भारतकोश
षोडश ग्रन्थाः (महाप्रभु वल्लभाचार्य - पुष्टिमार्ग सिद्धान्त एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

षोडश ग्रन्थाः (महाप्रभु वल्लभाचार्य - पुष्टिमार्ग सिद्धान्त एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Shodasha Grantha of Mahaprabhu Vallabhacharya with Commentary

महाप्रभु वल्लभाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 138, कुल 408 में से

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पृष्ठ 138

करानेके बाद श्रीमहाप्रभु श्रीगोवर्धनधरकी सेवामें नियुक्त करना चाहते थे- "तुम गोवर्धनधरकी सेवा करो !' तब अच्युतदास श्रीआचार्यजीको दंडवत करि विनती किये- 'महाराज ! मोपर ऐसी कृपा करो जो एकान्तमें बैठिके मानसी सेवामे मन लागे ?' तब श्रीआचार्यजी अपनो चरणामृत दिये. सो अच्युतदास पान करि, हाथ नेत्रनसों लगाय, मस्तकपर लगाय हृदयसों लगायो. तब अच्युतदासके नेत्र अलौकिक हो गये. लीलाको दरसन करन लागे...." वैसे तो "प्रार्थिते वा ततः किं स्यात् स्वाभ्यभिप्रायसंशयात्. सर्वत्र तस्य सर्वं हि सर्वसामर्थ्यमेवच" (भक्तिवर्धनी) का सिद्धान्त सभी शरणागत जीवों- पर लागू होता ही है. फिरभी स्नेहके आवेशमें भक्त कभी-कभी कुछ न कुछ मांग ही लेते हैं. भगवान्‌को भी वह कृपाके आवेशमें देना ही पडता है. क्योंकि "अनुग्रहः पुष्टिमार्गे नियामक इति स्थितिः" (सिद्धान्तमुक्तावली) में निरूपित अनुग्रहशीलता अथवा भक्तपरवशता का रहस्य कुछ भक्तोंके हाथ लग जाता है! जो इस तरह प्रभुके स्वभावका लाभ ले लेते हैं, उन अग्रगण्य भक्तोंमें अच्युतदास भी एक हैं. "तब श्रीआचार्यजीने सिद्धान्तमुक्तावली करि पढ़ायी. ता करि मानसीमें मग्न भये सो गोविन्दकुण्डके पास गुफामें रहते. नेत्र प्रेमरससों भरे रहते. सो श्रीगुसांईजी नित्य दरसन देवे पधारते. ऊपर यह भाव मर्यादा राखन अर्थ परन्तु श्रीगुसांईजी दरसन करवे आवते. सो याते श्रीगुसांईजीकों श्रीआचार्यजीको अनुभव होतो. अच्युतदासके नेत्रनमें श्रीमहाप्रभुजी झलकते" (भावप्रकाश). वस्तुतः पुष्टिमार्गमें अनुग्रह ही नियामक है, भक्तका भी और भगवान्‌का भी- भक्तिकी साधनामें भी और भक्तिके फलदानमें भी ! अच्युतदासने छीन-झपटकर अपवादरूपसे जो अधिकार प्राप्त कर लिया था उसका कोई गलत अर्थ न लगा ले, अतएव श्रीमहाप्रभु अपनी सैद्धान्तिक स्थिति इस ग्रन्थमें स्पष्ट करते प्रतीत होते हैं. कृष्णसेवा हम पुष्टिमार्गीय जीवोंका सनातन कर्तव्य है. जब यह कृष्णसेवा मानसीरूपमें फलित हो जाती है तो वह सेवाकी उत्कृष्टतम अवस्था है. क्योंकि चित्तका भगवान् श्रीकृष्णके साथ तन्मय हो जाना ही सेवा है. चित्तको श्रीकृष्णके साथ तन्मय करनेके लिए स्वयम् अपने तन तथा धन को कृष्ण- सेवामें लगाना चाहिए. रही बात सांसारिक दुःखोंके दूर होनेकी या अलौकिक