शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation
महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा
स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय विकास : ४५ उसे स्वरूप का उदय फिर होता है और वह आत्मा की चिद्घनरूपता का अनुसन्धान करता है । इस विषय में प्रातः स्मरणीय श्री लक्ष्मण जी महाराज से भगवान् उत्पल के विषय में एक आख्यायिका सुनने को मिली है, वह यहाँ प्रस्तुत है : ''उत्पलदेव अपनी आयु के उत्तरार्ध में स्वचित्तभाव के अभ्यास में निरन्तर लगे रहते थे । वे प्रायः चित्स्वरूपता के अनुभव में निमग्न रहते थे । एक बार वे इसी अवस्था में किसी एक स्थान पर बैठे थे जहाँ बादाम के शगूफे खिले थे और शगूफों की पंखुड़ियां पृथ्वी पर इधर-उधर बिखरी पड़ी थीं । किसी कारण इनकी समाधि खुल गई । इस व्युत्थान दशा में जब आँखें खुलीं तो सामने शगूफों की पंखुड़ियां बिखरी हुई देखीं । इन्हें देखते ही वे सहसा बोल उठे—'आह ! भक्तजनों ने भगवान पर पुष्प चढ़ाये हैं, केवल मैं ही पीछे रह गया हूँ'—इस पर भावविभोर होकर वे फिर समाधि में लीन हो गए ।'' इस प्रकार भगवान् उत्पल इस प्रसंग में चिद्घनरूपता के अनुसन्धान में गए । यही 'इदमहम्' भाव की स्थिति है जो भगवान् उत्पल को प्राप्त थी । ऐसी दशा में अवर प्रसर होना सम्भव नहीं, न ही मितसिद्धियों की ओर झुकने की सम्भा- वना है । इस दशा में प्रमेय संसार में आते ही योगी को साथ ही स्वरूप का उदय फिर होता है । उस का मन तुर्य चमत्कार की सुगन्धि से सुवासित होकर सदैव स्वरूप में ही समाहित रहता है । सदा योगनिष्ठ रहने के कारण वह कभी प्रमाद के वश नहीं होता । श्री स्वच्छन्द शास्त्र में कहा है : यस्य ज्ञेयमयो भावः स्थिरः पूर्णः समन्ततः । मनो न चलते तस्य सर्वावस्थागतस्य तु ॥ अर्थ—जिस योगी को परतत्त्वभाव में सब प्रकार से और पूर्णरूप से स्थिरता प्राप्त होती है उसका मन सब अवस्थाओं (समाधि और व्युत्थान) में चलायमान नहीं होता । इसके लिए वहीं युक्ति भी कही है : यत्र यत्र मनो याति ज्ञेयं तत्रैव चिन्तयेत् । चलित्वा यास्यते कुत्र सर्वं शिवमयं यतः ॥ अर्थ—ऐसे महायोगी का मन ही परतत्त्व की ऐक्य-भावना से वासित रहता है । अतः जिस ओर भी उसका मन जाता है वहाँ वह अपने ज्ञेय अर्थात् तुर्यातीत पद का ही सब ओर से चिन्तन करता है (क्योंकि उसका यह निश्चय दृढ़ हुआ होता है कि सब कुछ शिवमय ही है ।) योगी की इस युक्ति को और भी स्पष्ट करने के अर्थ से कहा है : विषयेषु च सर्वेषु इन्द्रियार्थेषु च स्थितः । यत्र तत्र निरूप्येत नाशिवं विद्यते क्वचित् ॥ अर्थ—साधारण विषयों में भी, जहाँ पदार्थ इन्द्रियों को अपनी ओर आकर्षित करते