षोडश ग्रन्थाः (महाप्रभु वल्लभाचार्य - पुष्टिमार्ग सिद्धान्त एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Shodasha Grantha of Mahaprabhu Vallabhacharya with Commentary
महाप्रभु वल्लभाचार्य द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइस तरह इन मार्गोंमें सर्गभेद अथवा सृजनकी प्रक्रियामें भी भेद है. ३) फलभेद प्रवाहमार्गीय जीवोंकी कामना एवम् आचरण के अनुकूल या प्रतिकूल फल प्रभु स्वयम् अपनी इच्छानुसार निर्धारित करते हैं तथा उन्हें प्रदान करते हैं. मर्यादामार्गीय जीवोंके वेदविहित धर्मार्थकामरूप पुरुषार्थोंके अनुष्ठानका फल वेदादि शास्त्रोंमें निरूपित विविध मोक्षोंके रूपमें प्रभु देते हैं. पुष्टिमार्गीय जीवोंके भजनानन्द-सम्बन्धी मनोरथोंकी पूर्ति श्रीकृष्ण अपने आधिदैविक स्वरूपके द्वारा करते हैं. "में उन आसुरी जीवोंको निरन्तर अशुभ योनिमें डालता रहता हूं" (गीता). इस वचनके आधारपर निरन्तर अशुभ भवप्रवाहमें बहनेवाले प्रवाही जीवोंसे मर्यादायार्गीय जीव तथा पुष्टिमार्गीय जीवों के फलको भिन्न मानना पड़ता हे. क्योंकि इन्हें भवप्रवाहमे छुड़ाया जाता है तथा मोक्ष प्रदान किया जाता है. (क-१) पुष्टिमार्ग इस तरह मार्गभेद सर्गभेद एवम् फलभेद के आधारपर पुष्टिमार्गीय जीवोंको अन्य जीवोंसे भिन्न मानना ही चाहिये. यह पुष्टिसृष्टि भगवान्के आधिदैविक स्वरूपकी सेवाके लिए ही प्रकट की गयी हैं. अतः भगवत्सेवाके अतिरिक्त अन्यत्र किसी कर्म या प्रयोजन में पुष्टिसृष्टिके जीवोंका तत्पर होना भगवानको अभिप्रेत नहीं है. बाह्य दृष्टिसे पुष्टिमार्गीय जीवोंके स्वरूप देह स्वभाव एवम् व्यवहार तो सभी जीवोंके समान ही प्रतीत होते हैं. परंतु अन्ततः आधिदैविक स्वरूपके भजनानन्दमें ही इन पुष्टिजीवोंको आकर्षण और संतोष का अनुभव होगा. क्योंकि इनसे यही काम प्रभु लेना चाहते हैं. (क-२) पुष्टिसर्ग इस पुष्टिसृष्टि के पुनः दो अवान्तर भेद होते है: १) शुद्ध पुष्टिसृष्टि २) मिश्र पुष्टिसृष्टि