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षोडश ग्रन्थाः (महाप्रभु वल्लभाचार्य - पुष्टिमार्ग सिद्धान्त एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Shodasha Grantha of Mahaprabhu Vallabhacharya with Commentary

महाप्रभु वल्लभाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

॥ श्रीकृष्णाय नमः ॥ ॥ श्रीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः ॥ ग्रन्थ-परिचय कहा जाता है कि सिद्धान्तमुक्तावली श्रीमहाप्रभुने अच्युतदास सनोढि- याके लिए लिखी थी. एक किवदन्तीके¹ अनुसार यह रचना वि. सं. १५५५ में जतिपुरामें की गई. बालबोधवाले नारायणदास और इन अच्युतदास के चरित्रमें कई बातोंमें समानता भी है और उल्लेखनीय अन्तर भी. नारायणदासको श्रीमहाप्रभुने स्वरूपसेवा पधरानेसे इन्कार कर दिया था, जबकि अच्युतदासको श्रीगोवर्धन- घरकी सेवामें नियुक्त करना चाहते थे. नारायणदासके व्यावृत्तिमय जीवनके कारण उनसे स्वरूपसेवाका निर्वाह सम्भव न था, जबकि अच्युतदासके चरित्रके अवलोकनसे उनकी रुझान सर्वथा अव्यावृत्त जीवन-यापनकी प्रतीत होती है. अतः तनुवित्तजा-सेवा अथवा गृहसेवा के प्रकारके निर्वाहका तो प्रश्न ही नहीं उठता. सो श्रीगोवर्धनघरकी केवल तनुजासेवा करनेके बजाय इन्होंने सीधे ही श्रीमहाप्रभुसे मानसी सेवाका वरदान ही मांग लिया ! नारायणदासको जैसे स्वरूपसेवाके अनुकल्प श्रीहस्ताक्षरकी सेवाद्वारा उत्कट भावका दान मिला, वैसे ही अच्युतदासको प्रथम तनुवित्तजा-सेवा और तब मानसी सेवा के सिद्धा- न्तसम्मत क्रमके बिना सीधे ही फलरूपा मानसी सेवाका दान श्रीमहाप्रभुने कर दिया ! सिद्धान्तमुक्तावली तथा सम्बद्ध वार्ता के अवलोकन करनेसे प्रतीत होता है कि जैसे विराटरूपके साक्षात्कारके समय श्रीकृष्ण और अर्जुन में कुछ एक मीठा विवाद हो गया था, वैसा ही विवाद श्रीमहाप्रभु और अच्युतदास में भी हुआ होना चाहिए. श्रीकृष्ण अपने विराटरूपकी महत्ता और देवदुर्लभता समझा रहे थे पर अर्जुनका कहना था कि जो भी हो उसे इस स्वरूपके नहीं किन्तु सौम्य मानुष स्वरूपके ही दर्शन सुहाते हैं. वैसे ही अच्युतदासको भी नामनिवेदन १ वैष्णववाणी (अंक ४ वर्ष १९७९)में श्रीनागरदास बांभणिया शास्त्री द्वारा लिखित लेख.

करानेके बाद श्रीमहाप्रभु श्रीगोवर्धनधरकी सेवामें नियुक्त करना चाहते थे- "तुम गोवर्धनधरकी सेवा करो !' तब अच्युतदास श्रीआचार्यजीको दंडवत करि विनती किये- 'महाराज ! मोपर ऐसी कृपा करो जो एकान्तमें बैठिके मानसी सेवामे मन लागे ?' तब श्रीआचार्यजी अपनो चरणामृत दिये. सो अच्युतदास पान करि, हाथ नेत्रनसों लगाय, मस्तकपर लगाय हृदयसों लगायो. तब अच्युतदासके नेत्र अलौकिक हो गये. लीलाको दरसन करन लागे...." वैसे तो "प्रार्थिते वा ततः किं स्यात् स्वाभ्यभिप्रायसंशयात्. सर्वत्र तस्य सर्वं हि सर्वसामर्थ्यमेवच" (भक्तिवर्धनी) का सिद्धान्त सभी शरणागत जीवों- पर लागू होता ही है. फिरभी स्नेहके आवेशमें भक्त कभी-कभी कुछ न कुछ मांग ही लेते हैं. भगवान्‌को भी वह कृपाके आवेशमें देना ही पडता है. क्योंकि "अनुग्रहः पुष्टिमार्गे नियामक इति स्थितिः" (सिद्धान्तमुक्तावली) में निरूपित अनुग्रहशीलता अथवा भक्तपरवशता का रहस्य कुछ भक्तोंके हाथ लग जाता है! जो इस तरह प्रभुके स्वभावका लाभ ले लेते हैं, उन अग्रगण्य भक्तोंमें अच्युतदास भी एक हैं. "तब श्रीआचार्यजीने सिद्धान्तमुक्तावली करि पढ़ायी. ता करि मानसीमें मग्न भये सो गोविन्दकुण्डके पास गुफामें रहते. नेत्र प्रेमरससों भरे रहते. सो श्रीगुसांईजी नित्य दरसन देवे पधारते. ऊपर यह भाव मर्यादा राखन अर्थ परन्तु श्रीगुसांईजी दरसन करवे आवते. सो याते श्रीगुसांईजीकों श्रीआचार्यजीको अनुभव होतो. अच्युतदासके नेत्रनमें श्रीमहाप्रभुजी झलकते" (भावप्रकाश). वस्तुतः पुष्टिमार्गमें अनुग्रह ही नियामक है, भक्तका भी और भगवान्‌का भी- भक्तिकी साधनामें भी और भक्तिके फलदानमें भी ! अच्युतदासने छीन-झपटकर अपवादरूपसे जो अधिकार प्राप्त कर लिया था उसका कोई गलत अर्थ न लगा ले, अतएव श्रीमहाप्रभु अपनी सैद्धान्तिक स्थिति इस ग्रन्थमें स्पष्ट करते प्रतीत होते हैं. कृष्णसेवा हम पुष्टिमार्गीय जीवोंका सनातन कर्तव्य है. जब यह कृष्णसेवा मानसीरूपमें फलित हो जाती है तो वह सेवाकी उत्कृष्टतम अवस्था है. क्योंकि चित्तका भगवान् श्रीकृष्णके साथ तन्मय हो जाना ही सेवा है. चित्तको श्रीकृष्णके साथ तन्मय करनेके लिए स्वयम् अपने तन तथा धन को कृष्ण- सेवामें लगाना चाहिए. रही बात सांसारिक दुःखोंके दूर होनेकी या अलौकिक

ब्रह्मानन्दके प्राप्तिकी तो वह तो इस कृष्णसेवामें मिलते भजनानन्दका एक आनुषंगिक लाभ है ही. क्योंकि ब्रह्मानन्दमें अनुभूत होता अक्षरब्रह्म गणितानन्द है जबकि भजनानन्द तो परब्रह्म अगणित-सच्चिदानन्द श्रीकृष्णकी सेवाद्वारा ही मिल सकता है. यह अक्षरब्रह्म समग्र जागतिक रूपोंका उपादान होनेके कारण सर्वरूप भी है तथा सर्वविलक्षण भी. जगतके कारणके स्वरूपके वारेमें अनेक प्रकारके विवाद दिखलाई देते हैं. उदाहरणतया विवर्तवादी लोग इस जगतको मायिक मानते हैं. प्रकृतिपरिणामवादी इसे प्रकृतिके सत्व-रज-तमोगुणोंका परिणाम मानते हैं. आरम्भवादी सूक्ष्म परमाणुओंसे निर्मित मानते हैं. मीमांसकोंके अनुसार जगत जैसा आज दिखलाई देता है वैसा ही सर्वदा था और रहेगा. अतः इसके कर्ताके रूपमें परमात्माको वे मान्य नहीं करते. श्रौत मतके अनुसार, किन्तु, माया प्रकृति परमाणु अदृष्टकर्म वासना या स्वभाव आदि सभी रूपोंमें अक्षर- ब्रह्म ही जगत्का एकमात्र कारण बनता है. अक्षरब्रह्म अतएव सर्वरूप होनेपर भी सर्वविलक्षण है. जगत और अक्षरब्रह्म के परस्पर स्वरूपोंको आधिभौतिक गंगाजल, जो ग्रीष्म या वर्षा में घटता या बढ़ता है, और आध्यात्मिक तीर्थरूपा गंगा, जिसका ग्रीष्म या वर्षा से कोई भी सम्बन्ध नहीं है, के समान समझना चाहिए. आधिभौतिक रूपमें गंगा केवल एक नदी है पर आध्यात्मिक रूपमें मर्यादा- मार्गीय विधिके अनुसार तीर्थरूपा गंगाके तटपर तीर्थवास करनेवालेको मनो- वांछित फल देनेवाली मानी गयी है. इसी तरह जगतके सभी नाम-रूप अक्षर- ब्रह्मके आधिभौतिक रूप हैं पर इनसे विलक्षण भी अक्षरब्रह्मका एक आध्या- त्मिक रूप है, जो मर्यादामार्गीय ज्ञानियोंके लिए उपास्य तथा मोक्षप्रापक रूप है. गंगाके इन दो आधिभौतिक तथा आध्यात्मिक रूपोंके अलावा एक तीसरा आधिदैविक रूप भी कभी-कभी भक्तोंकों उनकी भक्तिके आवेशमें अनुभूत होता है-एक मूर्तिमती देवीके रूपमें. इस आधिदैविक रूपका प्रत्यक्ष सभीको नहीं होता. यह तो उन्हींको दिखलाई देता है जिन्हें गंगाके आधिभौतिक आध्यात्मिक तथा आधिदैविक सभी रूपोंमें तीव्र भक्तिके कारण अभेदबुद्धि घटित हो जाती है. यह घटित होनेपर आधिभौतिक रूपमें भी सर्वत्र आधिदै- विक रूपका सा व्यवहार सम्भव हो जाता है.

