भारतकोश
षोडश ग्रन्थाः (महाप्रभु वल्लभाचार्य - पुष्टिमार्ग सिद्धान्त एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

षोडश ग्रन्थाः (महाप्रभु वल्लभाचार्य - पुष्टिमार्ग सिद्धान्त एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Shodasha Grantha of Mahaprabhu Vallabhacharya with Commentary

महाप्रभु वल्लभाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 319, कुल 408 में से

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पृष्ठ 319

॥ श्रीकृष्णाय नमः ॥ ॥ श्रीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः ॥ ग्रन्थ-परिचय एक किंवदन्तीके अनुसार सिद्धान्तरहस्यका प्रणयन श्रीमहाप्रभुने वि. सं. १५४९ में किया था. श्रीमहाप्रभुके चरित्रग्रन्थों तथा इस ग्रंथ के अन्तः- साक्ष्यके आधारपर यह निश्चित है कि इसकी रचना गोकुलमें श्रावण शुक्ल एकादशीको अर्धरात्रीमें हुई थी. श्रीयदुनाथजी विरचित वल्लभदिग्विजयके मध्यमयात्रा परिच्छेदमें यह घटना यों वर्णित है—"श्रीमहाप्रभु मथुरासे गोकुल पधारे. वहां श्रावण शुक्ला एकादशीका व्रत एवम् जागरण किया. मध्यरात्रीमें भगवान्‌ने प्रकट होकर दर्शन दिये. तत्र श्रीमहाप्रभुने पवित्रा धराकर मिश्रीका भोग धरा. पश्चात् श्रीगोकुलनाथने श्रीमहाप्रभुको आश्वस्त किया की उन्हें दैवी जीवोंके उद्धारकी चिन्ता नहीं करनी चाहिये. दैवी जीवोंके उद्धारार्थ प्रस्तुत ग्रन्थमें वर्णित भावनाके साथ गद्यमन्त्रका दान ( मदुक्तभावनासहितं गद्यम् ) श्रीमहाप्रभुको दिया गया. अन्योंको भी इस भावनाके उपदेशके साथ गद्यमन्त्रके द्वारा दीक्षित करनेका आदेश दिया गया. श्रीमहाप्रभुको वचन दिया गया कि जिसे यह सर्वस्वसमर्पणपूर्वक आत्मनिवेदनकी दीक्षा दी जायेगी उसकी अहन्ता- ममता के सेवामें विनियोग द्वारा उसे भगवल्लीलाकी अनुभूतिका सामर्थ्य प्रदान किया जायेगा. प्रातः श्रीमहाप्रभुने यह दीक्षा दामोदरदास तथा कृष्णदास को दी.” ८४ वैष्णवनकी वार्ताके अनुसार भगवदाज्ञाके बाद श्रीमहाप्रभुने समीप में सोये हुए दामोदरदास हरसानीको पूछा— “दमला ! ते कछु सुन्यो ? तब दामोदरदासने कह्यो जो महाराज ! मैंने श्रीठाकुरजीके वचन सुने तो सही समुझ्यो नाहीं.” सुना तो बृहदारण्यकोपनिषद्‌में भी सभीने था—समर्पणका सिद्धान्त, “अयमात्मा सर्वेषां भूतानामधिपतिः सर्वेषां भूतानां राजा. तद्यथा रथनाभौ रथनेमौ चाराः समर्पिताः एवमेवास्मिन्नात्मनि सर्वे प्राणाः सर्वे लोकाः सर्वे देवाः १ वैष्णववाणी (अंक ४ वर्ष १९७९) में श्रीनागरदास बांभणिया शास्त्री द्वारा लिखित लेख.