षोडश ग्रन्थाः (महाप्रभु वल्लभाचार्य - पुष्टिमार्ग सिद्धान्त एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Shodasha Grantha of Mahaprabhu Vallabhacharya with Commentary
महाप्रभु वल्लभाचार्य द्वारा
पृष्ठ 137, कुल 408 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ श्रीकृष्णाय नमः ॥ ॥ श्रीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः ॥ ग्रन्थ-परिचय कहा जाता है कि सिद्धान्तमुक्तावली श्रीमहाप्रभुने अच्युतदास सनोढि- याके लिए लिखी थी. एक किवदन्तीके¹ अनुसार यह रचना वि. सं. १५५५ में जतिपुरामें की गई. बालबोधवाले नारायणदास और इन अच्युतदास के चरित्रमें कई बातोंमें समानता भी है और उल्लेखनीय अन्तर भी. नारायणदासको श्रीमहाप्रभुने स्वरूपसेवा पधरानेसे इन्कार कर दिया था, जबकि अच्युतदासको श्रीगोवर्धन- घरकी सेवामें नियुक्त करना चाहते थे. नारायणदासके व्यावृत्तिमय जीवनके कारण उनसे स्वरूपसेवाका निर्वाह सम्भव न था, जबकि अच्युतदासके चरित्रके अवलोकनसे उनकी रुझान सर्वथा अव्यावृत्त जीवन-यापनकी प्रतीत होती है. अतः तनुवित्तजा-सेवा अथवा गृहसेवा के प्रकारके निर्वाहका तो प्रश्न ही नहीं उठता. सो श्रीगोवर्धनघरकी केवल तनुजासेवा करनेके बजाय इन्होंने सीधे ही श्रीमहाप्रभुसे मानसी सेवाका वरदान ही मांग लिया ! नारायणदासको जैसे स्वरूपसेवाके अनुकल्प श्रीहस्ताक्षरकी सेवाद्वारा उत्कट भावका दान मिला, वैसे ही अच्युतदासको प्रथम तनुवित्तजा-सेवा और तब मानसी सेवा के सिद्धा- न्तसम्मत क्रमके बिना सीधे ही फलरूपा मानसी सेवाका दान श्रीमहाप्रभुने कर दिया ! सिद्धान्तमुक्तावली तथा सम्बद्ध वार्ता के अवलोकन करनेसे प्रतीत होता है कि जैसे विराटरूपके साक्षात्कारके समय श्रीकृष्ण और अर्जुन में कुछ एक मीठा विवाद हो गया था, वैसा ही विवाद श्रीमहाप्रभु और अच्युतदास में भी हुआ होना चाहिए. श्रीकृष्ण अपने विराटरूपकी महत्ता और देवदुर्लभता समझा रहे थे पर अर्जुनका कहना था कि जो भी हो उसे इस स्वरूपके नहीं किन्तु सौम्य मानुष स्वरूपके ही दर्शन सुहाते हैं. वैसे ही अच्युतदासको भी नामनिवेदन १ वैष्णववाणी (अंक ४ वर्ष १९७९)में श्रीनागरदास बांभणिया शास्त्री द्वारा लिखित लेख.