षोडश ग्रन्थाः (महाप्रभु वल्लभाचार्य - पुष्टिमार्ग सिद्धान्त एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Shodasha Grantha of Mahaprabhu Vallabhacharya with Commentary
महाप्रभु वल्लभाचार्य द्वारा
पृष्ठ 243, कुल 408 में से
संदर्भ में पढ़ेंमिश्र पुष्टिसृष्टिके तीन अवान्तर भेद होते हैं. यथा : १) पुष्टि-पुष्टिसृष्टि २) मर्यादा-पुष्टिसृष्टि ३.) प्रवाह-पुष्टिसृष्टि १) पुष्टि-पुष्टिसृष्टिके जीव सर्वविध माहात्म्यज्ञानयुक्त तथा सुदृढ़ सर्वतोधिक स्नेहपूर्वक कृष्णसेवामें परायण होते हैं. २) मर्यादा-पुष्टिसृष्टिके जीव भगवान् श्रीकृष्णकी लीलाकथाओंके द्वारा भगवान्के गुणोंके प्रेमपूर्वक चिन्तन (श्रवण-स्मरण-कीर्तन) में परायण हो जाते हैं. ३) प्रवाह-पुष्टिसृष्टिके जीवोंमें न तो भलीभांति माहात्म्यज्ञान ही होता है और न उत्कट स्नेह ही. फिर भी कृष्णभजनके क्रियात्मक बाह्यरूपमें इनकी रुचि एवम् तत्परता होती है. मिश्र पुष्टिसृष्टिके इन तीनों प्रकारोंसे विलक्षण शुद्ध पुष्टिसृष्टिके जीव होते हैं. इन्हें भगवान्के प्रति स्नेह किसी प्रमाणबलके आधारपर नही होता किन्तु भगवान् इनके समक्ष स्वयम् प्रकट होकर अपने आधिदैविक स्वरूपके प्रमेयबलसे इन्हें अपनी ओर आकृष्ट कर लेते हैं. इनका भगवान्के प्रति स्नेह उत्कृष्ट सहज एवम् शुद्ध अर्थात् अन्य किसीभी भाव या प्रयोजन से अभि- श्रित रहता है. यह अतिदुर्लभ प्रकारकी पुष्टिसृष्टि है. (क-३) पुष्टिफल पुष्टिमार्गीय जीवोंका साधन जैसे भगवान्की पुष्टि या अनुग्रह है वैसे ही फल एकमात्र स्वयम् भगवान ही हैं. तत्तद् भक्तोंके लिए गुण और स्वरूप के भेदोंके अनुसार जैसे-जैसे रूप धारण कर भगवान् प्रकट होते हैं, उन-उन निजी भगवद्-रूपोंके साथ पुष्टि- सृष्टिके विभिन्न जीवोंकी फलानुभूति सम्पन्न होती है. इन निजी भगवद्- रूपोंसे अतिरिक्त अन्यत्र कहीं भी पुष्टिमार्गीय जीवकी आसक्ति जब भगवान् देखते हैं तो शाप भी दिलवाते हैं. कभी-कभी इन्हें साहंकार देखकर भी भगवान् शाप दिलवाते हैं. और तब ये पुष्टिजीव भूतलपर प्रकट होते हैं. कभी-कभी भूतलपर पुष्टिमार्गको प्रकट करनेके लिए भी पुष्टिजीवोंको भूतल- पर प्रकट किया जाता है, लोकमें आनेपर भी ये दैहिक रोगादिके उपद्रव