शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation
महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा
स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६० : शिवसूत्र विमर्श योगी को मध्य-दशा के क्षणमात्र के तुर्य चमत्कार में होती है वही सावधानता उसे विषयों के उपभोग के अवसरों पर अभ्यास में ठहरानी चाहिए। यह अभ्यास उसे अन्तर्मुख भाव से स्वरूप-विमर्श की स्थिति के तारतम्य से बढ़ाना चाहिए। यह अभ्यास शब्द, स्पर्श, रूप, रसादि भिन्न-भिन्न विषयों के उपभोग के अवसरों पर किये जाते हैं। कुछ उदाहरण 'रुद्रयामलतन्त्र' के 'विज्ञान भैरव' भाग से सुगम बोध के लिए यहाँ उद्धृत किये जाते हैं : (क) शब्द (श्रवण) का अभ्यास— गीतादिविषयास्वादास मसौख्यैकतात्मनः । योगिनस्तन्मयत्वेन मनोरूढेस्तदात्मता ।।७३।। अर्थ—वंशी-वीणा के गायन-विषय के श्रवणेन्द्रिय द्वारा चमत्कार-पूर्ण आस्वादन करने से अनुपम सुख का अनुभव होता है । जो योगी उस असाधारण सुख के साथ आत्मा को तद्रूप करता है उसका मन उसी शब्द-चमत्कार-सुख पर आरूढ़ होने से तन्मय हो जाता है । इसे शाक्त-स्पर्शविश कहते हैं । योगी को इस समावेश से ब्रह्म-भाव की प्राप्ति होती है । यह शब्द-ब्रह्म-रूपता का अनुभव है । 'आदि' शब्द से स्पर्श, रूप, रसादि के भाव इसी प्रकार ग्रहण करने चाहिए । (ख) स्पर्श-विषय का अभ्यास (साक्षात्)— शक्तिसंगमसंक्षुब्धशक्त्यावेशावसानिकम् । यत्सुखं ब्रह्मतत्त्वस्य तत्सुखं स्वाक्यमुच्यते ॥ अर्थ—स्त्रीसंभोग के अवसर पर (जब इन्द्रियों में पत्तों की सरसराहट की तरह स्खलन होता है) आनन्द शक्ति का समावेश होता है । उसके अवसान पर घण्टे की अनुरणन ध्वनि की तरह, जो ब्रह्म-तत्त्व का सुख होता है वह अपना ही अर्थात् आत्म-सम्बन्धी होता है, दूसरे अर्थात् स्त्री से नहीं । स्त्रीसंभोग केवल उस सुख की अभिव्यक्ति का ही कारण है क्योंकि आनन्द अपना ही है । अतः स्त्रीसंग के अन्तः-बाह्य-शून्य जो आनन्द की अनुभूति होती है उसके चमत्कार पूर्ण ध्यान से योगी परब्रह्मानन्दमय बन जाता है । मूर्खजन की तरह संभोग का ही विधि नहीं मानता । (ग) स्पर्श विषय का अभ्यास (स्मरण से)— लेहनामन्थनाकोटौ स्त्रीसुखस्य भरात्स्मृतेः । शक्ताभावेऽपि देवेशि भवेदानन्दसंप्लवः ।।६९।। अर्थ—(भगवान् शिव इस विषय में पार्वती से कहते हैं) हे देवि ! स्त्री के सम्मुख न होने पर भी चुम्बन आदि उद्दीपन विभावों से उद्दीप्त आनन्द के अतिशय स्मरण से अपनी ही उल्लसित आनन्दमयता की भावना करनी चाहिए ।