भारतकोश
षोडश ग्रन्थाः (महाप्रभु वल्लभाचार्य - पुष्टिमार्ग सिद्धान्त एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

षोडश ग्रन्थाः (महाप्रभु वल्लभाचार्य - पुष्टिमार्ग सिद्धान्त एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Shodasha Grantha of Mahaprabhu Vallabhacharya with Commentary

महाप्रभु वल्लभाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 244, कुल 408 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 244

अथवा मानसिक पाषण्डता आदिके उपद्रवसे ग्रस्त नहीं हो जाते. इन महानु- भावोंका भूतलपर प्राकट्य, चाहे शापवश भी क्यों न हो, होता है प्रायः शुद्धताके लिए ही. भगवान् इन जीवोंके लिए अपने स्वरूप तथा अपनी लीला में जैसा तारतम्य प्रकट करते हैं तदनुसार इन भक्तोंमें भी तारतम्य घटित हो जाता है. लौकिक व्यवहारका निर्वाह तथा वैदिक कर्तव्योंका पालन ये महानुभाव लोकमें बुद्धिभेद न पैदा हो जाये. एतदर्थ अर्थात् लोकसंग्रहार्थ ही करते हैं. इनकी सहज तथा उत्कट रूचि तो अपनी वैष्णवताके निर्वाहमें ही ही होती है—लौकिकता या वैदिकता के निर्वाहमें नहीं. इस तरह पुष्टिजीवोंके मार्ग सर्ग एवम् फल का निरूपण सम्पूर्ण हुआ. कभी-कभी इन पुष्टिमार्गीय जीवोंके साथ सदा-सर्वदा भटकते रहनेवाले चर्षणी जीव भी सम्मिलित हो जाते हैं. अतः उनके स्वरूपका भी थोडा-बहुत निरूपण यहां अप्रसंगोपात्त न होगा. चर्षणी जीव दैवी जीवोंके संगके कारण कुछ अदैवी जीवोंमें भी कभी-कभी तात्कालिक रूपमें दैवी लक्षण दिखलायी देने लगते है. पर ये लक्षण उन जीवोंमें चिरस्थायी नहीं होते. ऐसे जीवोंको 'चर्षणी जीव' कहा जाता है. चर्षणी प्रतिदिन नये-नये मार्गोंपर भटकते रहते हैं—नये नये रंग बदलते रहते है. इनका अपना कोई स्थायी रंग अथवा स्वभाव नहीं होता. जिनके साथ सम्मिलित हो जाते है, उतने समयके लिए उनके गुण-धर्मोंको अपना लेते हैं. अपने नित्यनूतन बदलते हुए रंगोंमें कुछ न कुछ तात्कालिक फल अथवा अनुभूतियां इन्हें होती रहती हैं. दैवी जीवोंका संग पाकर दैवी शील प्रकट करते हैं तथा आसुरी जीवोंका संग पाकर ये आसुरी शील प्रकट करते हैं. स्थिर ये कहीं भी नहीं हो पाते. (ख—१) प्रवाहमार्ग प्रवाहमार्गीय जीवोंके स्वरूप देह एवम् व्यवहार का अब निरूपण किया जाता हैं. सभी आसुरी सृष्टिके जीवोंको प्रवाहमार्गीय समझना चाहिये. गीतामें इनका निरूपण—"इन्हें न उचित प्रवृत्तिका और न उचित निवृत्तिका ही बोध होता है." कहकर किया गया हैं. प्रवाही जीवोंके दो अवान्तर भेद होते हैं.