षोडश ग्रन्थाः (महाप्रभु वल्लभाचार्य - पुष्टिमार्ग सिद्धान्त एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Shodasha Grantha of Mahaprabhu Vallabhacharya with Commentary
महाप्रभु वल्लभाचार्य द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयथा : १) अज्ञ प्रवाही जीव २) दुर्ज्ञ प्रवाही जीव १) आसुरी सृष्टिके जिन जीवोंका वर्णन भगवान्ने गीतामें किया हैं उन्हें दुर्ज्ञ प्रवाही जीव समझना चाहिये. २) इन दुर्ज्ञ प्रवाही जीवोंके संगवशात् प्रवाही स्वभाव या लक्षण प्रकट करनेवाले जीवोंको 'अज्ञ प्रवाही जीव' कहा जाता है. पुष्टि जीव जैसे प्रवाहमार्गीय कुलमें जन्मग्रहण करनेपर भी प्रवाह- मार्गीय वातावरणमें अपना तालमेल नहीं बैठा पाता, ठीक उसी तरह प्रवाह- मार्गीय जीव पुष्टिमार्गीय कुलमें भी जन्मग्रहण करले परन्तु पष्टिमार्गीय वातावरणके साथ वह अपना तालमेल नहीं बैठा पायेगा... (यहांसे ग्रन्थ त्रुटित हो जाता हैं.) ग्रन्थके प्रारूपके अनुसार अधोलिखित विषयोंपर प्रकाश अपेक्षित हैं: (ख--१) प्रवाहमार्गीय जीवोंके देह एवम् व्यवहार का निरूपण. (ख--२) प्रवाहसर्ग (ख--३) प्रवाहफल (ग--१) मर्यादामार्ग (ग--२) मर्यादासर्ग (ग--३) मर्यादाफल (घ) तथा उपसंहार प्रस्तुत संस्करण वि. सं. १९८१ में प्रकाशित संस्करणका ऑफसेट प्रॉसेस द्वारा पुनर्मुद्रित रूप है. उस संस्करण के सम्पादक तथा प्रकाशक श्रीमूल- चंद्र तुलसीदास तेलीवाला तथा श्रीधीरजलाल व्रजदास सांकलिया महानुभा- वोंका हम इस पुनर्मुद्रणावसरपर कृतज्ञताके साथ स्मरण करते हैं. इतिशम्.