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शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation

महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा

स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

४४ : शिवसूत्र विमर्श जाग्रत् और सुषुप्ति, जाग्रत् और स्वप्न तथा स्वप्न और सुषुप्ति की सन्धियों में ही (आदि और अन्त कोटियों पर) स्वरूपलाभ होता है। केवल जाग्रत्, केवल स्वप्न अथवा केवल सुषुप्ति में उसे स्वरूपलाभ का अनुभव नहीं रहता है। उसे अनित्य दिव्य भोगों का प्रलोभन विघ्नों में डाल सकता है। परन्तु वह सदा मोह में नहीं रहता। उसे तुर्यावस्था के अनुभव में रुकावट नहीं होती अर्थात् वह सदैव मोह में नहीं पड़ता है क्योंकि उसे तुर्य-चमत्कार की सुगन्ध साथ रहती है। श्री मालिनीविजयोत्तर तन्त्र में कहा है : वासनामात्रलाभेऽपि योऽप्रमत्तो न जायते । तमनित्येषु भोगेषु योजयन्ति विनायकाः ।। तस्मान्न तेषु संसक्तिं कुर्वीतोत्तमवाञ्छया । अर्थ—तुर्य चमत्कार का सुगन्धि-लाभ होने पर भी योगी प्रमाद में पड़ता है। उसे विघ्न-कृत विनायक (सिद्ध) अनित्य भोगों का प्रलोभन देते हैं। अतः सर्वोत्तम पद (तुर्यातीत-पद) की इच्छा वाले योगी को उनमें आसक्त नहीं होना चाहिये । अतः ऐसे योगी को इन प्रलोभनों में नहीं फंसना चाहिये ।।२३।। सम्बन्ध—इसी प्रसंग में कहते हैं कि यदि योगी तुर्यरस (के आश्रय) से व्युत्थान- दशा में भी मध्यपद को सिंचन कर सके, तब मात्रास्वप्रत्ययसन्धाने नष्टस्य पुनरुत्थानम् ॥२४॥ मात्रा—दृष्ट घटपटादि पदार्थरूप प्रमेय संसार में (साथ ही) स्वप्रत्ययसन्धाने—स्वचित्तभाव (स्वात्मानुसन्धान) के अभ्यास पर नष्टस्य—(योगी का) अवर प्रसर नष्ट होने से पुनः—फिर से उसे उत्थानम्—स्वरूप का उदय होता है । व्याख्या--विश्व पदार्थ जब पाँच प्रकार के विषयों में परिमित होते हैं तब इन्हें मात्रा कहते हैं। यह रूपादि विषय हैं जिस प्रकार घटपटादि पदार्थ । यह सब प्रमेय संसार है । जिस योगी के विषय में ऊपर २३वें सूत्र में वर्णन है ऐसा योगी जब जाग्रत्, स्वप्न या सुषुप्ति की मध्य अवस्था के अवर प्रसर अर्थात् भेदप्रथायुक्त प्रवेश से निकल कर साथ ही आत्मानुसन्धान में लगा रहता है उसे प्रलोभन नहीं सताते । अभ्यास में लगे रहने के कारण उसका पूर्व अवर प्रसर नष्ट होने लगता है । उसे तुर्यचमत्कार की सुगन्धि साथ रहती है। अतः वह कुत्सित संसार में सुख से नहीं ठहर सकता है । वह विश्व पदार्थों में 'इदमहम्-यह मैं हूँ' का अनुभव करता है। उसकी भावना 'सर्वमिदमहं च ब्रह्मैव' इस श्रुति उक्ति के अनुसार दृढ़ होने लगती है। इस तरह

तृतीय विकास : ४५ उसे स्वरूप का उदय फिर होता है और वह आत्मा की चिद्घनरूपता का अनुसन्धान करता है । इस विषय में प्रातः स्मरणीय श्री लक्ष्मण जी महाराज से भगवान् उत्पल के विषय में एक आख्यायिका सुनने को मिली है, वह यहाँ प्रस्तुत है : ''उत्पलदेव अपनी आयु के उत्तरार्ध में स्वचित्तभाव के अभ्यास में निरन्तर लगे रहते थे । वे प्रायः चित्स्वरूपता के अनुभव में निमग्न रहते थे । एक बार वे इसी अवस्था में किसी एक स्थान पर बैठे थे जहाँ बादाम के शगूफे खिले थे और शगूफों की पंखुड़ियां पृथ्वी पर इधर-उधर बिखरी पड़ी थीं । किसी कारण इनकी समाधि खुल गई । इस व्युत्थान दशा में जब आँखें खुलीं तो सामने शगूफों की पंखुड़ियां बिखरी हुई देखीं । इन्हें देखते ही वे सहसा बोल उठे—'आह ! भक्तजनों ने भगवान पर पुष्प चढ़ाये हैं, केवल मैं ही पीछे रह गया हूँ'—इस पर भावविभोर होकर वे फिर समाधि में लीन हो गए ।'' इस प्रकार भगवान् उत्पल इस प्रसंग में चिद्घनरूपता के अनुसन्धान में गए । यही 'इदमहम्' भाव की स्थिति है जो भगवान् उत्पल को प्राप्त थी । ऐसी दशा में अवर प्रसर होना सम्भव नहीं, न ही मितसिद्धियों की ओर झुकने की सम्भा- वना है । इस दशा में प्रमेय संसार में आते ही योगी को साथ ही स्वरूप का उदय फिर होता है । उस का मन तुर्य चमत्कार की सुगन्धि से सुवासित होकर सदैव स्वरूप में ही समाहित रहता है । सदा योगनिष्ठ रहने के कारण वह कभी प्रमाद के वश नहीं होता । श्री स्वच्छन्द शास्त्र में कहा है : यस्य ज्ञेयमयो भावः स्थिरः पूर्णः समन्ततः । मनो न चलते तस्य सर्वावस्थागतस्य तु ॥ अर्थ—जिस योगी को परतत्त्वभाव में सब प्रकार से और पूर्णरूप से स्थिरता प्राप्त होती है उसका मन सब अवस्थाओं (समाधि और व्युत्थान) में चलायमान नहीं होता । इसके लिए वहीं युक्ति भी कही है : यत्र यत्र मनो याति ज्ञेयं तत्रैव चिन्तयेत् । चलित्वा यास्यते कुत्र सर्वं शिवमयं यतः ॥ अर्थ—ऐसे महायोगी का मन ही परतत्त्व की ऐक्य-भावना से वासित रहता है । अतः जिस ओर भी उसका मन जाता है वहाँ वह अपने ज्ञेय अर्थात् तुर्यातीत पद का ही सब ओर से चिन्तन करता है (क्योंकि उसका यह निश्चय दृढ़ हुआ होता है कि सब कुछ शिवमय ही है ।) योगी की इस युक्ति को और भी स्पष्ट करने के अर्थ से कहा है : विषयेषु च सर्वेषु इन्द्रियार्थेषु च स्थितः । यत्र तत्र निरूप्येत नाशिवं विद्यते क्वचित् ॥ अर्थ—साधारण विषयों में भी, जहाँ पदार्थ इन्द्रियों को अपनी ओर आकर्षित करते

