शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation
महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा
स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६८ : शिवसूत्र विमर्श को केवल यन्त्रवत् धारण करता है। फिर तो ऐसे सुबुद्धि का कहना ही क्या है जो परब्रह्म स्वरूप में अनन्यवृत्ति हो ! ऐसा योगी क्षणमात्र के लिए ही स्वरूप में ठहरे तो वह मुक्त होता है और सारी प्रजा को मुक्त करता है १ ॥४२॥ सम्बन्ध — अब प्रश्न है कि इस परमयोगी का 'भूतकञ्चुक' (शरीररूपी आवरण) भी स्वरूपलाभ के अवसर पर ही क्यों नहीं हट जाता है ? इसके उत्तर में कहते हैं। नैसर्गिकः प्राणसम्बन्धः ॥४३॥ (अस्य) — (इस महायोगी जीवन्मुक्त के शरीर में) प्राणसम्बन्धः — प्राणों का सम्बन्ध (श्वास और उच्छ्वास का प्रवहन) नैसर्गिकः — परमेश्वर की स्वातन्त्र्य शक्ति का स्वभाव ही है। व्याख्या — 'संवित् भगवती ने विश्ववैचित्र्य का अवभासन करने की इच्छा से पहले प्राण को निमित्त बनाया' — श्री भट्टकल्लट ने 'तत्त्वार्थ चिन्तामणि' ग्रन्थ में यह बात युक्तियुक्त कही है (प्राक् संवित् प्राणे परिणता) । अपने सहज स्वातन्त्र्य से संवित् देवी ने प्रपंच की विचित्रता को प्रकट करने की इच्छा से संकोच ग्रहण किया। शिव- दशा से विसर्ग रूप में आकर सृष्टि, स्थिति तथा संहार रूप इस जीव दशा का ग्रहण किया। इस प्रकार सारे विश्व में प्राणन-शक्ति को ग्रहण कर ग्राह्यरूप जगत् में यह भासमान होने लगी। अपनी स्वतन्त्रता में यह प्रथम अवभासन संवित्-देवी का प्राण- स्पन्द है। जैसे 'वाजसनेया' ग्रन्थ में कहा है : या सा शक्तिः परा सूक्ष्मा व्यापिनी निर्मला शिवा । शक्तिचक्रस्य जननी परानन्दामृतात्मिका ॥ महाघोरेश्वरी चण्डा सृष्टिसंहारकारिका । त्रिवहं त्रिविधं त्रिस्थं बलात्कालं प्रकर्षति ॥ १. वेदान्त सिद्धान्त मुक्तावली में कुछ यही विचार मिलते हैं : स्नातं तेन समस्ततीर्थसलिले दत्ता च सर्वावनि- र्यज्ञानां च .कृतं सहस्रमखिलाः देवाश्च संतर्पिताः । संसाराच्च समुद्धृताः स्वपितरः त्रैलोक्यपूज्योऽप्यसौ यस्य ब्रह्मविचारणे क्षणमपि स्थैर्यं मनः प्राप्नुयात् ॥ अर्थ — जिस किसी साधक का मन एक क्षणमात्र भी परब्रह्म के विमर्श में स्थिरता प्राप्त करे उसने (वस्तुतः) समस्त पुण्य तीर्थों का स्नान किया, सब पृथ्वी को दान में दिया, हज़ारों यज्ञों के कर्म का फल प्राप्त किया, सब देवताओं को तृप्त किया और अपने पितरों को भवपाश से उद्धार किया। ऐसा साधक सब जगत् का पूजनीय है।