भारतकोश
षोडश ग्रन्थाः (महाप्रभु वल्लभाचार्य - पुष्टिमार्ग सिद्धान्त एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

षोडश ग्रन्थाः (महाप्रभु वल्लभाचार्य - पुष्टिमार्ग सिद्धान्त एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Shodasha Grantha of Mahaprabhu Vallabhacharya with Commentary

महाप्रभु वल्लभाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

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पृष्ठ 237

॥ श्रीकृष्णाय नमः ॥ ॥ श्रीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः ॥ ग्रन्थ-परिचय कुछ विद्वानोंकी धारणा है कि प्रारम्भमें श्रीमहाप्रभु दैवी तथा आसुरी जीवोंके भिन्न-भिन्न होनेके गीताप्रतिपादित सिद्धान्तको तो मान्य करते थे पर दैवी जीवोंके अवान्तर भेद — पुष्टिजीव और मर्यादाजीव के भिन्न-भिन्न होनेका सिद्धान्त श्रीमहाप्रभुने अपनी वयके उत्तरार्धमें स्थापित किया था. अतएव पुष्टिप्रवाहमर्यादा ग्रन्थका रचनाकाल श्रीमहाप्रभुके अडैलमें स्थिर निवासके समयके आसपास निर्धारित किया जाता है. इस विषयमें यह दृष्टव्य है कि निबन्धका शास्त्रार्थप्रकरण श्रीमहाप्रभुकी प्रथम रचना है यह तो प्रायः सर्वमान्य है. इस ग्रन्थकी कारिका ४५-५२ के अवलोकन करनेसे यह स्पष्ट हो जाता है कि निबन्धके रचनाकालमें भी पुष्टिजीव मर्यादाजीव और प्रवाहजीवों के भिन्न-भिन्न होनेकी धारणा श्रीमहाप्रभुकी दार्शनिक मान्यताओंमें स्थान ले चुकी थी. एतदर्थ कुछ शब्दप्रयोगोंपर लक्ष्य- पात अपेक्षित है. यथा : (१) तत्त्वसृष्टिप्रवृत्तानां देवानां मुक्तियोग्यता.(का.४६) (२) ब्रह्मानन्दे प्रविष्टानामात्मनैव सुखप्रमा, संघातस्य विलीनत्वाद्, भक्तानां तु विशेषतः, सर्वेन्द्रियैस्तथाचान्तःकरणैरात्मनापि हि ब्रह्मभावात्तु भक्तानां गृह एव विशिष्यते (का. ५०-५१) (३) तीर्थादावपि या मुक्तिः कदाचित् कस्यचिद् भवेत् कृष्णप्रसादयुक्तस्य नान्यस्येति विनिश्चयः(का. ४७)