४६ : शिवसूत्र विमर्श हैं, ठहरा हुआ (तुर्य चमत्कार को सुगन्धियुक्त) उत्तम योगी जहाँ कहीं इनमें विचार अर्थात् खोज करता है, तो किसी सूरत में भी उसका अकल्याण नहीं होता है। वह पर-प्रकाश की आनन्दघनता में शिव के साथ एकता को प्राप्त हुआ होता है ॥२४॥ सम्बन्ध—तुर्य चमत्कार की सुगन्धि से भली-भाँति युक्त योगी की दशा का वर्णन करते हैं— शिवतुल्यो जायते ॥२५॥ शिवतुल्यः—(ऐसा योगी) शिव के साथ एकता को जायते—प्राप्त होता है। व्याख्या—अभ्यास-घनता के कारण जब तुर्य-चमत्कार की सुगन्ध अधिकाधिक आने लगती है तो योगी तुर्यातीत-पद में स्थिर होने लगता है। वह परिपूर्ण स्वच्छन्द चिदा- नन्दघन भगवान् शिव के तुल्य होता है। जब तक उसकी देह-कला किञ्चित्-मात्र भी रहती है तब तक वह शिव के समान होता है। इसे सारूप्य मुक्ति कहते हैं। देह-कला (अर्थात् देहवासना) के भी गल जाने पर योगी शिव के साथ ऐक्य को प्राप्त करता है अर्थात् वह साक्षात् शिव ही होता है। इसे सायुज्य मुक्ति कहते हैं। इस बात को श्रीकालिकाक्रम में स्पष्ट किया गया है : तस्मान्नित्यमसंदिग्धं बुद्ध्वा योगं गुरोर्मुखात्। अविकल्पेन भावेन भावयेत्तन्मयत्वतः॥ यावत्तत्समतां याति, भगवान्भैरवोऽब्रवीत्। अर्थ—अतः श्रीगुरुमुख से इस अलौकिक योग का श्रवण कर उस पर मनन और निदिध्यासन करने से शंकारहित होकर योगी को अविकल्प विमर्श का आश्रय लेकर शिव- मय भावना से तुर्यातीत पद का तब तक अभ्यास करना चाहिए जब तक शिव के साथ समता न हो जाए। यह बात स्वयं भगवान् भैरव ने कही है अर्थात् यह अटल निश्चय है ॥२५॥ सम्बन्ध—परन्तु इस योगी की देह में तो स्थिति होती ही है। यह त्यागने योग्य नहीं है क्योंकि जिन कर्मों से यह जाति, आयु और भोगरूप शरीर बना है उन का भोग द्वारा पूरा करने से ही प्रारब्ध की शुद्धि होती है, जैसे श्रुति कहती है : ‘प्रारब्धकर्मणां भोगादेव क्षयः’ अर्थ—शरीर तो प्रारब्ध कर्मों के अनुरूप ही बना होता है। अतः इन कर्मों का क्षय (समाप्ति) शरीर द्वारा इनके भोगने से ही होता है। अतः देहनिर्वाहपर्यन्त—जब तक जाति, आयु और भोगरूप प्रारब्ध कर्मों की परि- समाप्ति न हो इस संसिद्ध योगी की देह में स्थिति कैसे होती है यह बताते हैं :

तृतीय विकास : ४७ शरीरवृत्तिर्व्रतम् ॥२६॥ शरीरवृत्तिः--(शिवोऽहं-मैं शिव हूँ, इस भावना में ठहरे इस योगी की) शरीर में स्थिति व्रतम्--जीवन के साधारण नियम के अनुसार ही होती है। व्याख्या—अब इस संसिद्धयोगी का आत्मसंयम प्रारब्ध के अनुसार साधारण जीवन के प्रवाह के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता है। शिवोऽहं भावना में अभ्यास-घनता के कारण स्थिर होने से इस योगी को देह-वासना का सम्बन्ध छूटा होता है। केवल प्रारब्ध की परिसमाप्ति तक उसे देह में ठहरना पड़ता है। देह, प्राण आदि में ठहरते हुए भी उसे शिव-समावेश बना रहता है। इस का प्रमाण श्री स्वच्छन्द शास्त्र में मिलता है : सुप्रदीप्ते यथा वह्नौ शिखा दृश्येत चाम्बरे । देहप्राणस्थितोऽप्यात्मा तद्वल्लीयेत तत्पदे ॥ अर्थ—जिस प्रकार (काष्ठादि ढेर में लगी) अग्नि की शिखा आकाश में लीन होती देखी जाती है, उसी प्रकार देह, प्राणादि में ठहरी हुई संसिद्धयोगी की आत्मा तत्पद अर्थात् शिवस्वरूप में लीन होती है। अरणिमन्थन की युक्ति से अग्नि के प्रज्वलित होने पर जैसे उसकी ज्वाला-दाह्य- वस्तु को जलाकर आकाश में दिखाई देती है और वहाँ लीन होकर तदात्मभाव को प्राप्त होती है वैसे ही दिव्यकरण और मन्त्ररूप अरणि के उत्तेजित होने से योगी के देह में प्राण प्रदीप्त होकर मध्यनाडी में ऊर्ध्ववाही होकर उदान-वह्नि में प्रज्वलित होता है। इस योगी की आत्मा जो देह में ठहरी हुई है, केवल शुद्धविज्ञानरूप अग्नि के समान समना के अन्त तक देहरूप लकड़ी को जलाकर तुर्यातीत पद में लीन होती है अर्थात् उपाधिरहित परमशिव के साथ एक होती है। अतः योगी के देह में स्थिति प्रारब्ध कर्मानुसार ही रहती है। उसके लिए साधा- रण कर्म करने के अतिरिक्त और कोई व्रत नहीं होता है। वह केवल अविकारी होकर विकारी सा प्रतीत होता है। विवेक-चूड़ामणि में भगवान् आद्य शङ्कराचार्य कहते हैं : उपाधिसम्बन्धवशात्परात्मा ह्यु पाधिधर्माननुभाति तद्गुणः अयोविकारानविकारि वह्निव- त्सदैकरूपोऽपि परः स्वभावात् ॥१९३॥ अर्थ—वह परात्मा स्वरूप से सदा एक रूप ही है तथापि उपाधि के सम्बन्ध से उसके गुणों से युक्त-सा होकर उसो के धर्मों को प्रकाशित करता है जिस प्रकार कि लोहे के विकारों में व्याप्त हुई अविकारी अग्नि विकारी सी प्रतीत होती है।

४८ : शिवसूत्र विमर्श यही बात श्रीत्रिकसार में इस प्रकार वर्णित है : देहोत्थिताभिर्मुद्राभिर्यः सदा मुद्रितो बुधः । स तु मुद्राधरः प्रोक्तः शेषा वै अस्थिधारकाः ॥ अर्थ—शरीर-कला की साधारण क्रियाओं में वह बुद्धिकौशलयुक्त योगी सदा 'अन्त- र्लक्ष्यबहिर्दृष्टि' इस प्रकार शाम्भवी मुद्रा से मुद्रित होता है। उसी को मुद्राधर अर्थात् शिव कहा है। शेष तो सब प्राणी हड्डियों के पिञ्जर को ही धारणं करते हैं। इस संसिद्धयोगी के आत्मज्ञान का फल आचार्य शङ्कर विवेकचूडामणि में इस प्रकार कहते हैं : संसिद्धस्य फलं त्वेतज्जीवन्मुक्तस्य योगिनः । बहिरन्तः सदानन्दरसास्वादनमात्मनि ॥४१९॥ अर्थ—आत्मज्ञान में सम्यक् सिद्धि प्राप्त किए हुए जीवन्मुक्त योगी को यही फल मिलता है कि अपने आत्मा के नित्यानन्दरस का बाहर-भीतर निरन्तर आस्वादन किया करें। इस प्रकार बाहर-भीतर नित्यानन्दरस का निरन्तर आस्वादन करना ही परा- भक्ति है अर्थात् शिव-भक्ति के अमृत से पूर्ण शरीर में जो भी योगी की स्थिति होती है वही उसका व्रत है। इस स्थिति की पुष्टि के लिए भगवान् उत्पलदेव शिस्तोत्रावली में भगवान् शिव से यह अलौकिक प्रार्थना करते हैं : अन्तरुल्लसदच्छाच्छभक्तिपीयूषपोषितम् । भवत्पूजोपयोगाय शरीरमिदमस्तु मे ॥१७-२६॥ अर्थ—हे शङ्कर ! भीतर संवित् पद में मग्न हुए अत्यन्त निर्मल भक्तिपीयूष अर्थात् समावेश-अमृत से पाला-पोसा गया यह मेरा शरीर आप की पूजा के काम आ जाये अर्थात् आप चिदानन्दघन में ही विलीन हो जाय। स्वरूप-विमर्श रूप ज्ञान और परा-भक्ति पर्यायवाची हैं क्योंकि ये एक दूसरे पर आश्रित हैं। पराभक्ति स्वरूप भगवान् उत्पलदेव अलौकिक भक्तिरसपूर्ण शिवस्तोत्रावली में कहते हैं : यद्यथास्थितपदार्थदर्शनं युष्मदर्चनमहोत्सवश्च यः । युग्ममेतदितरेतराश्रयं भक्तिशालिषु सदा विजृम्भते ॥१३-७॥ अर्थ—(ज्ञान काल में) सभी सांसारिक वस्तुओं को आप चिद्रूप से अभिन्न देखना और (ध्यान, दर्शन और स्पर्शन-भक्तिकाल में) आप की पूजा का उत्सव, यह दोनों बातें एक दूसरे पर आश्रित रहती हैं। आप के अनन्य भक्तों में इन दोनों बातों का (क्रम- मुद्रा से) सदा विकास रहता है।

