्या—क्रम पूर्वक शाम्भवोपाय द्वारा प्राप्त स्वतन्त्र पद पर ठहरा योगी अपनी विश्व-व्यापिनी इच्छा के द्वारा वेद्यवेदक के अवभासन रूप जगत् की सृष्टि भी करता है और विनाश भी। यह सम्पत्ति उसको जाग्रदादि अवस्थाओं में सिद्ध होती है ॥१७॥ सम्बन्ध—इस स्वातन्त्र्य से योगी को पुनर्जन्म का अभाव होना कहा है। विद्याऽविनाशे जन्मविनाश : ॥१८॥ विद्या—शुद्ध विद्या के अविनाशे—लगातार रहने पर जन्मविनाश :—(ऐसे योगी को) जन्मादि बन्धन नहीं रहता। व्याख्या—शुद्धविद्या के बल से शाम्भव पद पर ठहरा योगी जब आत्मा के साथ एकता का अनुभव लगातार करता है तो उसकी वह अवस्था स्वाभाविक होने के कारण सहजावस्था कहलाती है। स्थूल और सूक्ष्म देह और इन्द्रियों का समूह सदा दुःख से भरे होते हैं क्योंकि वे ही कर्म (बन्ध) के हेतु और अज्ञान (माया-मोह) के साथी हैं। अतः इन के द्वारा जन्म- मरण आदि बन्धन में जीव सदा यातना-ग्रस्त रहता है। परन्तु जब योगी को सहजावस्था प्राप्त होती है तो जन्मादि सब यातनाओं का सर्वथा नाश हो ही गया होता है ॥१८॥ सम्बन्ध—परन्तु संवित्-तत्त्व को पाकर भी योगी कभी प्रमाद के वश से मोह में फिर पड़ जाता है। जब उसका शुद्धविद्यास्वरूप किञ्चित् आवृत होने लगता है, तब :