गंगाके आधिभौतिक रूप जलकी तरह यह सारा जगत है. गंगाके आध्या- त्मिक तीर्थरूपकी तरह अक्षरब्रह्मको समझना चाहिए. गंगाके आधिदैविक रूपे मूर्तिमती देवीकी तरह श्रीकृष्णको समझना चाहिए. जगत जैसे त्रिविध सत्व-रजस्-तमोगुणात्मक है, वैसे उसके नियामक देवता भी त्रिविध विष्णु-ब्रह्मा-शिव माने जाते हैं. इसी तरह अक्षरब्रह्म क्योंकि एकविध है अतः उसके नियामक-अधिदेव भी परब्रह्म श्रीहरि एक ही हैं. अतः अक्षरब्रह्ममें अवस्थित ब्रह्मादि सकल देवताओंके नियामक भी श्रीहरि ही हैं. श्रीहरि द्वारा अधिकृत होनेके कारण ही ये देवता भी मनोवांछित फलदान करनेमें समर्थ बनते हैं. जहांतक पुष्टिभक्तोंका प्रश्न है तो उनके तो सभी मनोवांछित ऐहिक या पारलौकिक फल परमानन्दरूप श्रीकृष्णसे ही निश्चित- तया परिपूर्ण हो जाते हैं. अतः ब्रह्मवादको अच्छी तरह समझकर केवल कृष्णमें ही अपनी बुद्धि लगानी चाहिए. ब्रह्मवादके अनुसार सभी जीवात्मा अक्षरब्रह्मकी अंश हैं अतएव ब्रह्मा- त्मक हैं. पर अविद्याजन्य अहन्ता-ममताबुद्धिके कारण स्वयम्‌की ब्रह्मात्मकताका हमें बोध नहीं हो पाता है. जैसे आकाशको एक चलनीमें से देखा जाय तो चलनीके छिद्र आकाशके अनेक छिद्रोंकी तरह प्रतीत होंगे. ऐसे ही अहन्ता- ममताकी चलनीमें से अनुभूत होनेके कारण अखण्ड अक्षरचैतन्य भी हमें खण्डशः व्यक्तिचेतनाके रूपमें भिन्न-भिन्न अनुभूत होता है. व्यक्तिचेतनाकी ब्रह्मात्मकताका बोध केवल अहन्ता-ममताकी उपाधिके दूर होने मात्रसे नही हो जाता, अपितु परब्रह्मके धामरूप व्यापक अद्वैत अखण्ड अक्षरब्रह्मके ज्ञान होनेपर ही वह सम्भव है. अपनी अक्षर- ब्रह्मात्मकताके बोध होनेपर अक्षरब्रह्ममें विराजमान परब्रह्म पुरुषोत्तम कृष्णके दर्शन सम्भव हो जाते हैं. जैसे गंगातीरपर तीर्थवास करनेवाला भक्त अपनी तीव्र भक्तिके कारण आधिदैविक स्वरूप मूर्तिमती गंगाके दर्शन पा लेता है, वैसे ही आध्यात्मिक अक्षरब्रह्ममें निवास करनेवाला भक्त उसके आधिदैविक स्वरूप श्रीकृष्णके दर्शन पा लेता है. माहात्म्यज्ञानके बिना सांसारिक वृत्तिसे जो कृष्णभजनमें प्रवृत्त होते हैं उनकी भगवान्‌के साथ दूरी मिटती नही है. जैसे कोई गंगाका भक्त गंगातटसे

दूर रहनेके कारण-गंगाजलके स्नान-आचमन-अर्चनसे वंचित रहनेके कारण दुःखी रहता है, वैसे ही माहात्म्यज्ञान (और/अथवा सुदृढ सर्वतोधिक स्नेह) के अभावमें कृष्णभजनमें प्रवृत्त होनेपर कुछ न कुछ क्लेश तो होता है. पर कृष्णभजन कभी व्यर्थ नही जाता. अतः जन्मान्तरमें भी कभी न कभी महात्म्यज्ञान और/अथवा सुदृढ सर्वतोधिक स्नेह प्रकट होगा और जीवात्मा तथा परमात्मा कृष्ण के बीचकी दूरी कम होगी ही यह निश्चित है. अतः जगतकी सारी झंझटोंको छोड़कर पुष्टिके प्रशस्त पथपर चलते हुए पुष्टिजीवको श्रीकृष्णका ही निरन्तर चिन्तन करते रहना चाहिए. श्रीकृष्णने अपने आधिदैविक रसात्मक आनन्दमय स्वरूपसे सभी व्रजभक्तोंमें परमानन्दका सागर प्रकट किया है ओर अपने उस आत्मीय आनन्दके सागरमें श्रीकृष्ण सनातन लीलाविहार करते है. ऐसे व्रजभक्तोंमें लीलाविहार करने- वाले श्रीकृष्णके स्वरूपका ही हमें सर्वदा चिन्तन करना चाहिए. पुष्टिप्रवाहमर्यादा ग्रन्थमें पुष्टिजीवोंके दो अवान्तर भेद शुद्धपुष्टि और मिश्रपुष्टिके दिखलाये गये हैं. तद्नुसार मिश्रपुष्टिवाले जीवोंमे प्रवाही जीव कभी-कभी किसी लौकिक प्रयोजनके वशीभूत होकर भी कृष्णभजनमें प्रवृत्त हो जाते हैं. ऐसे प्रवाहपुष्टिवाले जीवोंके लिए कृष्णभजन सर्वथा क्लिष्ट हो जाता है. फिर भी जो सारे क्लेशोंको झेलते हुए कृष्णभजनमें लगे ही रहते है-उसे अधबीचमें छोड़ नहीं देते-उनके सारे लौकिक आवेश सर्वथा नष्ट हो जाते है. स्वयम् अपने आत्मस्वरूपके तथा अपने भजनीय परमात्माके भी समुचित शास्त्रीय ज्ञानके बिना भजनमें प्रवृत्त हो जानेवाले भक्त पुष्टिजीव भी हो सकते हैं और मर्यादाजीव भी. कभी-कभी मर्यादामिश्रित पुष्टिके जीवको भी 'मर्यादाभक्त' कहा जाता है. वैसे सामान्यतः 'मर्यादाभक्त' का अर्थ केवल मर्यादामार्गीय भक्तिमान् जीव ही होता है. मर्यादामिश्रित पुष्टिभक्त प्रारम्भिक अवस्था में भक्तिरहित शास्त्रीय ज्ञानवान् भी हो सकता है तथा शास्त्रीय माहात्म्यज्ञानके अभावमें भी भक्ति- मान् हो सकता है. ज्ञानरहित मर्यादापुष्टिभक्तको अपने चित्तको भगवान्में लगाये रखनेके लिए भगवान्की पूजा-उत्सवादिकी प्रक्रियामें तत्पर रहना चाहिए. भक्तिरहित

ज्ञानवान् मर्यादामिश्रित पुष्टिभक्तको दास्यभावप्रदायिनी गंगाके तटपर स्नेहोत्पत्त्यर्थ श्रीभागवतके अनुशीलनमें तत्पर होना चाहिए. इन दोनों प्रकारके मिश्रपुष्टिवाले भक्तोंको जब भगवान्‌के विशेष अनुग्रहका प्रकाश मिलता है तब वे पुष्टिमार्गको खोज पाते हैं तथा पूर्वोक्त तनुवित्तजा सेवाके क्रमसे अन्तमें उन्हें मानसी सेवा फलित हो जाती है. जो केवल मर्यादामार्गीय जीव होते हैं वे भी भक्तिरहित ज्ञानवान् अथवा ज्ञानरहित भक्तिमान् हो सकते हैं. इन दोनों प्रकारके जीवोंको सायुज्य मिलता हैं. पर अन्तर यह है कि भक्तिरहित ज्ञानवान् जीव ज्ञानमार्गीय प्रक्रियासे आध्यात्मिक अक्षरब्रह्ममें सायुज्य-लय प्राप्त करता है, जबकि मर्यादाभक्त दास्यभावप्रदायिनी गंगाके प्रसादसे आधिदैविक स्वरूपमें मर्यादाभक्तिमार्गीय सायुज्य प्राप्त करता है. मर्यादामार्गीय साधककी साधनामें देश-काल आदिके नियम हैं, परन्तु पुष्टिभक्ति तो देशकालके बन्धनमें नहीं है. पुष्टिमार्गमें तो भगवान्‌का अनु- ग्रह ही केवल एकमात्र नियम या बन्धन है. अतः जिस देशमें या जिस कालमें भगवान्‌का अनुग्रह मिल जाय सर्वत्र एवम् सर्वदा पुष्टिभक्ति सम्भव है. हर सूरतमें यों अक्षरब्रह्ममें सायुज्यका दान करनेवाले ज्ञानमार्गकी तुल- नामें भक्तिमार्गका उत्कर्ष दिखलाई देता है. अतः भक्तिके बिना सब कुछ व्यर्थप्राय है. गंगातटपर तीर्थवास करनेवाला भी आधिदैविक गंगाके बारेमें यदि भक्तिरहित होता है तो कभी न कभी गंगाके आध्यात्मिक माहात्म्यको भूल कर अथवा उसे केवल आधिभौतिक जल ही समझ कर अपने दुष्ट कर्मोंके कारण अन्तमें उसके आध्यात्मिक लाभसे भी वंचित रह जाता है. इसी तरह आधिदैविक कृष्णके स्वरूपमें सर्वथा भक्तिके अभावमें, आध्यात्मिक स्वरूप अक्षरब्रह्ममें ज्ञानबलसे निवास करनेवाला विमुक्तिमानी साधक भी अरविन्दाक्ष श्रीकृष्णमें भावशून्य होनेके कारण अक्षरमे सायुज्यके लाभसे भी वंचित होकर पुनः भवप्रवाहमें अधःपतित हो जाता है. यह श्रीभागवतशास्त्रका गुप्त रहस्य श्रीमहाप्रभुने न केवल अच्युतदास के लिए प्रकट किया है, अपितु सभी पुष्टिजीवोंको — श्रीमहाप्रभुके स्वकीयोंको उनके कर्तव्यके उपदेशके रूपमें दिखला दिया है. इसे अच्छी तरहसे एकबार