तृतीय विकास : ४९ इसी भाव से योगी की शरीर में स्थिति साधारण नियम के अनुसार होती है ॥२६॥ सम्बन्ध—अब ऐसे संसिद्ध योगी के आलाप आदि के विषय में कहते हैं। कथा जपः ॥२७॥ कथा--(अहं विमर्श में आरूढ़ इस योगी के) जो कुछ भी लौकिक-व्यवहार के अनुसार आलाप आदि (हों) जपः - (वह स्वात्मदेवता की भावना के तात्पर्य से) उस का जप ही है। व्याख्या—पराहंभावना में आरूढ़ योगी की भावना का उल्लेख श्रीस्वच्छन्दतन्त्र में इस प्रकार है : अहमेव परो हंसः शिवः परमकारणम्। अर्थ—(मैं ही वह पर-हंस रूप शिव हूँ जो सर्वत्र व्याप्त हैं।) हान और समाधान धर्मी होने से शिव को हंसः कहा है। अनुत्तर ज्ञानशाली होने से योगी का लौकिक व्यवहार के अनुसार जो कुछ भी आलाप (बातचीत) हो वह उसका जप ही है क्योंकि वह महामन्त्ररूप स्वाभाविक विमर्श पर आरूढ़ होता है जो परप्रमातृ दशा है। जैसे विज्ञानभैरव में कहा है : भूयोभूयः परे भावे भावना भाव्यते हि या। जपः सोऽत्र स्वयं नादो मन्त्रात्मा, जप्य ईदृशः ॥१४५॥ अर्थ—जिस भावना का परमेश्वर में लगातार अनुसन्धान किया जाता है। वहाँ पूर्णाहंता का परामर्श यहाँ जप कहा गया है। स्वयं नाद (विमर्श) ही यहाँ जप है। इस विषय में योगबीज में महादेव ने पार्वती से कहा है : सकारेण बहिर्याति हकारेण विशेत्पुनः । हंस-हंसेति मन्त्रोऽयं जीवो जपति नित्यशः ॥ अर्थ—हे पार्वती सकार से प्राण का प्रवाह बाहर जाता है और हकार से पुनः अन्दर प्रवेश करता है। इस प्रकार हंस-हंस मन्त्र का जप जीव सदा ही करता रहता है। परन्तु योगी इस मन्त्र को सुषुम्ना द्वार में उल्टा कर सोऽहं सोऽहं मन्त्र निरन्तर जपता है। इसी को वास्तव में मन्त्रयोग कहते हैं। इस जप की संख्या महादेव ने विज्ञानभैरव में इस प्रकार कही हैं : षट्‍शतानि दिवारात्रौ सहस्राण्येकंविंशतिः। जपो देव्या विनिर्दिष्टः सुलभो, दुर्लभो जडैः ॥ अर्थ—पराशक्ति को बताने वाला यह जप दिन-रात में २१६०० बार योगी को सुलभ होता है परन्तु अज्ञानी के लिए ऐसा होना दुर्लभ है। इसलिए स्वात्म देवता के विमर्शन में लगे योगी की साधारण बातचीत भी उसका जप ही होता है ॥२७॥ ४

५० : शिवसूत्र विमर्श सम्बन्ध—योगी के विषय में उसके व्रत और जप का वर्णन करके उसकी चर्या के बारे में कहते हैं । दानमात्मज्ञानम् ॥२८॥ आत्मज्ञानम्—आत्मज्ञान पर रहना (अथवा शिष्यों को आत्मज्ञान प्रदान करना) ही दानम्—योगी का दान करना है। व्याख्या— संसिद्ध योगी का चैतन्यरूप आत्मा का ज्ञान अर्थात् साक्षात्कार ही दान है। दान के यहाँ कई अर्थ बताये हैं यथा— (१) दीयते परिपूर्णं स्वरूपम्—परिपूर्ण स्वरूप अर्थात् पूर्णाहन्ता को प्राप्त कराता है । (२) दीयते खण्ड्यते विश्वभेदः—पृथ्वी तत्त्व से शिव तत्त्व तक ३६ तत्त्व लक्षण वाले भेद को काट देता है । (३) दीयते शोध्यते मायास्वरूपम्—माया के स्वरूप का शोधन करता है । (४) दीयते रक्ष्यते लब्धः शिवात्मा स्वभावश्च अनेन—प्राप्त किये शिवस्वरूप के स्वभाव की (निरन्तर अभ्यास द्वारा) रक्षा करता है । और (५) दीयते इति दानम्—अन्तेवासियों (शिष्यों) को आत्मज्ञान ही देता है। इसके बारे में कहा है : दर्शनात्स्पर्शनाद्वापि वितताद्भवसागरात् । तारयिष्यन्ति योगीन्द्राः कुलाचारप्रतिष्ठिताः ॥ अर्थ—शैव सिद्धान्त में प्रतिष्ठित योगीन्द्र (मुमुक्षुजनों को इस) विस्तृत भवसागर से अपने दर्शन से या चरण-स्पर्श के प्रभाव से पार कर देते हैं यही उनका उत्तम दान है ॥२८॥ सम्बन्ध—शिव के साथ सदा तुल्य योगी इस प्रकार व्रत, जप और चर्या में लगा रहने से अपनी इन्द्रिय-वृत्तियों पर आरूढ होता है। वही तत्त्व का उपदेश चाहने वाले शिष्यों को स्वस्वरूप की पहचान का ज्ञान दे सकता है । श्रुति के अनुसार 'तत्त्वमसि' इस महावाक्य द्वारा आत्मज्ञान की उपलब्धि कराता है। इसी विषय में आगे का सूत्र है। योऽविपस्थो ज्ञाहेतुश्च ॥२९॥ यः—जो (योगी) अविपं—परमेश्वर के शक्ति-चक्र की घोरतरी शक्तियों (अर्थात् इन्द्रिय- वृत्तियों) पर स्थः—प्रभुत्व जमाता (अर्थात् वश रखता) है

