भारतकोश
षोडश ग्रन्थाः (महाप्रभु वल्लभाचार्य - पुष्टिमार्ग सिद्धान्त एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

षोडश ग्रन्थाः (महाप्रभु वल्लभाचार्य - पुष्टिमार्ग सिद्धान्त एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Shodasha Grantha of Mahaprabhu Vallabhacharya with Commentary

महाप्रभु वल्लभाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

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पृष्ठ 139

ब्रह्मानन्दके प्राप्तिकी तो वह तो इस कृष्णसेवामें मिलते भजनानन्दका एक आनुषंगिक लाभ है ही. क्योंकि ब्रह्मानन्दमें अनुभूत होता अक्षरब्रह्म गणितानन्द है जबकि भजनानन्द तो परब्रह्म अगणित-सच्चिदानन्द श्रीकृष्णकी सेवाद्वारा ही मिल सकता है. यह अक्षरब्रह्म समग्र जागतिक रूपोंका उपादान होनेके कारण सर्वरूप भी है तथा सर्वविलक्षण भी. जगतके कारणके स्वरूपके वारेमें अनेक प्रकारके विवाद दिखलाई देते हैं. उदाहरणतया विवर्तवादी लोग इस जगतको मायिक मानते हैं. प्रकृतिपरिणामवादी इसे प्रकृतिके सत्व-रज-तमोगुणोंका परिणाम मानते हैं. आरम्भवादी सूक्ष्म परमाणुओंसे निर्मित मानते हैं. मीमांसकोंके अनुसार जगत जैसा आज दिखलाई देता है वैसा ही सर्वदा था और रहेगा. अतः इसके कर्ताके रूपमें परमात्माको वे मान्य नहीं करते. श्रौत मतके अनुसार, किन्तु, माया प्रकृति परमाणु अदृष्टकर्म वासना या स्वभाव आदि सभी रूपोंमें अक्षर- ब्रह्म ही जगत्का एकमात्र कारण बनता है. अक्षरब्रह्म अतएव सर्वरूप होनेपर भी सर्वविलक्षण है. जगत और अक्षरब्रह्म के परस्पर स्वरूपोंको आधिभौतिक गंगाजल, जो ग्रीष्म या वर्षा में घटता या बढ़ता है, और आध्यात्मिक तीर्थरूपा गंगा, जिसका ग्रीष्म या वर्षा से कोई भी सम्बन्ध नहीं है, के समान समझना चाहिए. आधिभौतिक रूपमें गंगा केवल एक नदी है पर आध्यात्मिक रूपमें मर्यादा- मार्गीय विधिके अनुसार तीर्थरूपा गंगाके तटपर तीर्थवास करनेवालेको मनो- वांछित फल देनेवाली मानी गयी है. इसी तरह जगतके सभी नाम-रूप अक्षर- ब्रह्मके आधिभौतिक रूप हैं पर इनसे विलक्षण भी अक्षरब्रह्मका एक आध्या- त्मिक रूप है, जो मर्यादामार्गीय ज्ञानियोंके लिए उपास्य तथा मोक्षप्रापक रूप है. गंगाके इन दो आधिभौतिक तथा आध्यात्मिक रूपोंके अलावा एक तीसरा आधिदैविक रूप भी कभी-कभी भक्तोंकों उनकी भक्तिके आवेशमें अनुभूत होता है-एक मूर्तिमती देवीके रूपमें. इस आधिदैविक रूपका प्रत्यक्ष सभीको नहीं होता. यह तो उन्हींको दिखलाई देता है जिन्हें गंगाके आधिभौतिक आध्यात्मिक तथा आधिदैविक सभी रूपोंमें तीव्र भक्तिके कारण अभेदबुद्धि घटित हो जाती है. यह घटित होनेपर आधिभौतिक रूपमें भी सर्वत्र आधिदै- विक रूपका सा व्यवहार सम्भव हो जाता है.