समझ लेनेपर सभी पुष्टिजीव अपने कर्तव्य-सम्बन्धी सभी प्रकारके संशयोंस मुक्त हो सकते हैं. प्रस्तुत सिद्धान्तमुक्तावलीका संस्करण वि. सं. १९७९ में प्रकाशित संस्करणका ऑफसेट प्रॉसेस द्वारा पुनर्मुद्रित रूप है उस प्रथम संस्करणके सम्पादक थे पुष्टिमार्गीय साहित्यसेवाके द्वितीय श्रीपुरुषोत्तमजी श्रीमूलचन्द्र तुलसीदास तेलीवाला तथा श्रीधैर्यलाल व्रजदास सांकलिया. प्रकाशनभार भग- वद्धर्मपरायण श्रीरामदास रणछोडदास ठाकरसीने वहन किया था. इन सभी महानुभावोके प्रति इस पुनः प्रकाशनके अवसरपर हम अपनी हार्दिक कृतज्ञता अभिव्यक्त करते हैं. इतिशम्.

प्रस्तावना.

સિદ્ધાન્તમુક્તાવલીનું અષ્ટ ટીકા સાથે મુદ્રણ-પ્રાકટ્ય સદ્ગત શેઠ માધવજી ઠાકરસી તથા તેમના નાના ભાઇ શેઠ રણછોડદાસ ઠાકરસીના સ્મરણાર્થે તત્પુત્ર ભગવદ્ધર્મપરાયણ શેઠ રામદાસ રણછોડ- દાસના દ્રવ્યથી થાય છે. શ્રીજીવનલાલજી મહારાજશ્રીના દ્રવ્યાદિ સાહાય્યથી અમે સેવાફલ, નિરોધ- લક્ષણ, સંન્યાસનિર્ણય, જલભેદ, પંચપદ્ય, અને ભક્તિવર્ધિની એટલા ગ્રન્થોની યાવત્પ્રાપ્યટીકાસમેત પ્રસિદ્ધિ કરી છે. તેજ પદ્ધતિને અનુસરીને સિદ્ધાન્તમુક્તાવલી ગ્રન્થ પણ જેટલી ટીકા અમને મલી તેટલીનો સંગ્રહ કરી, યથાશક્તિ યથામતિ શોધીને પ્રસિદ્ધ કરીએ છીએ. શેઠ રામદાસ- ભાઇની ઇચ્છાથી ગુર્જર ભાષાન્તર પણ શ્રીમત્પ્રભુચરણની ટીકા અને શ્રીપુરુષોત્તમજીના પ્રકાશના છાયારૂપ આપ્યું છે. ભાષાન્તર કરતી વખતે અદ્યાપિ પર્યન્ત પ્રકટ થયેલા સિદ્ધાન્તમુક્તાવલીના ભાષાન્તરો—શાસ્ત્રી શ્યામજી, શાસ્ત્રી રાઘવજી, શાસ્ત્રી છગનલાલ અમરજી આદિના—જોયાં છે. અત્ર મુદ્રિત કરેલી ટીકાઓ પણ જોઇ છે. તોપણ આચાર્યશ્રીનો નિગૂઢ આશય બહુ સ્થલે યથાસ્થિત ઉદ્ઘાટન કરવામાં સંદેહ રહે છે. વસ્તુતઃ આચાર્યશ્રીના ગ્રન્થોના ભાષાન્તરનો સમય હજુ આવ્યો નથી. મૂલ ગ્રન્થકારના આશયને યથાસ્થિત સાચવી શકે એવા ભાષાન્તર યોજ- વાને વાસ્તે વારંવાર શ્રદ્ધાપૂર્વક વાચન અને પઠન પાઠનની અપેક્ષા છે. સંપ્રદાયમાં ભણવાનું તો નેવે મુકાયું છે. એવા સંયોગોમાં શુદ્ધ ભાષાન્તર ત્વરાથી થવાની અપેક્ષા કરવામાં આવે તો તેમાં પ્રયત્નસાધ્યતાં આવતા એ ભાષાન્તરમાં ક્લેશજન્યતાને લઇને પ્રસાદ હોવાનો સંભવ ઓછો રહે છે. સિદ્ધાન્તમુક્તાવલીની અત્ર સંગૃહીત ટીકાઓમાં શ્રીમત્પ્રભુચરણની વિવૃતિ તો આપશ્રીએ ‘હૃદયમાં ધરી’ એમ કહેવાથી આચાર્યશ્રીના મૂલગ્રન્થની સમાન જ અમારા જેવા અનધિકારીને માટે તો ગૂઢ થઈ પડી છે. શ્રીગોકુલેશ, શ્રીકલ્યાણરાયજી, શ્રીવલ્લભાદિની ટિપ્પણીઓ અતિસૂક્ષ્મ છે. શ્રીપુરુષોત્તમજીનો પ્રકાશ સિદ્ધાન્તમુક્તાવલીના બોધમાં બહુ ઉપયોગી થાય છે, પરન્તુ શ્રીપુરુ- ષોત્તમજી પાસે પણ શ્રીગુસાંઇજીની વિવૃતિની અન્તિમ આવૃત્તિ નહિ હોવાથી, ઘણે સ્થલે આશય સમજવામાં સંદિગ્ધતા રહી છે. લાલૂભટ્ટની સ્વતંત્ર ટીકા છે, છતાં એક બે શાસ્ત્રાર્થના પાંડિત્યદ્યોતક વાદસંગ્રહ વિના મૂલ ગ્રન્થના આશય સમજવામાં સહાયક બહુ નથી. શ્રીદ્વાર- કેશજીની ટીકા ત્રુટિત લાગે છે. શ્રીહરિરાયજીનો પ્રકીર્ણ લેખ એક જ પ્રતિ ઉપરથી મુદ્રિત થયેલો હોવાથી સંદિગ્ધ જ રહે છે. આ સિવાય બે ટીકાઓ અમારા જોવામાં આવી છે. એક નનામી અન્વયમુખી અને બીજી વિસ્તૃત પણ ધડ માથા વગરની ટીકા મુંબઇના શ્રીગોકુલના- થજીના સંગ્રહમાં જોઇ છે. પરન્તુ ઉભય એટલી તો અશુદ્ધ માલૂમ પડી કે તેને મુદ્રિત કરવાનું સાહસ ઉચિત લાગ્યું નહિ. તેથી અત્ર કરેલા ભાષાન્તરમાં પણ મહાનુભાવોને પગલે ચાલી આચાર્યશ્રીના ચરણરજની આકાંક્ષા કરતાં ક્ષમાની પ્રાર્થના જ કરવા વિના અન્ય કથન વાચો- વિગ્લાપન લાગે છે. કારણ કે આ વસ્તુસ્થિતિમાં ભાષાન્તર કરવું એ એક પ્રકારનું ધાર્ષ્ટ્ય લાગે છે. અત્ર એટલું જ કહીશું કે, ‘यदत्र सदसद्वापि जीवबुद्ध्या मयोदितम् । तत्क्षमन्त्वपराधं मे कृपया दीनवत्सलाः ।’

पुस्तकसंग्रह अने संशोधन.

૧. શ્રીમત્પ્રભુચરણ-શ્રીગુસાંઇજી-કૃત વિવૃતિ નીચે જણાવેલી ૨૧ પ્રતિના આધારે શોધીને મુદ્રિત કરી છે. આ પ્રતિઓ જોતાં એક અનુમાન જે અમને સ્ફૂર્યું તે અત્ર જણાવવું આવ- શ્યક છે. શ્રીમત્પ્રભુચરણની વિવૃતિની ત્રણ આવૃત્તિ થયેલી દિશે છે. પ્રથમ આવૃત્તિ સૂક્ષ્મ છે.

