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षोडश ग्रन्थाः (महाप्रभु वल्लभाचार्य - पुष्टिमार्ग सिद्धान्त एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

षोडश ग्रन्थाः (महाप्रभु वल्लभाचार्य - पुष्टिमार्ग सिद्धान्त एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Shodasha Grantha of Mahaprabhu Vallabhacharya with Commentary

महाप्रभु वल्लभाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 240, कुल 408 में से

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पृष्ठ 240

इनमें श्रीमहाप्रभुको अभिप्रेत वर्गीकरण कौन सा है यह केवल पुष्टिप्रवाहमर्यादा ग्रन्थके आधारपर निर्विवाद निर्णीत नहीं हो पाता. जीवोंके उपर्युक्त वर्गीकरणके अलावा मार्गभेद सर्गभेद एवम् फलभेद के आधारपर अन्य विशेषताओंका भी निरूपण यहां श्रीमहाप्रभुको अभिप्रेत है. १) मार्गभेद पुष्टिमार्ग मर्यादामार्ग तथा प्रवाहमार्ग इन तीनों मार्गोंकी कुछ अपनी- अपनी विशेषतायें हैं. तदनुसार ये तीनों मार्ग परस्पर भिन्न-भिन्न हैं. तत्तत् मार्गोंमें जीवोंके स्वरूप, उनके देह, उनकी रुचि, उनके व्यवहार तथा अन्तमें उन्हें मिलनेवाले फलके तारतम्यको दृष्टिगत करनेपर मार्गभेदको भलीभांति समझा जा सकता है. यह मार्गभेदकी धारणा शास्त्रीय प्रमाणोंपर अवलम्बित है. शास्त्रके अनु- सार सारे लौकिक कर्मोंका उत्स कर्मकर्ता जीवके प्राकृत स्वभावमें तथा लौकिक प्रयोजनोंकी पूर्तिके प्रयासमें निहित रहता है. वैदिक कर्मोंका अनुष्ठान स्वभावसे प्राप्त नहीं होता. किन्तु शास्त्रीय आज्ञाओंके अनुसरण करनेकी मनोवृत्तिसे प्राप्त होता है. फिर भी शास्त्रीय आज्ञायें स्त्री-पुरुष बालक-वृद्ध या ब्राह्मण-शूद्र आदिके देह और उनसे सम्बन्धित विविध अभिमानों को लक्ष्यमें रख दी गयी हैं. अतएव "त्रैगुण्यविषयाः वेदाः" कहा जाता है. इन लौकिक तथा वैदिक कर्मोंसे ऊपर उठनेकी ज्ञानमार्गमें जैसी सन्यासकी एक शास्त्रीय प्रक्रिया है, वैसी ही निर्गुण भक्तिमार्गीय सर्वसमर्पणकी भी एक शास्त्रवर्णित प्रक्रिया है. इसी अलौकिक निर्गुणा भक्तिके प्रकारको 'पुष्टिमार्ग' कहा जाता है. गीतामें दैवी सृष्टिसे भिन्न एक आसुरी सृष्टि दिखलायी गयी है वह प्रवाहमार्ग है. वेदोंमें वैदिक धर्मकी विभिन्न मर्यादाओं के निरूपण मिलते ही हैं और वह मर्यादामार्ग है. इससे सिद्ध होता है कि जैसे प्रवाहमार्ग और मर्यादामार्ग परस्पर भिन्न हैं, वैसे ही इन दोनोंसे पुष्टिमार्ग भी एक भिन्न मार्ग ही है. सभी जीव अतः पुष्टि मार्गीय नहीं माने जा सकते हैं. लौकिक या वैदिक सभी तरहकी कामनाओं और प्रयोजनों से ऊपर उठकर जो जीवत्मा केवल भगवान्‌की ही भक्तिमें परायण हो जाती हैं उन्हें प्रवाहमार्गीय या मर्यादामार्गीय नहीं गिना जा सकता