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षोडश ग्रन्थाः (महाप्रभु वल्लभाचार्य - पुष्टिमार्ग सिद्धान्त एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

षोडश ग्रन्थाः (महाप्रभु वल्लभाचार्य - पुष्टिमार्ग सिद्धान्त एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Shodasha Grantha of Mahaprabhu Vallabhacharya with Commentary

महाप्रभु वल्लभाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 141, कुल 408 में से

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दूर रहनेके कारण-गंगाजलके स्नान-आचमन-अर्चनसे वंचित रहनेके कारण दुःखी रहता है, वैसे ही माहात्म्यज्ञान (और/अथवा सुदृढ सर्वतोधिक स्नेह) के अभावमें कृष्णभजनमें प्रवृत्त होनेपर कुछ न कुछ क्लेश तो होता है. पर कृष्णभजन कभी व्यर्थ नही जाता. अतः जन्मान्तरमें भी कभी न कभी महात्म्यज्ञान और/अथवा सुदृढ सर्वतोधिक स्नेह प्रकट होगा और जीवात्मा तथा परमात्मा कृष्ण के बीचकी दूरी कम होगी ही यह निश्चित है. अतः जगतकी सारी झंझटोंको छोड़कर पुष्टिके प्रशस्त पथपर चलते हुए पुष्टिजीवको श्रीकृष्णका ही निरन्तर चिन्तन करते रहना चाहिए. श्रीकृष्णने अपने आधिदैविक रसात्मक आनन्दमय स्वरूपसे सभी व्रजभक्तोंमें परमानन्दका सागर प्रकट किया है ओर अपने उस आत्मीय आनन्दके सागरमें श्रीकृष्ण सनातन लीलाविहार करते है. ऐसे व्रजभक्तोंमें लीलाविहार करने- वाले श्रीकृष्णके स्वरूपका ही हमें सर्वदा चिन्तन करना चाहिए. पुष्टिप्रवाहमर्यादा ग्रन्थमें पुष्टिजीवोंके दो अवान्तर भेद शुद्धपुष्टि और मिश्रपुष्टिके दिखलाये गये हैं. तद्नुसार मिश्रपुष्टिवाले जीवोंमे प्रवाही जीव कभी-कभी किसी लौकिक प्रयोजनके वशीभूत होकर भी कृष्णभजनमें प्रवृत्त हो जाते हैं. ऐसे प्रवाहपुष्टिवाले जीवोंके लिए कृष्णभजन सर्वथा क्लिष्ट हो जाता है. फिर भी जो सारे क्लेशोंको झेलते हुए कृष्णभजनमें लगे ही रहते है-उसे अधबीचमें छोड़ नहीं देते-उनके सारे लौकिक आवेश सर्वथा नष्ट हो जाते है. स्वयम् अपने आत्मस्वरूपके तथा अपने भजनीय परमात्माके भी समुचित शास्त्रीय ज्ञानके बिना भजनमें प्रवृत्त हो जानेवाले भक्त पुष्टिजीव भी हो सकते हैं और मर्यादाजीव भी. कभी-कभी मर्यादामिश्रित पुष्टिके जीवको भी 'मर्यादाभक्त' कहा जाता है. वैसे सामान्यतः 'मर्यादाभक्त' का अर्थ केवल मर्यादामार्गीय भक्तिमान् जीव ही होता है. मर्यादामिश्रित पुष्टिभक्त प्रारम्भिक अवस्था में भक्तिरहित शास्त्रीय ज्ञानवान् भी हो सकता है तथा शास्त्रीय माहात्म्यज्ञानके अभावमें भी भक्ति- मान् हो सकता है. ज्ञानरहित मर्यादापुष्टिभक्तको अपने चित्तको भगवान्में लगाये रखनेके लिए भगवान्की पूजा-उत्सवादिकी प्रक्रियामें तत्पर रहना चाहिए. भक्तिरहित