દ્વિતીય આવૃત્તિમાં મુદ્રિત પુસ્તકના પૃષ્ઠ પાંચ, પંક્તિ પાંચ, एवम्થી ઉચ્ચતે સુધીનો ભાગ આપશ્રીએ ઉમેર્યો છે એમ લાગે છે. અને તૃતીય આવૃત્તિમાં એ જ અધિક ભાગને ફરીથી લખ્યો છે. આ ફરીથી લખેલો ભાગ તેજ પૃષ્ઠ ઉપર અમે ટિપ્પણમાં ધર્યો છે. પરંતુ આ ભાગ આપશ્રીએ ઉમેર્યો તેની સાથે પૃષ્ઠ ૪૩, ૪૪, ૪૫, ૪૬, ૪૭, ૪૮, ૪૯, અને ૫૧ પૃષ્ઠો ઉપર કૌંસમાં જણાવેલા ભાગો પણ ઉમેર્યા. આ કૌંસમાં જણાવેલા ભાગોની ભાષા તો શ્રીમત્પ્રભુચરણની જ લાગે છે, અને મૂલ ગ્રન્થનો આશય બહુ સ્ફુટ રીતે બોધે છે છતાં, શ્રીગોકુલેશ, શ્રીકલ્યાણરાયજી, શ્રીપુરુષોત્તમજી, શ્રીવલ્લભજી, શ્રીવ્રજનાથજી આદિ કોઇ એ ભાગોનો ઉપન્યાસ પોતાની ટીકામાં કરતા દિશતા નથી. અમે સંગૃહીત કરેલી શ્રીગુસાંઇજીની વિવૃતિની પ્રતોમાં કેટલીક તો અત્યન્ત પ્રાચીન અને પ્રામાણિક દિશે છે. ચાચા શ્રીગોપેશજીના નામની એક પ્રતિ તો છે, પરંતુ આ પ્રાચીન પ્રતોમાં કોઇનામાં પણ કૌંસમાં જણાવેલા ભાગો નથી. એટલે એ ભાગો શ્રીમત્પ્રભુચરણની વિવૃતિમાં કોઇએ પાછલથી ઉમેર્યા એમ કહેવામાં પ્રતિબંધ એટલો જ રહે છે કે આ ભાગોની ભાષા શ્રીમત્પ્રભુચરણની નથી એમ કહી શકાતું નથી. તેમાં વલી આ ભાગો મૂલ ગ્રન્થનું શ્રીમત્પ્રભુચરણની રીતિથી જ વ્યાખ્યાન કરે છે. અને જ્યાં ટીકાકારકૃત વ્યાખ્યાન અને આ કૌંસમાંના ભાગોમાં આપેલું મૂલગ્રન્થનું વ્યાખ્યાન સર- ખાવીએ છીએ ત્યાં સર્વત્ર ટીકાકારના સ્વતંત્ર વ્યાખ્યાન કરતાં આ કૌંસમાં કરેલું વ્યાખ્યાન વિશેષ વિશ્વસનીય લાગે છે. આથી ફલિત એ થાય છે કે પ્રથમ શ્રીમત્પ્રભુચરણે આ વિવૃતિ લખી, અને તેની પ્રતિઓ સર્વત્ર પ્રચલિત થઈ ગઈ, ત્યાર પછી કોઈ કૃપાપાત્ર ભગવદીયની ઇચ્છાથી કે નિજેચ્છાથી આપશ્રીએ મૂલગ્રન્થ જ્યાં જ્યાં વિશેષ વ્યાખ્યાનસાપેક્ષ લાગ્યો ત્યાં ત્યાં આ કૌંસમાંના ભાગો ઉમેર્યા. આને લીધે ટીકાકારોની પ્રાચીન પ્રતિઓમાં તે ભાગ ન આવ્યા. પરંતુ આ પણ અમારે જણાવવું જોઇએ કે આવી તૃતીય આવૃત્તિની કોઇ બહુ પ્રાચીન પ્રતિ અમને મલી નથી. સંગૃહીત કરેલા પુસ્તકો નીચે પ્રમાણે છે. ૧. પં. ગટ્ટૂલાલાજીનું. પ્રાચીન, શુદ્ધ પત્ર ૬. પ્રથમ આવૃત્તિ. ૨. પં. બલભદ્રશર્માનું. મૂલ શ્રીઘનશ્યામાત્મજ શ્રીગોપેશનું. પત્ર ૧૬. પ્રાચીન તથા શુદ્ધ, પ્રથમ આવૃત્તિ. ૩. શ્રીગોપાલાત્મજ શ્રીયદુનાથનું. શુદ્ધ, પ્રાચીન. પ્રથમ આવૃત્તિ. પત્ર ૬. ગટ્ટૂલાલાજીના સંગ્રહમાંથી પ્રાપ્ત. ૪. શાસ્ત્રી ભદ્રશંકર ખંભાતવાલાનું. સંવત્ ૧૮૫૩. માર્ગ. વદિ ૧૧. મૂલ દીક્ષિત મંચ્છા- રામાત્મજ ઉત્તમરામે શ્રીગૌડમાલવિએ ભરૂચમાં લખેલું. પત્ર ૭. સાધારણ. પ્રથમ આવૃત્તિ. ૫. શ્રીજીવનલાલજીના સંગ્રહમાંનું. પત્ર ૫. વાંચેલું. નૂતન. સં. ૧૮૮૧. આશ્વિન વદિ ૪. મંગલ. પ્રથમ આવૃત્તિ. ૬. પં. ગટ્ટૂલાલાજીનું. નૂતન. પ્રથમ આવૃત્તિ. શોધિત. પત્ર ૭. ૭. શ્રીજીવનલાલજીનું. સં. ૧૮૨૦. આશ્વિન સુદિ ૧૩. પત્ર ૪. પ્રથમ આવૃત્તિ. ૮. શ્રીજીવનલાલજીનું. સં. ૧૮૮૮. આશ્વિન સુદિ ૧૧, સોમ. પત્ર ૭. પ્રથમ આવૃત્તિ. ૯. રા. વાડીલાલભાઈ પાસેના વૈષ્ણવપરિષત્સંગ્રહમાંનું. નૂતન. પત્ર ૮. તૃતીય આવૃત્તિ. કૌંસમાં જણાવેલા સર્વ ભાગોવાળું. ૧૦. શ્રીવલ્લભલાલજીનું. સં. ૧૭૫૭. માઘ સુ. ૧૦. શુધ. પ્રથમ આવૃત્તિ. ૧૧. પં. ગટ્ટૂલાલાજીનું. બહુ જૂનું નહિ. પત્ર ૧૨. તૃતીય આવૃત્તિ. સર્વ વધારા સાથે. ૧૨. શ્રીજીવનલાલજીનું. શ્રીગોકુલેશકૃત ટીકાસહિત. પત્ર ૮. પ્રથમ આવૃત્તિ.

