षोडश ग्रन्थाः (महाप्रभु वल्लभाचार्य - पुष्टिमार्ग सिद्धान्त एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Shodasha Grantha of Mahaprabhu Vallabhacharya with Commentary
महाप्रभु वल्लभाचार्य द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयहां स्पष्टतया मुक्तियोग्य जीवोंमें से किसीको ब्रह्मानन्द और किसीको भजनानन्द मिलता है यह निश्चित हुआ है. मर्यादाविधिके अनुसार तीर्थ आदिद्वारा जिन्हें मुक्ति मिलती है वह भी कृष्णकी मुक्तिदानकी इच्छापर अवलम्बित है यह भी कहा गया है. इन कारिकाओंपर लिखे गये प्रकाशके अध्ययन करनेपर भी मर्यादाजीव और पुष्टिजीवों के प्रभेदकी धारणा स्फुट हो जाती है. यथा- "ये सात्त्विका दैव्यां सम्पदि जाता विध्युपजीविनः सर्वदा तेषां मुक्तिर्भविष्यति" (प्रका. ४६) तथा "स्वतन्त्रभक्तानां तु गोपिकादितुल्यानां सर्वेन्द्रियैस्तथान्तःकरणैः स्वरूपेण चानन्दानुभवः अतो भक्तानां जीवन्मुक्त्यपेक्षया भगवत्कृपासहितगृहाश्रम एव विशिष्यते" (प्रका. ५०-५१). इन उद्धरणोंसे यह सिद्ध हो जाता है कि दैवीजीव तथा आसुरीजीव का भेद और इसी तरह विध्युपजीवी मर्यादाजीव तथा स्वतन्त्र पुष्टिजीव का अवान्तर प्रभेद भी श्रीमहाप्रभुको निबंधमें भी विवक्षित है ही. ऐसी स्थितिमें इस पूर्वोक्त आधारपर ग्रन्थका रचनाकाल निर्णीत कर पाना कठिन है. यह ग्रन्थ किस अवसरपर तथा किस अनुयायीके लिए लिखा गया था यह पता नहीं चलता. इसके अलावा यह ग्रन्थ पूर्णतया उपलब्ध नहीं होता है. यह ग्रंथके प्रारम्भमें की गयी प्रतिज्ञासे स्पष्ट हो जाता है. विभिन्न व्याख्याकार भी इस वातका उल्लेख करते हैं. सर्गभेद-कारणभेद, फलभेद, मार्ग या साधनभेद तथा जीवोंके स्वरूपा- दिभेद के आधारपर पुष्टिमार्ग मर्यादामार्ग तथा प्रवाहमार्ग परस्पर भिन्न-भिन्न हैं. यह श्रीमहाप्रभु इस ग्रन्थके द्वारा हमें समझाना चाहते हैं. उपलब्ध ग्रन्थके पूर्ण न होनेके कारण यह कह पाना अब कठिन हैं कि इदमित्थतया श्रीमहा- प्रभुने किस प्रकारसे पूर्वोक्त मार्गोंका पृथक्करण विश्लेषण एवम् वर्गीकरण किया था. उपलब्ध अंशके अध्ययनसे तीन तरहकी सम्भावनायें प्रकट होती है. यह सब समानन्यायकी सामान्य युक्तिपर की गयी सम्भावनायें है, जिनका तुलनात्मक प्रामाण्य अन्य ग्रन्थोंमें श्रीमहाप्रभुके द्वारा इस विषयके बारेमें किये गये विधानोंके साथ संवादपर अवलम्बित है.