शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation
महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा
स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 68, कुल 108 में से
संदर्भ में पढ़ें४४ : शिवसूत्र विमर्श जाग्रत् और सुषुप्ति, जाग्रत् और स्वप्न तथा स्वप्न और सुषुप्ति की सन्धियों में ही (आदि और अन्त कोटियों पर) स्वरूपलाभ होता है। केवल जाग्रत्, केवल स्वप्न अथवा केवल सुषुप्ति में उसे स्वरूपलाभ का अनुभव नहीं रहता है। उसे अनित्य दिव्य भोगों का प्रलोभन विघ्नों में डाल सकता है। परन्तु वह सदा मोह में नहीं रहता। उसे तुर्यावस्था के अनुभव में रुकावट नहीं होती अर्थात् वह सदैव मोह में नहीं पड़ता है क्योंकि उसे तुर्य-चमत्कार की सुगन्ध साथ रहती है। श्री मालिनीविजयोत्तर तन्त्र में कहा है : वासनामात्रलाभेऽपि योऽप्रमत्तो न जायते । तमनित्येषु भोगेषु योजयन्ति विनायकाः ।। तस्मान्न तेषु संसक्तिं कुर्वीतोत्तमवाञ्छया । अर्थ—तुर्य चमत्कार का सुगन्धि-लाभ होने पर भी योगी प्रमाद में पड़ता है। उसे विघ्न-कृत विनायक (सिद्ध) अनित्य भोगों का प्रलोभन देते हैं। अतः सर्वोत्तम पद (तुर्यातीत-पद) की इच्छा वाले योगी को उनमें आसक्त नहीं होना चाहिये । अतः ऐसे योगी को इन प्रलोभनों में नहीं फंसना चाहिये ।।२३।। सम्बन्ध—इसी प्रसंग में कहते हैं कि यदि योगी तुर्यरस (के आश्रय) से व्युत्थान- दशा में भी मध्यपद को सिंचन कर सके, तब मात्रास्वप्रत्ययसन्धाने नष्टस्य पुनरुत्थानम् ॥२४॥ मात्रा—दृष्ट घटपटादि पदार्थरूप प्रमेय संसार में (साथ ही) स्वप्रत्ययसन्धाने—स्वचित्तभाव (स्वात्मानुसन्धान) के अभ्यास पर नष्टस्य—(योगी का) अवर प्रसर नष्ट होने से पुनः—फिर से उसे उत्थानम्—स्वरूप का उदय होता है । व्याख्या--विश्व पदार्थ जब पाँच प्रकार के विषयों में परिमित होते हैं तब इन्हें मात्रा कहते हैं। यह रूपादि विषय हैं जिस प्रकार घटपटादि पदार्थ । यह सब प्रमेय संसार है । जिस योगी के विषय में ऊपर २३वें सूत्र में वर्णन है ऐसा योगी जब जाग्रत्, स्वप्न या सुषुप्ति की मध्य अवस्था के अवर प्रसर अर्थात् भेदप्रथायुक्त प्रवेश से निकल कर साथ ही आत्मानुसन्धान में लगा रहता है उसे प्रलोभन नहीं सताते । अभ्यास में लगे रहने के कारण उसका पूर्व अवर प्रसर नष्ट होने लगता है । उसे तुर्यचमत्कार की सुगन्धि साथ रहती है। अतः वह कुत्सित संसार में सुख से नहीं ठहर सकता है । वह विश्व पदार्थों में 'इदमहम्-यह मैं हूँ' का अनुभव करता है। उसकी भावना 'सर्वमिदमहं च ब्रह्मैव' इस श्रुति उक्ति के अनुसार दृढ़ होने लगती है। इस तरह