૧૩. ગટ્ટૂલાલાજીનું. સાધારણ. પ્રથમ આવૃત્તિ. ૧૪. શ્રીવલ્લભલાલજીનું શ્રીગોકુલેશકૃત ટીકાસહિત. પત્ર ૮. પ્રથમ આવૃત્તિ. ૧૫. શાસ્ત્રી મગ્નલાલ ગણપતિરામનું. તૃતીય આવૃત્તિ. સર્વ વધારા સાથે. નૂતન. ૧૬. નડીયાદની ડાહીલક્ષ્મી લાઇબ્રેરીનું સદ્ગત તનસુખરામભાઇદ્વારા પ્રાપ્ત. પ્રાચીન, શુદ્ધ, પત્ર ૪. પ્રથમ આવૃત્તિ. ૧૭. પં. ગટ્ટૂલાલાજીનું સાધારણ. ૧૮. નડીયાદની વૈષ્ણવ બાઇ રુકિમણીનું. નૂતન. દ્વિતીય આવૃત્તિ. વાચેલું અને ટિપ્પણયુક્ત. ૧૯. ભગવદીય મનમોહનદાસ દલાલનું. નૂતન. તૃતીય આવૃત્તિ. ૨૦. નડીયાદ ડાહીલક્ષ્મી લાઇબ્રેરીનું. તનસુખરામભાઇદ્વારા પ્રાપ્ત. પ્રથમ આવૃત્તિ. ૨૧. શ્રીનાથદ્વારનું મુદ્રિત પુસ્તક. શ્યામજી શાસ્ત્રીનું શોધેલું. આ ઉપર જણાવેલાં ૨૦ હસ્તલિખિત અને એક મુદ્રિત પુસ્તકના આધારે શ્રીમત્પ્રભુ- ચરણની વિવૃતિનું મુદ્રણ થયું છે. ૨ શ્રીગોકુલનાથજીની ટિપ્પણી નીચે જણાવેલા પુસ્તકોને આધારે શોધી છે. ૧ નડીઆદની ડાહીલક્ષ્મી લાઇબ્રેરીમાંથી સદ્ગત તનસુખરામભાઇદ્વારા પ્રાપ્ત. પ્રાચીન. પત્ર ૪. ૨ પં. ગટ્ટૂલાલાજીના સંગ્રહમાંનું પત્ર ૨. પ્રાચીન. ૩ પં. ગટ્ટૂલાલાજીના સંગ્રહમાંનું નૂતન. પત્ર ૪. ૪ શ્રીજીવનલાલજીનું. નૂતન. પત્ર ૩. ૫ શ્રીજીવનલાલજીનું નૂતન. પત્ર ૨. ૬ વાડીલાલભાઇ પાસેના વૈષ્ણવપરિષત્સંગ્રહમાંનું, નૂતન. પત્ર ૪. ૭ પં. ગટ્ટૂલાલાજીના સંગ્રહમાંનું, નૂતન. પત્ર ૪. ૮ પં. ગટ્ટૂલાલાજીના સંગ્રહમાંનું, પત્ર ૪. ૯ પં. ગટ્ટૂલાલાજીના સંગ્રહમાંનું, પ્રાચીન, શુદ્ધ, પત્ર ૪. ૧૦ પં. ગટ્ટૂલાલાજીના સંગ્રહમાંનું. પત્ર ૪. સંવત્ ૧૮૫૪ માધ સુદ ૧. સાધારણ. ૧૧ શાસ્ત્રી મગ્નલાલનું. નૂતન. ૧૨ પં. બલભદ્રશર્માનું. નૂતન. ૧૩ શ્રીવલ્લભલાલજીનું. નૂતન. ૧૪ શ્રીજીવનલાલજીનું. ૧૫ શ્રીનાથદ્વારનું મુદ્રિત. ઉપર જણાવેલાં ચૌદ હસ્તલિખિત અને એક મુદ્રિત પુસ્તકને આધારે આ ટિપ્પણીનું શોધન મુદ્રણ થયું છે. ૩ શ્રીકલ્યાણરાયજીની ટિપ્પણીનું મુદ્રણ તથા શોધન નીચે જણાવેલાં ૧૧ પુસ્તકોને આધારે થયું છે. ૧ પં. ગટ્ટૂલાલાજીનું. આ પુસ્તક શ્રીહરિરાયજીના નિજ શ્રીહસ્તાક્ષરનું લખેલું દિશે છે. પત્ર ૮. બહુ શુદ્ધ અને સુન્દર. ૨ પં. બલભદ્રશર્માનું, પત્ર ૪. ૩ પં. ગટ્ટૂલાલાજીનું, પત્ર ૬. ૪ શ્રીજીવનલાલજીનું, પત્ર ૨. ૫ શ્રીજીવનલાલજીનું, પત્ર ૪. પ્રાચીન. ૬ પં. ગટ્ટૂલાલાજીનું, પત્ર. ૧.

૭ સદ્ગત તનસુખરામભાઇદ્વારા પ્રાપ્ત. પત્ર ૫. ૮ પં. ગઠ્ઠૂલાલાજીનું, પત્ર ૪. પ્રાચીન. ૯ પં. ગઠ્ઠૂલાલાજીનું, પત્ર ૩. ૧૦ અસ્મદીય. ૧૧ શ્રીનાથદ્વારનું મુદ્રિત. ઉપર જણાવેલાં દશ હસ્તલિખિત અને એક મુદ્રિતના આધારે આ ટિપ્પણીનું શોધન- મુદ્રણ થયું છે. ૪ શ્રીપુરુષોત્તમજીનો પ્રકાશ નીચે જણાવેલા પુસ્તકોને આધારે શોધીને મુદ્રિત કર્યો છે. ૧ નડીઆદના વૈષ્ણવભાઈ રુકિમણીનું, પ્રાચીન શુદ્ધ. ૨ કોટાના શ્રીમન્મથુરેશજીના સંગ્રહમાંનું, ત્રુટિત. ૩ શ્રીવલ્લભલાલજીનું. આપશ્રીએ કૃપા કરીને કામવનના સંગ્રહમાંથી મોકલાવેલું. શ્રીપુરુષો- ત્તમજીના પ્રકાશની આ પ્રતિ દ્વિતીય આવૃત્તિરૂપ લાગે છે. કારણકે આમાં કૌંસમાં મુદ્રિત કરેલા ભાગો અન્ય હસ્તલિખિત પ્રતોમાં અને શ્યામજીશાસ્ત્રીની મુદ્રિત પ્રતમાં જોવામાં આવ્યા નથી. છતાં લેખન પદ્ધતિથી એ ભાગો શ્રીપુરુષોત્તમજીનાજ હોય, એમ દિશે છે. શ્રીગુસાંઈજીની માફક શ્રીપુરુષોત્તમજીએ પણ એકવાર પો- તાનો લખેલો પ્રકાશ પ્રચલિત થઈ ગયો હોય, ત્યારપછી આ ભાગ ઉમેર્યા હોય, એમ સંભવિત છે. ૪ શ્રીનાથદ્વારનું મુદ્રિત. ૫ શ્રીવલ્લભજીની ટિપ્પણી નીચે જણાવેલાં પુસ્તકોને આધારે શોધીને છાપી છે. ૧ નડીઆદની ડાહીલક્ષ્મી લાયબ્રેરીનું, આ પુસ્તક મૂલ લાગે છે. પ્રથમ આ ટીકા શ્રીવ્રજનાથજીએ લખેલી અને તે પોતાના ગુરુ શ્રીવલ્લભજી ઉપર મોકલી આપેલી, અને શ્રીવલ્લભજીએ પોતે જ્યાં લાગ્યું ત્યાં સુધારા વધારા કર્યા પછી આ ટીકા પ્રચ- લિત થઈ હોય, એમ દિશે છે. આ પ્રતિમાં થએલા સુધારા અને ઘટાડા મૂલગ્રંથ- પ્રયોજકે પોતાના શ્રીહસ્તથી કર્યા હોય, એમ દિશે છે. આ પ્રકારની આ શોધેલી આવૃત્તિ શ્રીવિઠ્ઠલેશાત્મજ શ્રીવલ્લભના નામથી સંપ્રદાયમાં પ્રસિદ્ધ થએલી છે. અને મૂલપ્રતિ જેનાઉપર આ શોધ કરવામાં આવેલો છે, તે શ્રીરઘુનાથાત્મજ શ્રીવ્રજ- નાથજીના નામથી સંપ્રદાયમાં પ્રચલિત છે. આ રીતની આ ગુરુશિષ્યની સેવાફલની બે ટીકાઓ પણ જોવામાં આવી છે. આમાં બાર પત્ર છે. ૨ શ્રીવલ્લભલાલજીનું, પત્ર ૧૦ ૩ પં. ગઠ્ઠૂલાલાજીનું, નૂતન. પત્ર ૧૧. ૪ પં. ગઠ્ઠૂલાલાજીનું, ત્રુટિત. ૫ ભગવદીય મનમોહનદાસભાઈનું, નૂતન. ૬ શ્રીનાથદ્વારનું મુદ્રિત પુસ્તક. ૬ ઉપર પ્રમાણે જણાવેલી શ્રીવ્રજનાથજીની ટિપ્પણી નીચે જણાવેલા પુસ્તકોને આધારે શોધીને છાપી છે. ૧ પં. ગઠ્ઠૂલાલાજીનું, પત્ર ૧૧. ૨ શ્રીમન્મથુરેશજીના સંગ્રહમાંનું, પત્ર ૧૫. ૩ પં. ગઠ્ઠૂલાલાજીનું. ૪ ભગવદીય મનમોહનદાસનું.

