भारतकोश
शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation

महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा

स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

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तृतीय विकास : ५९ त्रिपदाद्यनुप्राणनम् ॥३८॥ त्रिपद—(सृष्टि, स्थिति और संहार रूप इस) जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति में आदि—प्रधान (जो चौथा तुर्य है, उस) से अनुप्राणनम्—(आत्मस्वरूप की) सावधानता रखनी चाहिए । व्याख्या—सृष्टि, स्थिति और संहार शब्दों के कहने से यहाँ योगी की जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति भाव वाली अवस्थाओं से अभिप्राय है । जाग्रत् से निद्रा में जाते समय अतीत जाग्रत् और अनागत निद्रा की दशा आती है । इसे मध्य-दशा कहते हैं । योगी इस मध्य-दशा में आनन्दघन तुर्यरस का आस्वादन करता है । इसी प्रकार तीसरी अवस्था (स्वप्न) के उन्मेष और दूसरी अवस्था की उपशान्ति दशा में आदि और अन्त कोटि की मध्य-दशा को ग्रहण कर वह चिद्घनता का अनुभव करता है । साधक अवस्था से उसे इस चिद्घनता-रूप तुर्य को दृढ़ता से वर्तमान जाग्रत् आदि अवस्थाओं में व्याप्त करने का अभ्यास करना चाहिए । इस विषय में वासिष्ठ-दर्शन में कहा है : निद्रादौ जागरस्यान्ते यो भाव उपजायते । तं भावं भावयन्साक्षादक्षयानन्दमश्नुते ॥ अर्थ—निद्रा की अवस्था में जाने से पहले और जाग्रत् अवस्थां के अन्त में (अर्थात् मध्यदशा में) जिस निर्विकल्पभाव का अनुभव होता है उसी भाव (तुर्य) में सावधान रहने से अक्षयसुख अर्थात् चिद्घनता की व्याप्ति रहती है । और भी आद्यशङ्कराचार्य रचित ‘प्रबोध-सुधाकर’ में कहा है : यद्भावाद्भावः स्यान्निद्रादौ जागरस्यान्ते । अन्तः स चेत्स्थिरः स्याल्लभते हि तदद्वयानन्दः ॥१६०॥ अर्थ—निद्रा के आरम्भ में और जाग्रत् के अन्त में जिस शुद्ध ओर निर्विषय भाव का अनुभव होता है वह यदि अन्तःकरण में स्थिर हो जाय तो उससे अद्वयानन्द की ही प्राप्ति होती है । योगी को इसी शाम्भवी भूमिका में स्थिरता प्राप्त करने की ओर इस सूत्र में संकेत है । जब तक योगी-साधक तुर्यानन्द के रस को तेल की तरह अधिक और अधिक फैलाने में (त्रिषु चतुर्थं तैलवदासेव्यम्-सू० ३-२०) समर्थ न हो तब तक उद्यमशील रहना आवश्यक है । यह आणवोपाय की रीति है । मध्य-दशा के तुर्यानन्द से वर्तमान जाग्रदादि दशाओं में आने पर विषयों के उपभोग के अवसर आते हैं । उन अवसरों पर योगी को तुर्य का अवभासन विद्युत् की तरह होता है (तुर्यरसं क्षणमात्रसंभवम्) । इस क्षणमात्र के तुर्यरस से उन मायाशक्ति से आच्छादित अवसरों को अनुप्राणन करना चाहिए । आशय यह है कि जो सावधानता