सूत्र में कही गई है-कवर्गादिषु माहेश्वर्याद्याः पशुमातरः (माहेश्वर्य आदि घोरतरी

तृतीय विकास : ५१ सः- (वह) च-निश्चय से ज्ञाहेतुः - ज्ञानशक्ति के हेतु (अर्थात् शिष्यों को परमार्थज्ञान प्रदान करने से अपने शिवस्वरूप की पहचान कराने में (समर्थ) होता है । व्याख्या - बहिर्मुख इन्द्रिय-वृत्तियों को 'अविप' कहते हैं। (अवीन् पशून् पाति इति अविपं) जो पशुओं अर्थात् इन्द्रिय-वृत्तियों को पालती हैं, बहिर्मुख रहने की ओर सहा- यता देती हैं महेश्वर की उन घोरतरी शक्तियों को 'अविप' कहते हैं। यह शक्तियां योगी के शुद्धविद्या स्वरूप को किञ्चित् ढक लेती हैं। यह बात इसी विकास के १९वें सूत्र में कही गई है-कवर्गादिषु माहेश्वर्याद्याः पशुमातरः (माहेश्वर्य आदि घोरतरी शक्तियां बहिर्मुखता को प्राप्त हुई संवित्-मातृकाचक्र में पशुप्रमाता रूप अधिष्ठातृ शक्तियां (इन्द्रिय-वृत्तियां) बनकर योगी को नीचे और नीचे गिराती हैं ।) यह शक्तियां पशुओं (जीवों) को परमार्थ प्राप्त करने से रोकती हैं। अतः योगी इन पर 'यह सब मेरा ही विभव है' इस स्वात्म ऐश्वर्य को पहचान कर प्रभुत्व जमाता है। जब उसका प्रभुत्व इन्द्रिय-वृत्तियों पर आरूढ़ होता है तब वह निश्चय ही शिष्यों को स्वात्मा का प्रत्यभिज्ञान कराने में समर्थ होता है। दूसरे जो शक्तिचक्र के अधीन रहें पशुभाव को हटा नहीं सकते फिर तो शिष्यों को प्रबोध देने की बात ही क्या ! परन्तु जो योगी अविपस्थ अर्थात् इन्द्रिय-वृत्तियों को वश में रखने वाला हो, वह अवश्य 'स्वयं तीर्त्वा परान् तारयति' का प्रतीक बनता है। वह दूसरों को भी आत्मज्ञान के प्रबोध कराने का हेतु बन जाता है। इसीलिए पूर्व-सूत्र में कहा है- दानमात्मज्ञानम्-योगी का आत्मज्ञान-निष्ठ रहना ही उसका उत्तम दान है ।।२९।। सम्बन्ध-क्योंकि स्वशक्तिप्रचयोऽस्य विश्वम् ॥३०॥ विश्वम् - यह सारा विश्व अस्य - इस शिवयोगी के स्वशक्तिप्रचयः - अपने ही शक्तिचक्र (क्रियाशक्ति) का विकास है । व्याख्या -- यह सारा विश्व शिवयोगी के अपने शक्तिचक्र का समूह है क्योंकि शिव का यह विश्व स्वशक्ति-मय है। कहा है : 'शक्तयोऽस्य जगत्कृत्स्नं शक्तिमांस्तु महेश्वरः' ।। अर्थ - यह सारा जगत् उसकी शक्तियों का ही समूह है क्योंकि महेश्वर ही सर्वशक्तिमान् है । इस योगी के लिए जगत् वृत्तिरूप नहीं होता है। इस पद पर इंद्रिय-वृत्तियां योगी की शक्तियां बन जाती हैं क्योंकि यह अन्तर्मुख पद पर ही ठहरती हैं। यह सृष्टि

सूत्र के साथ जोड़ने से इसका अर्थ पूरा होता है। क्रिया शक्ति द्वारा आभास में आये

५२ : शिवसूत्र विमर्शा दशा में उन्मीलन का विकास है और यही योगी की उन्मीलन-समाधि का विकास कहलाता है। अथवा यूँ कहें कि योगी के लिए विश्व क्रियाशक्ति का स्फुरणरूप विकास है। स्वात्म-साक्षात्कार के बल से योगी के सामने ज्ञान और ज्ञेय पदार्थ भिन्न सत्ता नहीं रखते, वह दोनों में एकरूपता का अनुभव करता है। इसे अक्रमवेदन कहते हैं। यही शिखरस्थ ज्ञान अर्थात् ज्ञान की पराकाष्ठा है। यह इस कारण कि इस दशा में अन्तर और बाह्य दोनों में एक साथ योगी को स्वशक्ति-विकास ही होता है— शिखरस्थ ज्ञानं युगपद्वेदनमिति । वही जीवन्मुक्त कहलाता है। योगवासिष्ठ में इस दशा का वर्णन यूँ है— यो जागर्ति सुषुप्तस्थो यस्य जाग्रन्न विद्यते । यस्य निर्वासनो बोधः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥ (३।९।७)॥ अर्थ—वृत्ति के लीन रहते हुए भी जो जागता रहता है किन्तु वास्तव में जो जाग्रति के धर्मों से रहित है और जिसका बोध सर्वथा वासना रहित है वह पुरुष जीवन्मुक्त कहलाता है। 'वृत्ति के लीन रहते हुए भी जो जागता रहता है'— इसका आशय यह है कि यद्यपि उस योगी का चित्त सम्पूर्ण दृश्य पदार्थों का बाध करके निरन्तर ब्रह्म में लीन रहता है तथापि वह सोये हुए पुरुष के समान संज्ञाशून्य नहीं हो जाता है, वह सब व्यवहार यथावत् करता रहता है किन्तु व्यवहार करते हुए भी उसे स्वप्नवत् समझने के कारण उसकी अन्य पुरुषों के समान दृश्य पदार्थों में आस्था नहीं होती। इसलिए 'वास्तव में वह जाग्रति के धर्मों से रहित है। आगे वहीं कहा है : 'शान्तसंसारकलनः कलावानपि निष्कलः। यः सचित्तोऽपि निश्चितः स जीवन्मुक्त उच्यते ।। (३।१।१२) अर्थ—जिसकी संसार वासना शान्त हो गई है, जो कलावान् होकर भी कलाहीन है अर्थात् व्यवहार दृष्टि में ऊपर से विकारवान् प्रतीत होता हुआ भी जो निरन्तर अपने निर्विकार स्वरूप में ही स्थित रहता है तथा जिसका चित्त निश्चिन्त है वह पुरुष जीवन- मुक्त कहलाता है ॥३०॥ सम्बन्ध—योगी का विश्व न केवल सृष्टि दशा में ही अपने शक्ति-चक्र का विकास है अपितु सृष्टि के तत्क्षणात् अनन्तर भी— स्थितिलयौ ॥३१॥ स्थिति—बहिर्मुखता का आभास (और) लय—बहिर्मुखता का लय (भी) उसे अपने शक्तिचक्र का विकास है। व्याख्या--पूर्व सूत्र का 'स्वशक्तिप्रचयः' (अपने शक्तिचक्र' का विकास है) इस सूत्र के साथ जोड़ने से इसका अर्थ पूरा होता है। क्रिया शक्ति द्वारा आभास में आये

तृतीय विकास : ५३ हुए विश्व के अलग-अलग प्रमाता की अपेक्षा से कुछ समय तक बहिर्मुखता में अवभासन रूप स्थिति और चित्स्वरूप परप्रमाता में विश्रान्ति-रूप लय, यह दोनों भी योगी के अपने शक्ति चक्र का विकास है । प्रत्येक वेद्य पदार्थ की सृष्टि और लय योगी को अपना ही संवित्-शक्ति रूप है । संवित्-शक्ति के साथ एकता का अभाव न रहने पर ही योगी को दोनों (स्थिति और लय) में स्वरूप-सत्ता का अनुभव रहता है । कालिका- क्रम में कहा है : ‘सर्वं शुद्धं निरालम्बं ज्ञानं स्वप्रत्ययात्मकम् । यः पश्यति स मुक्तात्मा जीवन्नेव न संशयः ॥’ अर्थ—जो योगी निर्विकल्प तथा नाम-रूप-वर्जित विश्व और स्वाहन्ता रूप ज्ञान का अनुभव करता है वह शरीर में जीवन यापन करते हुए भी मुक्तात्मा ही है । इस विषय में कोई संदेह नहीं करना चाहिए ॥३१॥ सम्बन्ध—अब प्रश्न है कि क्या आपस में भेद का आभास रखने वाली सृष्टि, स्थिति और लय की अवस्थाओं में इस परमयोगी को स्वरूप में भेद का अनुभव तो नहीं होता ? इस शङ्का का समाधान करने में आगे का सूत्र कहा है । तत्प्रवृत्तावप्यनिरासः संवेत्तृभावात् ॥३२॥ तत्—उस (सृष्टि आदि परामर्श) के प्रवृत्तौ--प्रकट होने पर अपि—भी संवेत्तृभावात्—परप्रमातृस्वरूप (तुर्य-चमत्कार विमर्शमय) होने के कारण अनिरासः— (योगी) चलायमान नहीं होता व्याख्या—सृष्टि, स्थिति और लय का भेद प्रकट होने पर भी योगी तुर्य चमत्कार के विमर्श वाला होने से इनमें निष्कम्प ही रहता है । कालिकाक्रम में कहा है : नाशेऽविद्याप्रपञ्चस्य स्वभावो न विनश्यति । उत्पत्तिध्वंसविरहात्तस्मान्नाशो न वास्तवः ॥ अर्थ—बाहर से धन-दारा-पुत्र आदि का मोह और अन्दर से शरीर का मोह ही अविद्या का प्रपञ्च है । उनके नष्ट होने से योगी के आत्मस्वरूप में कोई हानि नहीं होती है । अतः उत्पत्ति और नाश से रहित होने के कारण स्वरूप में कोई हानि नहीं होती है । यही बात स्पन्दशास्त्र में भी इस प्रकार वर्णित है : अवस्थायुगलं चात्र कार्यकतृत्वशब्दितम् । कार्यता क्षयिणी तत्र कर्तृत्वं पुनरक्षयम् ॥ (१-१४)