૭ લાલૂભટ્ટજીની સ્વતંત્ર ટીકાનું મુદ્રણ અને શોધન નીચે જણાવેલા પુસ્તકોને આધારે થયું છે. ૧ શ્રીવલ્લભલાલજીનું, પત્ર ૨૬. નૂતન. ૨ પં. ગટ્ટૂલાલજીનું, નૂતન. પત્ર ૧૫. ૩ શ્રીવલ્લભલાલજીનું, પત્ર ૧૮. ૪ શ્રીજીવનલાલજીનું, પત્ર ૧૮. ૫ શ્રીનાથદ્વારનું, મુદ્રિત. પત્ર ૬. ૬ પં. બલભદ્રનું, મુદ્રિત. ૮ શ્રીદ્વારકેશજીની ટિપ્પણીનું મુદ્રણ એકજ પુસ્તકને આધારે થયું છે. આ પ્રતિ શાસ્ત્રી મગ્નલાલ ગણપતિરામની છે. ૯ શ્રીહરિરાયજીનો સ્વતંત્ર. પં. ગટ્ટૂલાલાજીના સંગ્રહમાંથી પ્રાપ્ત થએલા એકજ પત્રને આધારે મુદ્રિત થએલો છે. ઉપર જણાવેલા ગોસ્વામિબાલકો શ્રીવલ્લભલાલજી, શ્રીરણછોડલાલજી, શ્રીગોકુલનાથજી અને શ્રીગોપિકાવલ્લભજી તથા પં. ગટ્ટુલાલાજીની સંસ્થા, સદ્ગત તનસુખરામભાઈ, શાસ્ત્રી મગ્નલાલ ગણપતિરામ, મુખ્યાજી ગોકુલદાસજી, શાસ્ત્રી ભદ્રશંકર, ભટ્ટ બલભદ્રશર્મા, વાડીલાલભાઈ, ભગવદીય મનમોહનદાસભાઈ, વગેરેનો અમારા ઉપર પરમ ઉપકાર આ પુસ્તકોના સંગ્રહમાં થયો છે. પં. બલભદ્રનું ઔદાર્ય અમે વારંવાર સ્મરીએ છીએ, અને અમને આશા છે, કે અન્ય વિદ્વાનો પણ એમનું પુસ્તકપ્રદાનના વિષયમાં અનુકરણ કરશે. શ્રીરણછોડલાલજીના શાસ્ત્રીઓ હરિકૃષ્ણ અને ચિમનલાલનો ઉપકાર વિસ્મરણીય નથી. કારણ કે તે લોકોએજ શ્રીરણછોડલાલજીના હસ્તલિખિત પુસ્તકો શ્રીજીવનલાલજીના સંગ્રહમાંથી લાવીને આપ્યા હતા, તેમજ શાસ્ત્રી વસંતરામે પણ ચંદ્રાવાડીના શ્રીવલ્લભલાલજીના સંગ્રહમાંથી સિદ્ધાંતમુક્તાવલીની કેટલીક ટીકાઓ લાવીને આપી હતી; તેથી તેમનો પણ ઉપકાર અમારા ઉપર થયો છે. શ્રીગોપિકાવલ્લભજીએ શ્રીગોકુલાધીશના મંદિરમાઁના સંગ્રહને આજ કાર્ય માટે અમને પરમ ઉદારતાથી જોવા દીધો હતો, તેથી તેઓશ્રીનો ઉપકાર પણ અમે માનીએ છીએ. આ સંગ્રહમાં શ્રીરઘુનાથજીકૃત ટીકાનો સમાવેશ કરી શક્યા નથી. આ ટીકાની બે પ્રતિ કાંકરોલીમાં શ્રીદ્વારકાધીશજીના મંદિર સંગ્રહમાં છે. હરીચ્છાથી એ ટીકા પ્રયત્નસાધ્ય થઈ નથી. ग्रन्थकृत्परिचय. શ્રીમત્પ્રભુચરણનો પરિચય સાંપ્રદાયિકોને કરાવવો, એ તો સૂર્યનું દર્શન દીપકથી કરાવવા જેવું છે. શ્રીગોકુલેશ, શ્રીકલ્યાણરાયજી શ્રીહરિરાયજી અને લાલૂભટ્ટ એ મહાનુભાવોનો પરિચય અમારાદ્વારા શ્રીજીવનલાલજીના આશ્રયથી પ્રસિદ્ધ થયેલા ષોડશગ્રંથોમાં કરાવેલો છે, એટલે અહીં તેની પુનરુક્તિ કરવાની આવશ્યકતા જોતા નથી. શ્રીદ્વારકેશજી છપ્પન ભોગવાલા થોડા સમય પર થઈ ગયેલા શ્રીમદ્રુજીમહારાજના પિતૃચરણ થાય. શ્રીવલ્લભજી તથા શ્રીવ્રજનાથજી એ ગુરુશિષ્ય ગોસ્વામિબાલકોનું અત્ર સ્થલ સંકોચને લઈને વિશેષ વિવેચન નહિ કરતાં જિજ્ઞાસુઓને વાસ્તે અમારા તરફથી પ્રસિદ્ધ થતા સાંપ્રદાયિક માસિક વેણુનાદમાં હવે પછી યથાવકાશ સવિસ્તર ચર્ચીશું. અહીં એટલુંજ જણાવીશું કે શ્રીવ્રજનાથજી પ્રથમ ગૃહના શ્રીગોપીનાથ દીક્ષિતજીના વંશમાં થયા છે, અને શ્રીવલ્લભજી પંચમગૃહ શ્રીરઘુનાથજીના વંશમાં થએલા છે.

उपसंहार. શેઠ રણછોડદાસ ઠાકરસી પં. ગટ્ટૂલાલાજીના સંસ્થાના એક ટ્રસ્ટી હતા. સંસ્થા પ્રતિ બહુ જ મમતા ધરાવતા હતા, એટલું જ નહિ પરંતુ સાંપ્રદાયિક કાર્યોમાં પણ સારો ભાગ લેતા હતા. અમને આશા છે કે એમના સત્પુત્ર ભગવદ્ધર્મપરાયણ શેઠ રામદાસ આ ગ્રન્થને વૈષ્ણ- વોમાં અભીષ્ટ પ્રચાર થાય તેને માટે વિના નોછાવરે યોગ્ય વૈષ્ણવોમાં વાંટી દેશે. અમારી સૂચના સ્વીકારાશે તો સંપ્રદાયને ઘણોજ લાભ થવા સંભવ છે. ઉક્ત દ્રવ્યસહાયકોનું દ્રવ્ય તેજ રીતે ખર્ચ્યું ઉગી નીકળશે, અને પરલોકવાસી શેઠ રણછોડદાસનો આત્મા પણ આ સત્કાર્યથી પ્રસન્ન થશે. ઉપસંહારમાં પ્રસ્તુત ગ્રન્થ સાંપ્રદાયિકમુદ્રણકાર્યમાં અમારી પ્રથમ પ્રવૃત્તિ કરાવનાર નિત્યલીલાસ્થ શ્રીમદ્ગોસ્વામિશ્રીજીવનલાલજીદ્વારા શ્રીમત્પ્રભુચરણકમલમાં સમર્પીએ છીએ. रासोत्सव, \quad\Bigg} \quad મૂલચન્દ્ર તેલીવાલા. संवत् १९७८. \quad\Bigg} \quad ધૈર્યલાલ સાંકલીઆ.

श्रीकृष्णाय नमः । सिद्धान्तमुक्तावली । श्रीमद्वल्लभाचार्यप्रकटिता । नत्वा हरिं प्रवक्ष्यामि स्वसिद्धान्तविनिश्चयम् । कृष्णसेवा सदा कार्या मानसी सा परा मता ॥ १ ॥ चेतस्तत्प्रवणं सेवा तत्सिद्ध्यै तनुवित्तजा । ततः संसारदुःखस्य निवृत्तिर्ब्रह्मबोधनम् ॥ २ ॥ परं ब्रह्म तु कृष्णो हि सच्चिदानन्दकं बृहत् । द्विरूपं तद्धि सर्वं स्यादेकं तस्माद्विलक्षणम् ॥ ३ ॥ अपरं तत्र पूर्वस्मिन् वादिनो बहुधा जगुः । मायिकं सगुणं कार्यं स्वतंत्रं चेति नैकधा ॥ ४ ॥ तदेवैतत्प्रकारेण भवतीति श्रुतेर्मतम् । द्विरूपं चापि गङ्गावज्ज्ञेयं सा जलरूपिणी ॥ ५ ॥ माहात्म्यसंयुता नृणां सेवतां भुक्तिमुक्तिदा । मर्यादामार्गविधिना तथा ब्रह्मापि बुध्यताम् ॥ ६ ॥ तत्रैव देवतामूर्तिर्भक्त्या या दृश्यते क्वचित् । गङ्गायां च विशेषेण प्रवाहाभेदबुद्धये ॥ ७ ॥ प्रत्यक्षा सा न सर्वेषां प्राकाम्यं स्यात्तथा जले । विहिताच्च फलात्तद्धि प्रतीत्यापि विशिष्यते ॥ ८ ॥ यथा जलं तथा सर्वं यथा शक्त्या तथा बृहत् । यथा देवी तथा कृष्णस्तत्राप्येतदिहोच्यते ॥ ९ ॥ जगत्तु त्रिविधं प्रोक्तं ब्रह्मविष्णुशिवास्ततः । देवतारूपवत्प्रोक्ता ब्रह्मणित्थं हरिर्मतः ॥ १० ॥ कामचारस्तु लोकेऽस्मिन्ब्रह्मादिभ्यो न चान्यथा । परमानन्दरूपे तु कृष्णे स्वात्मनि निश्चयः ॥ ११ ॥ अतस्तु ब्रह्मवादेन कृष्णे बुद्धिर्विधीयताम् । आत्मनि ब्रह्मरूपे हि छिद्रा व्योम्नीव चेतनाः ॥ १२ ॥

उपाधिनाशे विज्ञाने ब्रह्मात्मत्वावबोधने । गंगातीरस्थितो यद्वद्देवतां तत्र पश्यति ॥ १३ ॥ तथा कृष्णं परं ब्रह्म स्वस्मिन्ज्ञानी प्रपश्यति । संसारी यस्तु भजते स दूरस्थो यथा तथा ॥ १४ ॥ अपेक्षितजलादीनामभावात्तत्र दुःखभाक् । तस्माच्छ्रीकृष्णमार्गस्थो विमुक्तः सर्वलोकतः ॥ १५ ॥ आत्मानंदसमुद्रस्थं कृष्णमेव विचिन्तयेत् । लोकार्थी चेद्भजेत्कृष्णं क्लिष्टो भवति सर्वथा ॥ १६ ॥ क्लिष्टोऽपि चेद्भजेत्कृष्णं लोको नश्यति सर्वथा । ज्ञानाभावे पुष्टिमार्गी तिष्ठेत्पूजोत्सवादिषु ॥ १७ ॥ मर्यादास्थस्तु गंगायां श्रीभागवततत्परः । अनुग्रहः पुष्टिमार्गे नियामक इति स्थितिः ॥ १८ ॥ उभयोस्तु क्रमेणैव पूर्वोक्तैव फलिष्यति । ज्ञानाधिको भक्तिमार्गे एवं तस्मान्निरूपितः ॥ १९ ॥ भक्त्यभावे तु तीरस्थो यथा दुष्टैः स्वकर्मभिः । अन्यथाभावमापन्नस्तस्मात्स्थानाच्च नश्यति ॥ २० ॥ एवं स्वशास्त्रसर्वस्वं मया गुप्तं निरूपितम् । एतद्बुद्ध्वा विमुच्येत पुरुषः सर्वसंशयात् ॥ २१ ॥ इति श्रीमद्वल्लभाचार्यविरचिता सिद्धान्तमुक्तावली समाप्ता ।

