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षोडश ग्रन्थाः (महाप्रभु वल्लभाचार्य - पुष्टिमार्ग सिद्धान्त एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

षोडश ग्रन्थाः (महाप्रभु वल्लभाचार्य - पुष्टिमार्ग सिद्धान्त एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Shodasha Grantha of Mahaprabhu Vallabhacharya with Commentary

महाप्रभु वल्लभाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

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ज्ञानवान् मर्यादामिश्रित पुष्टिभक्तको दास्यभावप्रदायिनी गंगाके तटपर स्नेहोत्पत्त्यर्थ श्रीभागवतके अनुशीलनमें तत्पर होना चाहिए. इन दोनों प्रकारके मिश्रपुष्टिवाले भक्तोंको जब भगवान्‌के विशेष अनुग्रहका प्रकाश मिलता है तब वे पुष्टिमार्गको खोज पाते हैं तथा पूर्वोक्त तनुवित्तजा सेवाके क्रमसे अन्तमें उन्हें मानसी सेवा फलित हो जाती है. जो केवल मर्यादामार्गीय जीव होते हैं वे भी भक्तिरहित ज्ञानवान् अथवा ज्ञानरहित भक्तिमान् हो सकते हैं. इन दोनों प्रकारके जीवोंको सायुज्य मिलता हैं. पर अन्तर यह है कि भक्तिरहित ज्ञानवान् जीव ज्ञानमार्गीय प्रक्रियासे आध्यात्मिक अक्षरब्रह्ममें सायुज्य-लय प्राप्त करता है, जबकि मर्यादाभक्त दास्यभावप्रदायिनी गंगाके प्रसादसे आधिदैविक स्वरूपमें मर्यादाभक्तिमार्गीय सायुज्य प्राप्त करता है. मर्यादामार्गीय साधककी साधनामें देश-काल आदिके नियम हैं, परन्तु पुष्टिभक्ति तो देशकालके बन्धनमें नहीं है. पुष्टिमार्गमें तो भगवान्‌का अनु- ग्रह ही केवल एकमात्र नियम या बन्धन है. अतः जिस देशमें या जिस कालमें भगवान्‌का अनुग्रह मिल जाय सर्वत्र एवम् सर्वदा पुष्टिभक्ति सम्भव है. हर सूरतमें यों अक्षरब्रह्ममें सायुज्यका दान करनेवाले ज्ञानमार्गकी तुल- नामें भक्तिमार्गका उत्कर्ष दिखलाई देता है. अतः भक्तिके बिना सब कुछ व्यर्थप्राय है. गंगातटपर तीर्थवास करनेवाला भी आधिदैविक गंगाके बारेमें यदि भक्तिरहित होता है तो कभी न कभी गंगाके आध्यात्मिक माहात्म्यको भूल कर अथवा उसे केवल आधिभौतिक जल ही समझ कर अपने दुष्ट कर्मोंके कारण अन्तमें उसके आध्यात्मिक लाभसे भी वंचित रह जाता है. इसी तरह आधिदैविक कृष्णके स्वरूपमें सर्वथा भक्तिके अभावमें, आध्यात्मिक स्वरूप अक्षरब्रह्ममें ज्ञानबलसे निवास करनेवाला विमुक्तिमानी साधक भी अरविन्दाक्ष श्रीकृष्णमें भावशून्य होनेके कारण अक्षरमे सायुज्यके लाभसे भी वंचित होकर पुनः भवप्रवाहमें अधःपतित हो जाता है. यह श्रीभागवतशास्त्रका गुप्त रहस्य श्रीमहाप्रभुने न केवल अच्युतदास के लिए प्रकट किया है, अपितु सभी पुष्टिजीवोंको — श्रीमहाप्रभुके स्वकीयोंको उनके कर्तव्यके उपदेशके रूपमें दिखला दिया है. इसे अच्छी तरहसे एकबार