५४ : शिवसूत्र विमर्शं अर्थ—इस जगत् में कार्यता और कर्तृता नाम के दो भेद भोग्य और भोक्ता हैं । उन में जो भोग्य रूप भेद है वह पैदा भी होता है और नष्ट भी । परन्तु भोक्ता रूप भेद चिद्रूप होने से न कभी पैदा होता है और न कभी नष्ट ही । अतः वह नित्य है । और भी कहा है : भोक्तैव भोग्यरूपेण सदा सर्वत्र संस्थितः अर्थ—भोक्ता ही भोग्य के रूप में सदा और सब जगह ठहरा है । तत्सृष्ट्वा तस्मिन्नेव प्रविशत् अर्थ—जगत् में नाना प्रकार की सृष्टि को रच कर स्वयं उस में प्रविष्ट हुआ । आगे स्पन्द शास्त्र में कार्यता के बारे में लिखा है— कार्योन्मुखः प्रयत्नो यः केवलं सोऽत्र लुप्यते । तस्मिंल्लुप्ते विलुप्तोऽस्मीत्यबुधः प्रतिपद्यते ॥ न तु योऽन्तर्मुखो भावः सर्वज्ञत्वगुणास्पदम् । तस्य लोपः कदाचित्स्यादन्यस्यानुपलम्भनात् ॥ (१-१५, १६) अर्थ—वेद्य वर्ग में कार्य संपादन करने का सामर्थ्य जो बाह्य इन्द्रियों के व्यापार से ही होता है, समाधि दशा में उसका लोप हो जाता है । परन्तु अबुद्ध को इस प्रकार इन्द्रियों के व्यापार का लोप होने पर यह मान्यता होती है कि 'मैं नहीं हूँ' । वह यह नहीं जानता कि यह अभाव परामर्श ही साक्षी होने से स्वात्मा का स्थिरीभाव बता देता है । परन्तु जो परप्रमातृपद सर्वज्ञत्व गुण का स्थान है उसका कभी लोप नहीं होता है क्योंकि वहाँ भिन्न वेद्यवर्ग का ज्ञान नहीं होता ॥३२॥ सम्बन्ध—विश्व की सृष्टि, स्थिति और लय में निष्कम्प योगी को— सुखासुखयोर्बहिर्मननम् ॥३३॥ सुखासुखयोः--(अन्य पुस्तकों में पाठान्तर 'सुखदुःखयो') वेद्य पदार्थों के स्पर्श से हुए सुख और दुःख मननम्—का जानना बहिः--(नीले पीले आदि की तरह इदन्ता का आभास रूप होने से) बहि- र्भाव में ही होता है । व्याख्या—देहप्रमातृता, प्राणप्रमातृता और पुर्यष्टक-प्रमातृता से उत्तीर्ण हुए इस योगिराज को वेद्यवर्ग के स्पर्श पर जय प्राप्त होती है । वह वेद्य-स्पर्श से हुए सुख और दुःखों को इदन्ता का आभास रूप ही जानता है जैसे नीला, पीला आदि बहिर्भाव में ही होते हैं । साधारण जन की अहन्ता वेद्य-पदार्थों में ही होती है इस कारण वह इनके स्पर्श से मान बैठता है कि 'मैं सुखी हूँ' या 'दुःखी हूँ' । परन्तु इस धीमान् के लिए

तृतीय विकास : ५५ विश्व ही स्वशक्ति-चक्र का विकास होता है (स्व-शक्तिप्रचयोऽस्य विश्वम्—सूत्र ३-३०) । उसने देहादि अहंकार के महामोह को अतिक्रमण किया होता है। अतः उसे दूसरे लोगों की तरह सुख-दुःख स्पर्श नहीं कर पाते । इसके विषय में स्पन्दशास्त्र में कहा है : न दुःखं न सुखं यत्र न ग्राह्यो ग्राहको न च । न चास्ति मूढभावोऽपि तदस्ति परमार्थतः ॥ (१-५) अर्थ—उसका स्वभाव ही होता है कि उसे सुख, दुःख, मूढता आदि भावों का स्पर्श ही नहीं होता है क्योंकि उसका परप्रमातृभाव सदा उदय में होता है । सुख दुःख तो केवल संकल्प से पैदा होते हैं और क्षणभङ्गुर हैं । अतः वे शब्दादि विषयों के समान आत्मस्वरूप से बाहर होते हैं । यहाँ प्रश्न किया जा सकता है : यदि इस योगी को सुख और दुःख स्पर्श नहीं करते तो क्या वह पत्थर के समान संज्ञाहीन होता है ? इसका उत्तर अष्टावक्र जी ने जनक के प्रति इस प्रकार दिया है : निर्वासनो निरालम्बः स्वच्छो वै मुक्तबन्धनः । क्षिप्तः संस्कारवातेन चेष्टते शुष्कपर्णवत् ।। (अष्टावक्रगीता—१२।२९) अर्थ—ज्ञानी वासना रहित होता है। उसको किसी का आधार नहीं लेना पड़ता है । इस लिए परप्रमातृ स्वभाव में स्वाधीन होता है। ज्ञानी में सुख दुःख के मूल राग-द्वेष नहीं होते हैं। परन्तु प्रारब्धानुसार जो प्राप्त होते हैं उनको अङ्गीकार करता है। जिस प्रकार पृथ्वी पर पड़े हुए सूखे पत्तों में कहीं जाने की अथवा स्थित होने की वासना (सामर्थ्य) नहीं होती है परन्तु जिस दिशा की ओर वायु चलता है उसी दिशा की ओर वे पत्ते उड़ने लगते हैं ठीक उसी प्रकार यह योगिविराट् प्रारब्ध के अनुसार भोग- चेष्टा करता है । इस योगि-देह के इन्द्रिय-वर्ग इसे विषयों की ओर नहीं ले जाते हैं अपितु करणेश्वरियाँ बनकर इसकी सेवा करते हैं। अष्टावक्र जी राजर्षि जनक को दृष्टान्तपूर्वक समझाते हैं— निर्वासनं हरिं दृष्ट्वा तूष्णीं विषयदन्तिनः । पलायन्ते न शक्तास्ते सेवन्ते कृतचाटवः ॥ —(अष्टावक्रगीता : १८।४६) अर्थ—वासना रहित पुरुषरूप सिंह को देखकर विषयरूपी हाथी असमर्थ होकर चुपचाप भाग जाते हैं। फिर इस वासनारहित पुरुष की ओर आकर्षित होकर स्वयं सेवा करते हैं ॥३३॥

