शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation
महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा
स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय विकास : ५३ हुए विश्व के अलग-अलग प्रमाता की अपेक्षा से कुछ समय तक बहिर्मुखता में अवभासन रूप स्थिति और चित्स्वरूप परप्रमाता में विश्रान्ति-रूप लय, यह दोनों भी योगी के अपने शक्ति चक्र का विकास है । प्रत्येक वेद्य पदार्थ की सृष्टि और लय योगी को अपना ही संवित्-शक्ति रूप है । संवित्-शक्ति के साथ एकता का अभाव न रहने पर ही योगी को दोनों (स्थिति और लय) में स्वरूप-सत्ता का अनुभव रहता है । कालिका- क्रम में कहा है : ‘सर्वं शुद्धं निरालम्बं ज्ञानं स्वप्रत्ययात्मकम् । यः पश्यति स मुक्तात्मा जीवन्नेव न संशयः ॥’ अर्थ—जो योगी निर्विकल्प तथा नाम-रूप-वर्जित विश्व और स्वाहन्ता रूप ज्ञान का अनुभव करता है वह शरीर में जीवन यापन करते हुए भी मुक्तात्मा ही है । इस विषय में कोई संदेह नहीं करना चाहिए ॥३१॥ सम्बन्ध—अब प्रश्न है कि क्या आपस में भेद का आभास रखने वाली सृष्टि, स्थिति और लय की अवस्थाओं में इस परमयोगी को स्वरूप में भेद का अनुभव तो नहीं होता ? इस शङ्का का समाधान करने में आगे का सूत्र कहा है । तत्प्रवृत्तावप्यनिरासः संवेत्तृभावात् ॥३२॥ तत्—उस (सृष्टि आदि परामर्श) के प्रवृत्तौ--प्रकट होने पर अपि—भी संवेत्तृभावात्—परप्रमातृस्वरूप (तुर्य-चमत्कार विमर्शमय) होने के कारण अनिरासः— (योगी) चलायमान नहीं होता व्याख्या—सृष्टि, स्थिति और लय का भेद प्रकट होने पर भी योगी तुर्य चमत्कार के विमर्श वाला होने से इनमें निष्कम्प ही रहता है । कालिकाक्रम में कहा है : नाशेऽविद्याप्रपञ्चस्य स्वभावो न विनश्यति । उत्पत्तिध्वंसविरहात्तस्मान्नाशो न वास्तवः ॥ अर्थ—बाहर से धन-दारा-पुत्र आदि का मोह और अन्दर से शरीर का मोह ही अविद्या का प्रपञ्च है । उनके नष्ट होने से योगी के आत्मस्वरूप में कोई हानि नहीं होती है । अतः उत्पत्ति और नाश से रहित होने के कारण स्वरूप में कोई हानि नहीं होती है । यही बात स्पन्दशास्त्र में भी इस प्रकार वर्णित है : अवस्थायुगलं चात्र कार्यकतृत्वशब्दितम् । कार्यता क्षयिणी तत्र कर्तृत्वं पुनरक्षयम् ॥ (१-१४)