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श्रीकृष्णाय नमः । सिद्धान्तमुक्तावली । श्रीमद्विठ्ठलेश्वरविरचितविवृतिसमेता । प्रणम्य पितृपादाब्जपरागमनुरागतः । कृपया विशदीकुर्मस्तद्वाङ्मुक्ताफलावलीम् ॥ १ ॥ नत्वा हरिं प्रवक्ष्यामि स्वसिद्धान्तविनिश्चयम् । कृष्णसेवा सदा कार्या मानसी सा परा मता ॥ १ ॥ स्वसिद्धान्तेति । अग्रे वक्ष्यमाणैर्बहुभिर्मिथो विरुद्धैः सिद्धान्तैः शास्त्रार्थसन्देहे तन्निरासाय स्वसिद्धान्तरूपं शास्त्रार्थनिश्चयं वक्ष्यामीत्यर्थः । तमेवाहुः कृष्णसेवेति । फला- त्मकनामोक्त्या स्वतः पुरुषार्थत्वेन सेवाकृतिः स्वसिद्धान्तो, न त्वन्यशेषत्वेनेति ज्ञाप्यते । सेवा हि सेवकधर्मः । तदुक्त्या जीवानामरुशेषाणां सहजदासत्वं ज्ञापितम् । अत एव न कर्मणीवात्र कालपरिच्छेदोस्तीत्याहुः सदेति । आवश्यकार्थण्यत्प्रत्ययान्तकार्यपदोक्त्या तदकरणे प्रत्यवायी भवतीति भावो ज्ञाप्यते । सा च फलरूपा साधनरूपा चास्ते । तत्र मानसी सा परा फलरूपेत्यर्थः । यथा व्रजसीमन्तिनीनाम् । तदेव तत्प्राणनाथेन गीतं ‘ता नाविदन्मय्यनुषङ्गबद्धधियः स्वमात्मानमदस्तथेद’ मित्यादिना ॥ १ ॥ श्रीमद्गोकुलनाथकृतविवृतिटिप्पणी । यद्वाञ्छयैव मोक्षान्ताः पुमर्था अधरीकृताः । स कोऽपि पितृपादाब्जरेणुर्मह्यं प्रसीदतु ॥ १ ॥ अग्रे वक्ष्यमाणैरिति । मायिकं सगुणमित्यादिभिरित्यर्थः । तत्र परस्परविरोधस्य स्पष्टत्वात् । साक्षाच्छ्रुतिनिरूपितं वक्ष्यामीति विशब्दार्थः । तस्यैव स्वकीयत्वज्ञापनाय स्वपदम् । अशेषाणामिति । आसुरव्यतिरिक्तानामशेषाणामित्यर्थः । अत एव भगवता गीतं ‘आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि । मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गति’मिति । न हि दासः कदापि प्रभुं न प्राप्नोतीति तथार्थ उक्तः । ननु मानससेवायाः सर्वात्मपरत्वे को हेतुरिति चेत्तत्राहुः फलरूपेति । फलरूपत्वमेव विवृतं यथा व्रजसी- मन्तिनीनामिति । एतत्प्रकारातिरिक्तप्रकारमानससेवायाः फलरूपत्वाभावात् तत्परत्व- मुक्तमिति भावः । सर्वात्मभावस्य मनोधर्मत्वात्तत्पूर्विकायास्तस्या मानसीत्वमुक्तमिति न काचित्क्षतिः ॥ १ ॥ १. विनिश्चितमिति पाठः । २ काले इति पाठः ।

२ सिद्धान्तमुक्तावली । एतदेव सेवास्वरूपमित्याहुः चेत इति । चेतस्तत्प्रवणं सेवा तत्सिद्धयै तनुवित्तजा । ततः संसारदुःखस्य निवृत्तिर्ब्रह्मबोधनम् ॥ २ ॥ उक्तसेवासाधने इतरे इत्याहुस्तदिति । वित्तं दत्वा अन्येन पुरुषेण कृत्वा कारि- तैका । एतादृशेन पुंसा कृता चापरा । एतादृश्यौ ते तत्साधिके नेत्यभिप्रायज्ञापकं समस्तं पदम् । एतेन भगवदर्थं निरुपधिक्सर्वस्वसंनिवेदनपूर्वकं तत्रैव स्वदेहविनियोगे प्रेम्णि जाते सा भवतीति भावः । एतादृशस्यावान्तरफलं भवतीत्याहुः तत इति । अहन्ताममतात्मकः संसारो, न तु प्रपञ्चात्मकः, तस्य ब्रह्मात्मकत्वात्, तन्निवृत्त्याऽनिष्टनिवृत्तिरुक्ता । इष्टप्राप्ति- माहुरग्रे । स्वात्मनि प्रपञ्चे चाक्षरब्रह्मात्मकत्वेन ज्ञानम् । भगवत्सेवायामभिनिविष्टस्य यद्यप्यनभिलषिते ते, तथापि वस्तुस्वभावाद्भवत इति भावः ॥ २ ॥ इदमेव परं ब्रह्मेति न ज्ञेयमित्याहुः परं ब्रह्म त्विति । परं ब्रह्म तु कृष्णो हि सच्चिदानन्दकं बृहत् । द्विरूपं तद्धि सर्वं स्यादेकं तस्माद्विलक्षणम् ॥ ३ ॥ यशोदोत्सङ्गलालितो, न त्वन्य इति ज्ञापनाय मूलनामोक्तम् । अत्र भेदकं रूपमाहुः सच्चिदिति । एते हि भगवद्धर्मात्मकाः, प्रकटतत्रितयात्मकमक्षरं ब्रह्म । अत एव प्रपञ्चस्त- दात्मक इति सच्चिदानन्दात्मकत्वं तस्मिन्नुच्यते । एतावान्परं विशेषो, जडे सदंशः प्रकटः, इतरावाच्छन्नौ; जीवे त्वाद्यौ प्रकटौ, आनन्दांशस्तिरोहितः; परमात्मनि त्रयं स्फुटमिति । कप्रत्ययेन गणितानन्दत्वमेव, न तु पुरुषोत्तमवत् पूर्णानन्दत्वमिति ज्ञाप्यते । कृष्णशब्देनैव पुरुषोत्तमस्वरूपं निरूपितमित्यक्षरस्वरूपं निरूपयन्ति द्विरूपमिति । तत् अक्षरं ब्रह्म । तदेव रूपद्वयं विशदयन्ति सर्वं स्यादिति । प्रपञ्चरूपेणाविर्भूतमेकमित्यर्थः । एकं रूपं तस्मात् प्रपञ्चरूपात् एकरूपत्वेन श्रुतिप्रतिपाद्यत्वेन ज्ञान्युपास्यत्वेन तन्मुक्तिस्थानत्वेन श्रीमद्गोकुलनाथकृतविवृतिटिप्पणी । नन्वेवमाधुनिकैस्तादृशाधिकाररहितैस्तन्मार्गप्रवर्तकाचार्योक्तप्रकारेण क्रियमाणसे- वाया अनुपयोगमाशङ्क्याहुः उक्तसेवासाधने इति । तेषां तादृशाधिकाराभावेपि तदुक्तप्रकारेण क्रियमाणत्वात्पूर्वोक्तमेव फलं सम्भवतीत्यर्थः । यथा चैतत्तथा भक्तिहंसे विस्तृतं पितृचरणैरिति नात्र विस्तरः ॥ २ ॥ सच्चिदानन्दकमित्यस्यापि पुरुषोत्तमपरत्वव्यावृत्त्यर्थमाहुः कप्रत्ययेनेति । कुत्सार्थे कप्रत्ययः । कुत्सात्र हीनता, तेनागणितानन्दात् गणितः एव स हीन एवेति स्पष्टमेवाक्षरपर- त्वमिति भावः । पूर्वपदे परब्रह्मपदप्रयोगादत्र बृहत्पदप्रयोगादप्यस्य पदस्याक्षरपरत्वमिति ज्ञायते, अन्यथा परब्रह्मबृहत्पदाभ्यां पौनरुक्त्यं स्यात्, पूर्वपदे परपदं च न स्यादित्यर्थः ।