५६ : शिवसूत्र विमर्श सम्बन्ध—क्योंकि जीवभाव से उत्तीर्ण इस योगी के अन्तःकरण को सुख दुःख स्पर्श नहीं करते, इसलिए वह— तद्विमुक्तस्तु केवली ॥३४॥ तत्—संस्कार शेष रहने तक तु—विशेष कर विमुक्तः—सुख-दुःख से मुक्त (होकर) केवली--केवल अद्वैतनिष्ठ रहता है। व्याख्या—स्वरूपनिष्ठ होने से योगी को संस्कार मात्र में भी सुख-दुःख स्पर्श नहीं कर पाते। वह विशेष रूप से इनसे मुक्त होता है। वह चिन्मात्र स्वरूप सदा अद्वैत- निष्ठ ही रहता है। यह श्रीकालिकाक्रम में इस प्रकार वर्णित है : सुखदुःखादिविज्ञानविकल्पानल्पकल्पितम् । भित्त्वा द्वैतमहामोहं योगी योगफलं लभेत् ॥ अर्थ—सुख, दुःख और मोहज्ञान के विकल्पों से घनीभूत द्वैत के महामोह को चीर कर योगी योग के फल स्वरूप लाभ में ही सदा रहता है । यहाँ 'तु' शब्द से आगे कहे जाने वाले अज्ञानी की अपेक्षा ज्ञानी में विशेषता कही गई है ॥३४॥ सम्बन्ध—अतः इस के विपरीत जीवदशा में पुरुष शुभ तथा अशुभ के कलंक से कर्मात्मा कहा गया है। इस का वर्णन करते हैं। मोहप्रतिसंहतस्तु कर्मात्मा॥३५॥ तु--इसके विपरीत मोहप्रतिसंहतः--अज्ञान से पूरी तरह घनीभूत होकर कर्मात्मा—(वह) साधारण जीव अर्थात् कर्म-पिण्ड ही होता है। व्याख्या—परन्तु अज्ञान के आवरण से पुरुष जीव ही होता है योगी नहीं। वह सुख दुःख के ही आश्रित रहता है और सदा कर्म में लगा हुआ शुभ फल और अशुभ फल से कलंकित होता है। वह अविद्या के प्रभाव से विकल्पों के ही अनुसार चलता है और स्वरूप में सुख-दुःख का साक्षात्कार नहीं करता है ! कहा भी है— 'अज्ञानैकघनो नित्यं शुभाशुभकलंकितः' अर्थ—केवल अज्ञान में घनीभूत होकर (साधारण जीव) सदा शुभ तथा अशुभ वासनाओं (मायीयमल) से कलंकित रहता है ॥३५॥

तृतीय विकास : ५७ सम्बन्ध—परन्तु इस प्रकार के कर्म रूप जीव को जब कभी महेश्वर का अनर्गल शक्तिपात होता है तो उसको सहज ही ज्ञानक्रिया का लाभ होता है और उसे स्वातन्त्र्य योग का उदय होता है। फिर उसे— भेदतिरस्कारे सर्गान्तरकर्मत्वम् ॥३६॥ भेदतिरस्कारे—संसार-दशारूप भेद के तिरस्कार होने (हटने) पर सर्गान्तरकर्मत्वम्--विश्व की सृष्टि तथा संहार करने की क्षमता होती है। व्याख्या—ऐसे योगिवर का देह, प्राण और पुर्यष्टक में अभिमान रूप भेद, चिद्धन में डुबकी लगाने से हट जाता है। वह कला, विद्या, राग, काल और नियति, माया के इन पांच कञ्चुकों से आवृत सकल, प्रलयाकल और विज्ञानाकल प्रमाताओं को स्वरूप के उन्मेष द्वारा हटा कर मन्त्र (शुद्धविद्या), मन्त्रेश्वर (ईश्वर) और मन्त्रमहेश्वर (सदाशिव) रूप अपने माहात्म्य को क्रम से प्राप्त करता है। इस प्रकार वह अपनी इच्छा से प्रमाता तथा प्रमेय से ऊपर उठता है । अतः उसे कोई दूसरी ही वस्तु (शिवरूपता) की क्षमता प्राप्त होती है । शिव का शक्तिपात किसी समय भी किसी पर होता है। इसके होने में अधिकारी अनधिकारी का कोई विचार नहीं। यह व्यक्ति, समय और स्थान की विशेषता से बाहर है क्योंकि शिव कर्म-निरपेक्ष है। उसमें कर्म का कोई विचार नहीं होता। अतः शक्तिपात निरर्गल है। जिस किसी पर शिव का शक्तिपात हो उसे संसारदशा का स्वयमेव तिरस्कार होता है। उसमें विश्व की सृष्टि तथा लय करने की क्षमता आती है शक्ति संसार है और वह कर्म-सापेक्ष है। जीव फलभोगी है। अतः संसार में कर्म करने से उनके फल अवश्यम्भावी होते हैं। परन्तु शक्ति-पात हुए योगी को कर्मों के करने की आवश्यकता नहीं होती। यदि देह-निर्वाहिनार्थ कर्म करने भी पड़ें तो भी उसे उनका कोई लेप नहीं होता। वह साधारण प्रमातृभाव और प्रमेयभाव से ऊपर उठ कर शिवरूपता को प्राप्त करता है। श्री स्वच्छन्द में कहा है : 'त्रिगुणेन तु जप्तेन स्वच्छन्दसदृशो भवेत् ।' अर्थ—त्रैगुण्य से यहाँ अनेक गुणता उपलक्षण कहा है। अतः महामन्त्ररूप परिपूर्ण अहंता भाव से अपने स्वभाव-परामर्श में रहने से योगी स्वच्छन्दनाथ शिव के समान होता है। अतः कर्मात्मा जीव भी कभी अनर्गल शक्तिपात से स्वच्छन्द-सादृश्य प्राप्त करता है ॥३६॥ सम्बन्ध—प्रमेय-प्रमाण भाव से उठकर रहना इस योगी के लिए असम्भव नहीं है, क्योंकि इसे—

५८ : शिवसूत्र विमर्शं करणशक्तिः स्वतोऽनुभवात् ॥३७॥ करणशक्तिः—विश्व की स्थिति और लय करने की शक्ति स्वतोऽनुभवात्—अपने ही अनुभव के अन्तर्गत होती है । व्याख्या—जिस प्रकार साधारण जन को संकल्पों और स्वप्न आदि में सृष्टि और लय करने की शक्ति अपने ही अनुभव से होती है, वैसे ही योग-युक्त सम्पन्न आत्मा को विश्ववैचित्र्य के सम्पादन करने की शक्ति अपनी ही ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति के अनुभव से सिद्ध है । इस शिवयोगी को असाधारण पदार्थों के निर्माण करने की शक्ति अपने संपादन-सामर्थ्य से होती है, साधारण जन की तरह इन्द्रिय-सामर्थ्य से नहीं । वैसे तो ब्रह्मा से लेकर कीटाणु तक किसी भी प्राणी की उल्लेखनरूप क्रियाशक्ति और अवभासनरूप ज्ञानशक्ति स्वाभाविक१ हैं। ऐसा सम्भव होने पर किसी विषय पर पूर्ण एकाग्रता से विमर्श किया जाय तो सर्वसाधारण इच्छित पदार्थ निर्माण भी हो सकता है। इस विषय में विश्वामित्र आदि मुनियों की नूतन स्वर्ग सृष्टि२ की गाथाएँ प्रसिद्ध हैं । ‘ईश्वरप्रत्यभिज्ञा’ में इसी विचार के स्पष्ट अर्थ की कारिका इस प्रकार है : अत एव यथाभीष्टसमुल्लेखावभासनात् । ज्ञानक्रिये स्फुटे एव सिद्धे सर्वस्य जीवतः ॥ (१-६-१०) अर्थ—अतः योग-सिद्ध इस असाधारण आत्मा को विश्व में विचित्रता (सृष्टि और संहार संपादन करने की शक्ति) स्वानुभव-सिद्ध होती है। यह संपादन-सामर्थ्य शिवयोगी की तुर्यरूप स्वातन्त्र्य-शक्ति है जो उसे अपने ही अनुभव के अन्तर्गत होती है ॥३७॥ सम्बन्ध—क्योंकि यही तुर्यरूप स्वातन्त्र्यशक्ति इस बोधरूप प्रमाता (शिव-योगी अथवा योगसिद्ध पुरुष) की स्वरूप-स्थिति का सार है, अतः जाग्रदादि अवस्थाओं में इस पद के, मायाशक्ति से आच्छादित होने पर भी, इसी तुर्य से स्वरूप को उत्तेजित करने की आवश्यकता साधक के लिए अभीष्ट है । इस विषय में अगले दो सूत्र हैं— १. यैव चित् गगनाभोगे भूषणे भाति भास्करे । धराविवरकोशस्थे सैव चित् कीटकोदरे ॥ अर्थ—‘जो चिति आकाश-भूषण भगवान् सूर्य में भासती है वही चिति पृथ्वी के बीच में बिल-कोश में ठहरे हुए कीड़े में विद्यमान है ।’ २. नूतन स्वर्ग सृष्टि—त्रिशंकु के लिए स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक के मध्य में विश्वामित्र ने नूतन सृष्टि अपने योगबल से रची थी । यह बात पुराण-प्रसिद्ध है ।

