षोडश ग्रन्थाः (महाप्रभु वल्लभाचार्य - पुष्टिमार्ग सिद्धान्त एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Shodasha Grantha of Mahaprabhu Vallabhacharya with Commentary
महाप्रभु वल्लभाचार्य द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगंगाके आधिभौतिक रूप जलकी तरह यह सारा जगत है. गंगाके आध्या- त्मिक तीर्थरूपकी तरह अक्षरब्रह्मको समझना चाहिए. गंगाके आधिदैविक रूपे मूर्तिमती देवीकी तरह श्रीकृष्णको समझना चाहिए. जगत जैसे त्रिविध सत्व-रजस्-तमोगुणात्मक है, वैसे उसके नियामक देवता भी त्रिविध विष्णु-ब्रह्मा-शिव माने जाते हैं. इसी तरह अक्षरब्रह्म क्योंकि एकविध है अतः उसके नियामक-अधिदेव भी परब्रह्म श्रीहरि एक ही हैं. अतः अक्षरब्रह्ममें अवस्थित ब्रह्मादि सकल देवताओंके नियामक भी श्रीहरि ही हैं. श्रीहरि द्वारा अधिकृत होनेके कारण ही ये देवता भी मनोवांछित फलदान करनेमें समर्थ बनते हैं. जहांतक पुष्टिभक्तोंका प्रश्न है तो उनके तो सभी मनोवांछित ऐहिक या पारलौकिक फल परमानन्दरूप श्रीकृष्णसे ही निश्चित- तया परिपूर्ण हो जाते हैं. अतः ब्रह्मवादको अच्छी तरह समझकर केवल कृष्णमें ही अपनी बुद्धि लगानी चाहिए. ब्रह्मवादके अनुसार सभी जीवात्मा अक्षरब्रह्मकी अंश हैं अतएव ब्रह्मा- त्मक हैं. पर अविद्याजन्य अहन्ता-ममताबुद्धिके कारण स्वयम्की ब्रह्मात्मकताका हमें बोध नहीं हो पाता है. जैसे आकाशको एक चलनीमें से देखा जाय तो चलनीके छिद्र आकाशके अनेक छिद्रोंकी तरह प्रतीत होंगे. ऐसे ही अहन्ता- ममताकी चलनीमें से अनुभूत होनेके कारण अखण्ड अक्षरचैतन्य भी हमें खण्डशः व्यक्तिचेतनाके रूपमें भिन्न-भिन्न अनुभूत होता है. व्यक्तिचेतनाकी ब्रह्मात्मकताका बोध केवल अहन्ता-ममताकी उपाधिके दूर होने मात्रसे नही हो जाता, अपितु परब्रह्मके धामरूप व्यापक अद्वैत अखण्ड अक्षरब्रह्मके ज्ञान होनेपर ही वह सम्भव है. अपनी अक्षर- ब्रह्मात्मकताके बोध होनेपर अक्षरब्रह्ममें विराजमान परब्रह्म पुरुषोत्तम कृष्णके दर्शन सम्भव हो जाते हैं. जैसे गंगातीरपर तीर्थवास करनेवाला भक्त अपनी तीव्र भक्तिके कारण आधिदैविक स्वरूप मूर्तिमती गंगाके दर्शन पा लेता है, वैसे ही आध्यात्मिक अक्षरब्रह्ममें निवास करनेवाला भक्त उसके आधिदैविक स्वरूप श्रीकृष्णके दर्शन पा लेता है. माहात्म्यज्ञानके बिना सांसारिक वृत्तिसे जो कृष्णभजनमें प्रवृत्त होते हैं उनकी भगवान्के साथ दूरी मिटती नही है. जैसे कोई गंगाका भक्त गंगातटसे