भारतकोश
शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation

महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा

स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

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तृतीय विकास : ६७ भूतकञ्चुकी तदा विमुक्तो भूयः पतिसमः परः ॥४२॥ तदा—तब (अभिलाषा के क्षय होने पर) भूतकञ्चुकी—शरीर को ठहराने वाले पंच-भूतों के बने कञ्चुक (आवरण रूप पोशाक) को धारण करने वाला (अयं)—(यह योगी) विमुक्तः- -मुक्ति का अधिकारी (बन जाता है) (यतः)--(क्योंकि यह) भूयः—(अभ्यास की) बहुलता से पतिसमः—शिव के समान परः--पूर्ण (होता है) । व्याख्या—अभिलाषा का क्षय होने पर अर्थात् जीवभाव के लय होने से पुर्यष्टक (पांच ज्ञानेन्द्रिय, मन, बुद्धि और अहंकार) प्रमातृ‌ता गल जाती है। तब योगी शरीर को ऐसे बनाये रखता है जैसे एक साधारण मनुष्य अपने शरीर पर चादर ओढ़ता है। उसे फिर 'भूतकञ्चुकी' कहते हैं। वह पंच-महाभूतों से बने शरीर को आवरण (पोशाक) की तरह धारण करता है। वह शरीर के साथ अहंता को नहीं जोड़ता है। उसका कल्पित पुर्यष्टक आदि शरीर पर पशुजन की तरह किया परिमित अहंभाव गल जाता है। ऐसा योगी मुक्ति का भाजन बन जाता है क्योंकि उसे चिद्धनरूप परमेश्वर के स्वरूप का आवेश होता है। उसी से वह पूर्ण-स्वरूप होता है। शिवभाव में ठहरे हुए इस जीवन्मुक्त की शरीर में, जीवन के साधारण नियम के अनुसार ही स्थिति होती है। जैसे इसी विकास के २६वें सूत्र में कहा है : 'शरीरवृत्तिर्वृतम्' । जैसे साँप को अपनी छोड़ी हुई पुरानी केंचुल (त्वचा) पर अहंता का अभिमान नहीं रहता वैसे ही इस शिवयोगी को शिव-स्वरूप में गहन अभ्यास के फलस्वरूप पृथक् देहादि पर प्रमातृता के अभिमान का अभाव रहता है। अथवा यों कहें कि जैसे खड्ग के म्यान में होते हुए भी म्यान खड्ग से अलग है वैसे ही देह-भाव के गलने से योगी को उसका प्रमातृभाव (अभिमानत्व) स्पर्श नहीं करता । वह विश्वात्मा शिव के साथ एक होता है। एक अद्वैतशास्त्र भैरवतन्त्र (श्री कुलरत्नमाला) में कहा है : यदा गुरुवरः सम्यक् कथयेत्तन्न संशयः । मुक्तस्तेनैव कालेन यन्त्रस्तिष्ठति केवलम् ॥ किं पुनश्चैकतानस्तु परे ब्रह्मणि यः सुधी । क्षणमात्रस्थितो योगी स मुक्तो मोचयेत्प्रजाः ॥ अर्थ—जब शक्तिपात के अवसर पर सद्गुण एक सत्-शिष्य को आवेश-पर्यन्त शिवभाव की प्राप्ति कराता है तब निःसंदेह वह उसी समय मुक्त होता है और शरीर