षोडश ग्रन्थाः (महाप्रभु वल्लभाचार्य - पुष्टिमार्ग सिद्धान्त एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Shodasha Grantha of Mahaprabhu Vallabhacharya with Commentary
महाप्रभु वल्लभाचार्य द्वारा
पृष्ठ 241, कुल 408 में से
संदर्भ में पढ़ेंहै. “आत्मभावित भगवान् जिस जीवपर अनुग्रह करते हैं वही जीव लोक- वेदोंमें अपनी परिनिष्ठत बुद्धिसे छुटकारा पा सकता है” (भागवत) तथा “वेद- तप-दान-याग आदि किसी भी साधनसे मेरा दर्शन इस तरह कर पाना शक्य नहीं है, जैसा तुमने पाया है. अर्जुन ! यह तो केवल अनन्य भक्तिके कारण ही मुझे इस तरह जाना जा सकता है, तत्त्वतः देखा जा सकता है और अन्त में मुझमें प्रवेश भी पाया जा सकता है” (गीता) इन दो वचनोंसे क्रमशः विशेष अनुग्रह और तज्जन्य भक्तिका सुस्पष्ट निरूपण हमें मिलता है. इस तरह अन्यत्र भी ऐसी उत्कृष्ट भक्तिके निरूपणके बलपर उसके कारणभूत अनुग्रह या पुष्टिमार्ग का अनुमान किया जा सकता है. यहां यह शंका उठ सकती है कि मार्ग भिन्न-भिन्न नहीं मानने चाहिये किन्तु इनमें उत्तरोत्तर उत्कृष्ट होनेके सोपानोंका सा सम्बन्ध मानना चाहिये प्रवाहके सोपानसे उत्कृष्ट मर्यादाका सोपान है तथा सर्वोत्कृष्ट सोपान निर्गुणावस्थाका है. यह शंका उचित नहीं है. क्योंकि श्रौत युक्ति तथा ब्रह्मसूत्र दोनोंसे उक्त धारणा विपरीत है. जैसे आसुरी जीव तथा दैवी जीवों का नित्यभेद श्रुतिसिद्ध है. उनके देह तथा कर्मों की भिन्नता भी श्रुतियोंमें वर्णित है. इसी तरहसे दैवी जीवोंके अन्तर्गत पुष्टिजीव और मर्यादाजीवों के स्वरूप देह तथा कर्मों में भी परस्पर भिन्नता स्वीकारनी चाहिये. अतः पुष्टिमार्ग मर्यादामार्ग तथा प्रवाहमार्ग का भेद प्रमाणसिद्ध ही है. २) सर्गभेद पुष्टिमार्ग मर्यादामार्ग तथा प्रवाहमार्ग के प्रमाणसिद्ध भेदके विचारके बाद अब इन मार्गोंकी सृजनप्रक्रियाके भेदको भी समझ लेना चाहिये. भगवान् स्वयम्के मनके द्वारा प्रवाहमार्गका सृजन प्रवर्तन तथा नियमन करते हैं. अतः प्रवाहमार्गीय जीवोंके विशिष्ट स्वरूप देह तथा व्यवहार की नियति केवल ब्रह्मकी इच्छापर ही निर्भर है. वैदिक मर्यादामार्गीय जीवोंके विशिष्ट स्वरूप देह तथा व्यवहार का भगवान् वेदरूपा वाणीके द्वारा सृजन प्रवर्तन तथा नियमन करते हैं. पुष्टिमार्गीय जीवोंके विशिष्ट स्वरूप देह तथा व्यवहार का सृजन प्रवर्तन तथा नियमन श्रीकृष्ण अपने प्रकट आधिदैविक स्वरूपके द्वारा करते हैं.