भारतकोश
शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation

महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा

स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

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४६ : शिवसूत्र विमर्श हैं, ठहरा हुआ (तुर्य चमत्कार को सुगन्धियुक्त) उत्तम योगी जहाँ कहीं इनमें विचार अर्थात् खोज करता है, तो किसी सूरत में भी उसका अकल्याण नहीं होता है। वह पर-प्रकाश की आनन्दघनता में शिव के साथ एकता को प्राप्त हुआ होता है ॥२४॥ सम्बन्ध—तुर्य चमत्कार की सुगन्धि से भली-भाँति युक्त योगी की दशा का वर्णन करते हैं— शिवतुल्यो जायते ॥२५॥ शिवतुल्यः—(ऐसा योगी) शिव के साथ एकता को जायते—प्राप्त होता है। व्याख्या—अभ्यास-घनता के कारण जब तुर्य-चमत्कार की सुगन्ध अधिकाधिक आने लगती है तो योगी तुर्यातीत-पद में स्थिर होने लगता है। वह परिपूर्ण स्वच्छन्द चिदा- नन्दघन भगवान् शिव के तुल्य होता है। जब तक उसकी देह-कला किञ्चित्-मात्र भी रहती है तब तक वह शिव के समान होता है। इसे सारूप्य मुक्ति कहते हैं। देह-कला (अर्थात् देहवासना) के भी गल जाने पर योगी शिव के साथ ऐक्य को प्राप्त करता है अर्थात् वह साक्षात् शिव ही होता है। इसे सायुज्य मुक्ति कहते हैं। इस बात को श्रीकालिकाक्रम में स्पष्ट किया गया है : तस्मान्नित्यमसंदिग्धं बुद्ध्वा योगं गुरोर्मुखात्। अविकल्पेन भावेन भावयेत्तन्मयत्वतः॥ यावत्तत्समतां याति, भगवान्भैरवोऽब्रवीत्। अर्थ—अतः श्रीगुरुमुख से इस अलौकिक योग का श्रवण कर उस पर मनन और निदिध्यासन करने से शंकारहित होकर योगी को अविकल्प विमर्श का आश्रय लेकर शिव- मय भावना से तुर्यातीत पद का तब तक अभ्यास करना चाहिए जब तक शिव के साथ समता न हो जाए। यह बात स्वयं भगवान् भैरव ने कही है अर्थात् यह अटल निश्चय है ॥२५॥ सम्बन्ध—परन्तु इस योगी की देह में तो स्थिति होती ही है। यह त्यागने योग्य नहीं है क्योंकि जिन कर्मों से यह जाति, आयु और भोगरूप शरीर बना है उन का भोग द्वारा पूरा करने से ही प्रारब्ध की शुद्धि होती है, जैसे श्रुति कहती है : ‘प्रारब्धकर्मणां भोगादेव क्षयः’ अर्थ—शरीर तो प्रारब्ध कर्मों के अनुरूप ही बना होता है। अतः इन कर्मों का क्षय (समाप्ति) शरीर द्वारा इनके भोगने से ही होता है। अतः देहनिर्वाहपर्यन्त—जब तक जाति, आयु और भोगरूप प्रारब्ध कर्मों की परि- समाप्ति न हो इस संसिद्ध योगी की देह में स्थिति कैसे होती है यह बताते हैं :