तृतीय विकास : ५९ त्रिपदाद्यनुप्राणनम् ॥३८॥ त्रिपद—(सृष्टि, स्थिति और संहार रूप इस) जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति में आदि—प्रधान (जो चौथा तुर्य है, उस) से अनुप्राणनम्—(आत्मस्वरूप की) सावधानता रखनी चाहिए । व्याख्या—सृष्टि, स्थिति और संहार शब्दों के कहने से यहाँ योगी की जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति भाव वाली अवस्थाओं से अभिप्राय है । जाग्रत् से निद्रा में जाते समय अतीत जाग्रत् और अनागत निद्रा की दशा आती है । इसे मध्य-दशा कहते हैं । योगी इस मध्य-दशा में आनन्दघन तुर्यरस का आस्वादन करता है । इसी प्रकार तीसरी अवस्था (स्वप्न) के उन्मेष और दूसरी अवस्था की उपशान्ति दशा में आदि और अन्त कोटि की मध्य-दशा को ग्रहण कर वह चिद्घनता का अनुभव करता है । साधक अवस्था से उसे इस चिद्घनता-रूप तुर्य को दृढ़ता से वर्तमान जाग्रत् आदि अवस्थाओं में व्याप्त करने का अभ्यास करना चाहिए । इस विषय में वासिष्ठ-दर्शन में कहा है : निद्रादौ जागरस्यान्ते यो भाव उपजायते । तं भावं भावयन्साक्षादक्षयानन्दमश्नुते ॥ अर्थ—निद्रा की अवस्था में जाने से पहले और जाग्रत् अवस्थां के अन्त में (अर्थात् मध्यदशा में) जिस निर्विकल्पभाव का अनुभव होता है उसी भाव (तुर्य) में सावधान रहने से अक्षयसुख अर्थात् चिद्घनता की व्याप्ति रहती है । और भी आद्यशङ्कराचार्य रचित ‘प्रबोध-सुधाकर’ में कहा है : यद्भावाद्भावः स्यान्निद्रादौ जागरस्यान्ते । अन्तः स चेत्स्थिरः स्याल्लभते हि तदद्वयानन्दः ॥१६०॥ अर्थ—निद्रा के आरम्भ में और जाग्रत् के अन्त में जिस शुद्ध ओर निर्विषय भाव का अनुभव होता है वह यदि अन्तःकरण में स्थिर हो जाय तो उससे अद्वयानन्द की ही प्राप्ति होती है । योगी को इसी शाम्भवी भूमिका में स्थिरता प्राप्त करने की ओर इस सूत्र में संकेत है । जब तक योगी-साधक तुर्यानन्द के रस को तेल की तरह अधिक और अधिक फैलाने में (त्रिषु चतुर्थं तैलवदासेव्यम्-सू० ३-२०) समर्थ न हो तब तक उद्यमशील रहना आवश्यक है । यह आणवोपाय की रीति है । मध्य-दशा के तुर्यानन्द से वर्तमान जाग्रदादि दशाओं में आने पर विषयों के उपभोग के अवसर आते हैं । उन अवसरों पर योगी को तुर्य का अवभासन विद्युत् की तरह होता है (तुर्यरसं क्षणमात्रसंभवम्) । इस क्षणमात्र के तुर्यरस से उन मायाशक्ति से आच्छादित अवसरों को अनुप्राणन करना चाहिए । आशय यह है कि जो सावधानता

६० : शिवसूत्र विमर्श योगी को मध्य-दशा के क्षणमात्र के तुर्य चमत्कार में होती है वही सावधानता उसे विषयों के उपभोग के अवसरों पर अभ्यास में ठहरानी चाहिए। यह अभ्यास उसे अन्तर्मुख भाव से स्वरूप-विमर्श की स्थिति के तारतम्य से बढ़ाना चाहिए। यह अभ्यास शब्द, स्पर्श, रूप, रसादि भिन्न-भिन्न विषयों के उपभोग के अवसरों पर किये जाते हैं। कुछ उदाहरण 'रुद्रयामलतन्त्र' के 'विज्ञान भैरव' भाग से सुगम बोध के लिए यहाँ उद्धृत किये जाते हैं : (क) शब्द (श्रवण) का अभ्यास— गीतादिविषयास्वादास मसौख्यैकतात्मनः । योगिनस्तन्मयत्वेन मनोरूढेस्तदात्मता ।।७३।। अर्थ—वंशी-वीणा के गायन-विषय के श्रवणेन्द्रिय द्वारा चमत्कार-पूर्ण आस्वादन करने से अनुपम सुख का अनुभव होता है । जो योगी उस असाधारण सुख के साथ आत्मा को तद्रूप करता है उसका मन उसी शब्द-चमत्कार-सुख पर आरूढ़ होने से तन्मय हो जाता है । इसे शाक्त-स्पर्शविश कहते हैं । योगी को इस समावेश से ब्रह्म-भाव की प्राप्ति होती है । यह शब्द-ब्रह्म-रूपता का अनुभव है । 'आदि' शब्द से स्पर्श, रूप, रसादि के भाव इसी प्रकार ग्रहण करने चाहिए । (ख) स्पर्श-विषय का अभ्यास (साक्षात्)— शक्तिसंगमसंक्षुब्धशक्त्यावेशावसानिकम् । यत्सुखं ब्रह्मतत्त्वस्य तत्सुखं स्वाक्यमुच्यते ॥ अर्थ—स्त्रीसंभोग के अवसर पर (जब इन्द्रियों में पत्तों की सरसराहट की तरह स्खलन होता है) आनन्द शक्ति का समावेश होता है । उसके अवसान पर घण्टे की अनुरणन ध्वनि की तरह, जो ब्रह्म-तत्त्व का सुख होता है वह अपना ही अर्थात् आत्म-सम्बन्धी होता है, दूसरे अर्थात् स्त्री से नहीं । स्त्रीसंभोग केवल उस सुख की अभिव्यक्ति का ही कारण है क्योंकि आनन्द अपना ही है । अतः स्त्रीसंग के अन्तः-बाह्य-शून्य जो आनन्द की अनुभूति होती है उसके चमत्कार पूर्ण ध्यान से योगी परब्रह्मानन्दमय बन जाता है । मूर्खजन की तरह संभोग का ही विधि नहीं मानता । (ग) स्पर्श विषय का अभ्यास (स्मरण से)— लेहनामन्थनाकोटौ स्त्रीसुखस्य भरात्स्मृतेः । शक्ताभावेऽपि देवेशि भवेदानन्दसंप्लवः ।।६९।। अर्थ—(भगवान् शिव इस विषय में पार्वती से कहते हैं) हे देवि ! स्त्री के सम्मुख न होने पर भी चुम्बन आदि उद्दीपन विभावों से उद्दीप्त आनन्द के अतिशय स्मरण से अपनी ही उल्लसित आनन्दमयता की भावना करनी चाहिए ।

