भारतकोश
शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation

महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा

स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

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५२ : शिवसूत्र विमर्शा दशा में उन्मीलन का विकास है और यही योगी की उन्मीलन-समाधि का विकास कहलाता है। अथवा यूँ कहें कि योगी के लिए विश्व क्रियाशक्ति का स्फुरणरूप विकास है। स्वात्म-साक्षात्कार के बल से योगी के सामने ज्ञान और ज्ञेय पदार्थ भिन्न सत्ता नहीं रखते, वह दोनों में एकरूपता का अनुभव करता है। इसे अक्रमवेदन कहते हैं। यही शिखरस्थ ज्ञान अर्थात् ज्ञान की पराकाष्ठा है। यह इस कारण कि इस दशा में अन्तर और बाह्य दोनों में एक साथ योगी को स्वशक्ति-विकास ही होता है— शिखरस्थ ज्ञानं युगपद्वेदनमिति । वही जीवन्मुक्त कहलाता है। योगवासिष्ठ में इस दशा का वर्णन यूँ है— यो जागर्ति सुषुप्तस्थो यस्य जाग्रन्न विद्यते । यस्य निर्वासनो बोधः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥ (३।९।७)॥ अर्थ—वृत्ति के लीन रहते हुए भी जो जागता रहता है किन्तु वास्तव में जो जाग्रति के धर्मों से रहित है और जिसका बोध सर्वथा वासना रहित है वह पुरुष जीवन्मुक्त कहलाता है। 'वृत्ति के लीन रहते हुए भी जो जागता रहता है'— इसका आशय यह है कि यद्यपि उस योगी का चित्त सम्पूर्ण दृश्य पदार्थों का बाध करके निरन्तर ब्रह्म में लीन रहता है तथापि वह सोये हुए पुरुष के समान संज्ञाशून्य नहीं हो जाता है, वह सब व्यवहार यथावत् करता रहता है किन्तु व्यवहार करते हुए भी उसे स्वप्नवत् समझने के कारण उसकी अन्य पुरुषों के समान दृश्य पदार्थों में आस्था नहीं होती। इसलिए 'वास्तव में वह जाग्रति के धर्मों से रहित है। आगे वहीं कहा है : 'शान्तसंसारकलनः कलावानपि निष्कलः। यः सचित्तोऽपि निश्चितः स जीवन्मुक्त उच्यते ।। (३।१।१२) अर्थ—जिसकी संसार वासना शान्त हो गई है, जो कलावान् होकर भी कलाहीन है अर्थात् व्यवहार दृष्टि में ऊपर से विकारवान् प्रतीत होता हुआ भी जो निरन्तर अपने निर्विकार स्वरूप में ही स्थित रहता है तथा जिसका चित्त निश्चिन्त है वह पुरुष जीवन- मुक्त कहलाता है ॥३०॥ सम्बन्ध—योगी का विश्व न केवल सृष्टि दशा में ही अपने शक्ति-चक्र का विकास है अपितु सृष्टि के तत्क्षणात् अनन्तर भी— स्थितिलयौ ॥३१॥ स्थिति—बहिर्मुखता का आभास (और) लय—बहिर्मुखता का लय (भी) उसे अपने शक्तिचक्र का विकास है। व्याख्या--पूर्व सूत्र का 'स्वशक्तिप्रचयः' (अपने शक्तिचक्र' का विकास है) इस सूत्र के साथ जोड़ने से इसका अर्थ पूरा होता है। क्रिया शक्ति द्वारा आभास में आये

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