भारतकोश
शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation

महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा

स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

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तृतीय विकास : ४३ सम्बन्ध—इस प्रकार परमपद में प्रवेश किये हुए योगी के, अवस्थाओं में, अभ्यास का वर्णन किया । यह उसकी विश्वोत्तीर्ण अवस्था का अनुभव है । अब योगी की विश्व- मय अवस्था का अनुभव बताने के लिए व्युत्थान दशा में उसकी इन अवस्थाओं का निर्णय करते हैं अर्थात् प्रवेशदशा का वर्णन करके अब प्रसरदशा का वर्णन करते हैं । इन दोनों दशाओं में वह स्वरूपलाभनिष्ठ ही रहता है । प्राणसमाचारे समदर्शनम् ॥२२॥ प्राणसमाचारे—(प्राण + सम + आ + चारे) प्राण—प्राण के सम—बराबर (समरूप से) आ—धीरे-धीरे चारे—बहिः प्रसर करते हुए समदर्शनम्—चिदानन्दघनरूपता से एकता का अनुभव होता है । व्याख्या—तुर्यरस से योगी का प्राण परमेश्वर के शक्तिस्फार की सुगन्धि से युक्त होता है । उसकी सब वासना-ग्रन्थियों का भेदन हुआ होता है । इस कुम्भक-भाव से जब प्राण धीरे-धीरे और समता में बहिःप्रसर करने लगता है तो उस समय भी वह उस सुगन्धि से आनन्द का अनुभव करता है । इस प्रकार वह व्यवहार करते हुए भी सभी अवस्थाओं में चिदानन्दघनरूप होता है । व्यवहार में भी उसे अभेद दृष्टि का आनन्द रहता है । इसी को निर्व्युत्थान समाधि का साक्षात्कार कहते हैं क्योंकि तुर्य दशा से निकलकर उसे निमेष में प्राण-रोध (समाधि) और उन्मेष में प्राण-प्रवाह (व्युत्थान) रहता है । इसे तुर्यातीत-पद कहते हैं ॥२२॥ सम्बन्ध—परन्तु जब योगी मन्दप्राय होने के कारण इस तुर्यातीतपद में प्रवेश नहीं कर सकता तब वह तुर्य चमत्कार से जाग्रत् में और फिर जाग्रत् से तुर्यचमत्कार के अनुभव में ही सन्तुष्ट रहता है । अब आगे के सूत्र में यह कहते हैं । मध्येऽवरप्रसवः ॥२३॥ मध्ये—जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति की मध्य अवस्थाओं में अवरः—कुत्सित (अश्रेष्ठ-भेदप्रथामय) प्रसवः—प्रसर-रूप प्रवेश (या स्वरूपलाभ) होता है । व्याख्या—मन्द प्राय योगी जो केवल अन्तर्मुख भाव में तुर्य का आस्वाद ले सकता है और तुर्य दशा से निकल कर निमेष के प्राण-रोध और उन्मेष के प्राण-प्रवाह में चिदानन्द की एकरूपता का अनुभव नहीं कर सकता है वह जाग्रत् स्वप्न या सुषुप्ति की मध्य अवस्था में भेदप्रथायुक्त प्रवेश का ही अनुभव करता है । अर्थात् ऐसे योगी को