श्रीमद्विट्ठलेश्वरविरचितविवृतिसमेता । ३ पुरुषोत्तमाधिष्ठानत्त्वादिभिर्विलक्षणमित्यर्थः । न च विरुद्धधर्मैर्भेदेऽत्र शङ्कनीयः । उभयो- धर्मयोरेकत्र प्रमाणसिद्धत्वेन विरोधाभावात् । विरुद्धधर्माश्रयत्वस्य ब्रह्मणि 'तदेजति तन्नैजती'त्यादिश्रुतिभिर्निरूप्यमाणत्वात् । लोक एव विरोधः शङ्कनीयो, नत्वलौकिके ब्रह्मणि । इदं यथा तथा ब्रह्मसूत्रभाष्ये निरूपितमिति नात्र प्रपञ्च्यते ॥ ३ ॥ विरोधपरिहाराय स्वसिद्धान्तं वक्तुं परमतान्याहुः अपरमिति । अपरं तत्र पूर्वस्मिन् वादिनो बहुधा जगुः । मायिकं सगुणं कार्यं स्वतन्त्रं चेति नैकधा ॥ ४ ॥ वेदमतादपरं भिन्नं मतं पूर्वस्मिन् प्रपञ्चरूपेणाविर्भूते । तत्र अक्षरे ब्रह्मणीत्यर्थः । मायिकमिति हि मायावादिनः । सगुणं गुणकार्यमिति साङ्ख्याः । कार्यं द्व्यणुकादि- क्रमेणेश्वरकार्यमिति नैयायिकाः । स्वतन्त्रं न कदाचिदनीदृशं जगदिति मीमांसकाः । चकारेण वेदबाह्यमतानि सङ्गृह्यन्ते ॥ ४ ॥ तानि मतानि श्रुतिबलेनैव निराकृतानि सन्तीति नात्र पार्थक्येन निराकरणीयानि, स्वमतनिरूपणेनैव निराकरणसम्भवादित्याशयेन स्वसिद्धान्तमाहुः तदेवेति । तदेवैतत्प्रकारेण भवतीति श्रुतेर्मतम् । द्विरूपं चापि गङ्गावज्ज्ञेयं सा जलरूपिणी ॥ ५ ॥ माहात्म्यसंयुता नॄणां सेवतां मुक्तिमुक्तिदा । मर्यादामार्गविधिना तथा ब्रह्मापि बुध्यताम् ॥ ६ ॥ 'स हैतावानास', 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म, तज्जलानि'त्यादिश्रुतिभ्यः तथेत्यर्थः । एक- स्यैवाक्षरस्योक्तं द्विरूपत्वं दृष्टान्तेनोपपादयन्ति द्विरूपमिति । प्रपञ्चतद्भिन्नरूपाभ्यां द्विरूपं तद्ब्रह्म गङ्गावज्ज्ञेयम् । अस्ति गङ्गायां त्रिरूपत्वम् । आधिभौतिकं जलरूपमेकम्, यदृष्ट्यातपाभ्यां वृद्धिह्रासौ भजते, सर्वव्यवहारयोग्यं च । अग्रिमा द्वितीयाध्यात्मिकी तीर्थरूपा, योद्भूतजलाविशेषेऽपि मर्यादामार्गसम्बन्धी यो विधिस्तेन तत्रैव स्नानपूजा- दिभिः फलदा । एवमेव प्रपञ्चतद्भिन्नरूपमप्येकमेव तदक्षरं ब्रह्मेति बुध्यतामित्यर्थः ॥५।६॥ श्रीमद्गोकुलनाथकृतविवृतिटिप्पणी । विरुद्धधर्मैरिति । प्रपञ्चरूपत्वाप्रपञ्चत्वरूपैरित्यर्थः । दृश्यत्वाव्यवहार्यत्त्वाद्यैरित्यर्थः । विरोधाभावादिति । ननु विरोधस्य परिदृश्यमानत्वात्कथं तदभाव इति चेत् । न । श्रुत्यैक- गम्यत्वाद्व्रह्मस्वरूपस्य । तत्र च तथैव प्रतिपादितत्वात्तादृशमेव तदिति मन्तव्यम् । अन्यथा श्रुतेरप्रामाणिकत्वापत्तेरिति भावः ॥ ३ ॥ स्वमतनिरूपणेनैवेति । श्रुतिनिरूपितत्वात्स्वमतस्येत्यर्थः । एतदेवोक्तं 'स हैतावा'- नित्यादिभिः । पूर्वमक्षरात्मकस्यैव गङ्गादृष्टान्तेन द्विरूपत्वमुपपाद्य तस्याप्यधिष्ठाता पुरुषो- त्तम एवेति ज्ञापनायाहुः अस्तीति । त्रिरूपत्वमेव विवृण्वन्ति आधिभौतिकमित्यादि ।

४ सिद्धान्तमुक्तावली । आधिदैविकं रूपमाहुः तत्रैवेति । तत्रैव देवतामूर्तिर्भक्त्या या दृश्यते क्वचित् । गङ्गायां च विशेषेण प्रवाहाभेदबुद्धये ॥ ७ ॥ प्रत्यक्षा सा न सर्वेषां प्राकाम्यं स्यात्तया जले । विहिताच्च फलात्तद्धि प्रतीत्यापि विशिष्यते ॥ ८ ॥ यथा जलं तथा सर्वं यथा शक्ता तथा बृहत् । यथा देवी तथा कृष्णस्तत्राप्येतदिहोच्यते ॥ ९ ॥ जगत्तु त्रिविधं प्रोक्तं ब्रह्मविष्णुशिवास्ततः । देवतारूपवत्प्रोक्ता ब्रह्मणीत्थं हरिर्मतः ॥ १० ॥ कामचारस्तु लोकेऽस्मिन् ब्रह्मादिभ्यो न चान्यथा । परमानन्दरूपे तु कृष्णे स्वात्मनि निश्चयः ॥ ११ ॥ अतस्तु ब्रह्मवादेन कृष्णे बुद्धिर्विधीयताम् । उक्तद्विरूपायां गङ्गायामेव देवतारूपा सा तद्भिन्नास्तीत्यर्थः । तत्र मानमाहुः मूर्तिरिति । भक्त्यैव, न तु मर्यादामार्गविधिनोपासनयेत्यर्थः । तदपि क्वचिदेव, भक्त्युद्रे- कदशायामेव । अथवा । यत्र क्वचिद्गुहादिष्वपीत्यर्थः । भक्तविशेषे विशेषमाहुः गङ्गाया- मिति । देवतारूपायां गङ्गायां भक्त्युद्रेकेण दृश्यमानप्रवाहादभिन्नत्वेन यस्य बुद्धिस्तस्मै गङ्गायां प्रवाहमध्य एव ( देवतारूपा गङ्गा ) प्रत्यक्षा भवतीत्यर्थः । एतेन प्रपञ्चमध्य एव भगवदाकारभगवद्भक्तयोर्दर्शने भगवति स्नेहातिशयेन तत्र भगवदभेदबुद्धये तत्र भगव- त्प्राकट्यं भवतीति भावः सूच्यते । अग्रिमव्यवस्थामाहुः प्राकाम्यमिति । स्वाभीष्टस्वसर्व- स्वरूपायाः स्थानभूतत्वेन ज्ञानात्तज्जले सर्वत्रानिषिद्धयथेष्टव्यवहारः स्यादित्यर्थः । एवमेवो- क्तप्रकारकभगवद्दर्शने सर्वत्र तद्भावः स्फुरतीति भावः । विहितेति । भक्त्या गङ्गादर्श- नानन्तरं प्रवाहरूपाया अपि दर्शनं विहितात्स्वर्गापवर्गरूपात्फलाद्विशिष्यते । तद्धेत्वित्यर्थः । यद्वा । येषां न प्रत्यक्षा, तेषामपि तया देवतारूपया सा तत्रास्तीति तत्सम्बन्धानुभा- श्रीमद्गोकुलनाथकृतविवृतिटिप्पणी । आध्यात्मिक्यास्तीर्थरूपत्वे प्रमाणमाहुः योद्धृतजलेति । अस्यायमाशयः । यथा प्रवाहोद्धृ- तजले गङ्गाजलत्वाविशेषज्ञानेपि तत्कृतस्नानादेर्न तदुक्तफलजनकत्वम्, एवमक्षराभिन्नत्वेन ज्ञातस्यापि प्रपञ्चस्य ध्यानादिना न मोक्षादिसिद्धिरित्यर्थः । तत्र हेतुः पुरुषोत्तमेच्छयैवे- त्याहुः मर्यादामार्गसम्बन्धीति । भक्त्यैवेति । यथा गङ्गाधिदैविकरूपं भक्त्यैकदृश्यमेव, तथा पुरुषोत्तमस्वरूपमपीति भावः । भक्तविशेष इति । मर्यादामार्गीयभक्तविशेष इत्यर्थः । तस्यैव भाव उक्तः देवतारूपायां गङ्गायामिति । भगवदभेदबुद्ध्यै भक्तायेति शेषः । यथा जलमिति । जलं दृश्यमानप्रवाहरूपम्, शक्ता पापादिनिवारणे शक्तिरस्यास्तीति शक्ता तीर्थरूपेत्यर्थः । बृहदक्षरम् । देवी आधिदैविकीत्यर्थः । कृष्णः पुरुषोत्तम इत्यर्थः । तत्रापि जगद्रूपे एतदग्रे वक्ष्यमाणमित्यर्थः । तदेवाहुर्र्जगत्त्विति । तत इत्येतस्यैवार्थ उक्तो १ तथा । देवतारूपा सेति पाठः । २. कामनेति पाठः ।