तृतीय विकास : ६१ (च) रूप-विषय का अभ्यास— आनन्दे महति प्राप्ते दृष्टे वा बान्धवे चिरात् । आनन्दमुद्गतं ध्यात्वा तन्मयस्तल्लयीभवेत् ॥ अर्थ—स्त्री आदि शक्ति के सम्मुख होने पर, दरिद्रता से पीड़ित किसी व्यक्ति को अकस्मात् धन की बड़ी राशि मिलने पर अथवा बहुत समय के प्रवास से आए हुए बन्धु, पुत्र, मित्र आदि से मिलने पर जो आनन्द का उदय होता है उसके उदयस्थान मात्र का ग्रहण कर उसका अन्तर्मुख भाव में ध्यान करने से (योगी) आनन्द में विश्राम पाये। (छ) रसना-विषय का अभ्यास— जग्धिपानकृतोल्लासरसानन्दविजृम्भणात् । भावयेद्भरितावस्थां१ महानन्दस्ततो भवेत् ॥ अर्थ—क्षुधा के समय भक्ष्य (खाने के योग्य, अभक्ष्य नहीं) खाने पर और प्यास के समय पेय (जल नींबू या मीठा क्षीर आदि, मद्य आदि नहीं) पीने पर प्रत्येक लुकमे और प्रत्येक बूँद से जो तुष्टि, पुष्टि और क्षुधा-निवृत्ति के आनन्द का अनुभव होता है, उस आनन्द दशा का विमर्शन करने से (योगी) स्वरूप-समावेशमय आनन्द से भर जाता है । शब्द, स्पर्श आदि विषयों के उपभोग में वेद्यपदार्थ का विगलन होकर क्षणमात्र संभव तुर्यपद के उदय होने पर भी साधारण जन असावधानी के कारण प्रत्यक्ष शब्दन, स्पर्शन आदि विषय में ही सुख मानता है । परन्तु योगीजन मायाशक्ति से आच्छादित होने पर भी उन विषयभोगों के अवसरों पर सावधान रहने से उस विद्युत् के समान तुर्यरस से सींचता हुआ स्वरूप-विमर्श की स्थिति को दृढ़ करता है और तदनन्तर ब्रह्मानन्द भाव का अनुभव निरन्तर करता है । श्रीमदाद्यशङ्कराचार्य इस विषय में कहते हैं : 'आदौ ब्रह्माहमस्मीत्यनुभव उदिते खल्विदं ब्रह्म पश्चात् ।' —(शतश्लोकी—३) अर्थ—पहले जब 'मैं ब्रह्म हूँ' यह अनुभव उदित होता है उसके बाद यह बोध स्वयं होता है कि यह जगत् आदि सब कुछ ब्रह्म है । अतः योगी प्रधान तुर्यामृत रस से जाग्रत् आदि तीनों अवस्थाओं को सींचता है और पूर्णहंता के स्वानुभव से आनन्दित होता है । यह अकिञ्चित्-चिन्तनमयी दशा विश्व-अभेद-चमत्कार-मय होती है जहाँ अणुमात्र भी आणवमल नहीं रहता है। इस विषय में भैरव देवी से कहता है : १, पाठान्तर : 'भावयेद्भैरवम् भावम्' इति

६२ : शिवसूत्र विमर्श अन्तः स्वानुभवानन्दा विकल्पोन्मुक्तगोचरा । याऽवस्था भरिताकारा भैरवी भैरवात्मनः ॥१५॥ तद्वपुस्तत्त्वतो ज्ञेयं विमलं विश्वपूरणम् । —(विज्ञान भैरव) अर्थ—विकल्प-वासना से रहित पूर्णाहन्ता का स्वप्रकाशरूप आनन्द जो भैरवरूप शिव की भैरव-सम्बन्धी परिपूर्ण स्वरूपा अवस्था है उस निर्मल विश्वपूरण स्वरूप को सावधान होकर हृदयंगम करना चाहिये । उस अवस्था में सम्पूर्ण जगत् स्वभित्ति पर ही निरावरण आभासित होता है । इस प्रकार तीनों अवस्थाओं को चौथी तुर्यरूप मध्य-दशा से अनुप्राणन कर योगी निरन्तर अभ्यास से पूर्णाहन्ता की सावधानी दृढ़ करता है । यह दशा योगी को भगवान् शिव के शक्तिपात से ही होती है । तत्त्वान्तर्गत विज्ञानाकल प्रमाता से पार होकर ही यह अवस्था होती है जब विश्व से अभेद ब्रह्मभाव के अनुभव में योगी का मन लीन होता है । उत्पलदेव, जिसने जीवभाव के पहले दो मल-स्थूलतर मायीय मल और स्थूल कार्ममल—हटाये थे, उस आन्तरिक अभिन्न से आणवमल के अशेषरूप से हटाने के लिए अर्थात् विज्ञानाकल प्रमाता (जहाँ अनुसंधान करने से अनुसन्धान और न करने से बहिर्मुखता होती है) से बाहर निकलने के लिए भगवान् शिव से प्रार्थना करते हैं : अन्तरप्यतितरामणीयसी या त्वदप्रथनकालिकास्ति मे । तामपीश परिमृज्य सर्वतः स्वं स्वरूपममलं प्रकाशय ॥ —(शिवस्तोत्रावली १३-२) अर्थ—आप हे प्रभु ! चित्स्वरूप को छिपा रखने वाली मलिनता-चाहे वह जरा भी क्यों न हो-जो मेरे चित्त में आपके स्वरूप-साक्षात्कार के समय होती है उसको भी पूर्णरूप से दूर करके अपने चिदानन्दमय निर्मल स्वरूप को (जहाँ व्युत्थान और समाधि का कोई भेद न रहे) प्रकट कीजिए । ईश्वर स्वरूप स्वामी श्री लक्ष्मण जू इसी प्रकार सदा सावधान रहने के लिए अपने शिष्यगण को यह उपदेश दिया करते हैं : (१) भोजन करते समय प्रत्येक लुकमे का स्वाद लेते हुए अनुसन्धान करना चाहिये कि कौन खाने का स्वाद लेता है । इसी प्रकार दूध, जल आदि पीते हुए भी पीनेवाले को ध्यान में लाना चाहिए । (२) चलते-चलते एक कदम उठाने के पश्चात् दूसरा कदम डालने के पूर्व मध्य- दशा में अनुसन्धान करना चाहिए ।

तृतीय विकास : ६३ (३) छींकते समय छींक आने से पहले और छींकने के अनन्तर ही सावधान रहना चाहिए। (४) अपने किसी दूरस्थ प्रियजन की याद आते समय पूर्वापर ज्ञानरहित जो आनन्द-दशा है उसमें ठहरना चाहिए। (५) सोते समय निद्रा लगने से पूर्व और जाग्रत् के अन्त में मध्य-दशा पर ठहरने का प्रयत्न करना चाहिए १ ॥३८॥ सम्बन्ध—अतः योगी साधक को चाहिए कि वह इस प्रकार तीनों अवस्थाओं में अन्तर्मुख भाव से मध्य-दशा का अनुप्राणन करने की स्थिरता प्राप्त कर ही संतुष्ट न रहे, अपितु उसे बाह्यरूपता में भी यह अभ्यास दृढ़ करना चाहिए। इस विषय में अगला सूत्र है। चित्तस्थितिवच्छरीरकरणबाह्येषु ॥३९॥ चित्तस्थिति—(जिस तरह) चित्त की अन्तर्मुख निरुद्ध अवस्था (स्वाभाविक हुई है) वत्—(उस) की तरह शरीर—(व्यक्तिगत शरीर में) जाग्रत्, (और) करण—(व्यक्तिगत शरीर में) स्वप्न (अवस्थाओं) के बाह्येषु—बाह्य जगत् रूप सुषुप्ति को भी (तुर्य रस से अनुप्राणित करना चाहिए)। १. स्वामी जी महाराज ने इस विषय में अपने अनुभव को भी प्रकट किया है— There is a point be-twixt sleep and waking, where thou shalt be alert without shaking; Enter into the new world where forms so hidepus pass, They are passing, endure, do not be taken by the dross. Then the pulls and pushes about the tolerate. Close all ingress and egress; Yawnings there may be; Shed tears-crave-implore, But thou wilt not prostrate, A ‘THRILL’ passes, and that goes down to the bottom, It riseth, may it bloom forth, that is BLISS : Blessed Being, Blessed Being— O ! greetings be to THEE. By Swami Lakshaman Joo.