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षोडश ग्रन्थाः (महाप्रभु वल्लभाचार्य - पुष्टिमार्ग सिद्धान्त एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

षोडश ग्रन्थाः (महाप्रभु वल्लभाचार्य - पुष्टिमार्ग सिद्धान्त एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Shodasha Grantha of Mahaprabhu Vallabhacharya with Commentary

महाप्रभु वल्लभाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

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पृष्ठ 320

सर्वाणि भूतानि सर्व एवात्मानः समर्पिताः”. पर समझमें कहां आता है ! सभी कुछ जिस परमात्मामें समर्पित है उस परमात्माके प्रति मन-वाणी-देह- से सर्वसमर्पणकी स्वीकृति सबको समझमें नहीं आती. अतएव कह तो भगवा- न्‌ने गीतामें भी दिया है कि “मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु, मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोसि मे” पर भगवान्‌की इस प्रतिज्ञाका तथा प्रेमाश्वासनका तात्पर्य कहां समझमें आता है ? सुनी तो भागवतमें भी हमने भगवद्वाणी है कि “ये दारागारपुत्राप्तान् प्राणान् वित्तमिमं परं हित्वा मां शरणं याताः कथं तांस्त्यक्तुमुत्सहे” पर वह कहां समझमें आती है ! स्वयम् इस सिद्धान्तरहस्यमें साक्षाद् भगवदुक्त भावनासहित गद्यमन्त्रमेंसे जब श्रीमहाप्रभुने अक्षरशः भगवदुक्त भावना दोहरा दी फिर भी वह सुनने के बाद भी समझमें नहीं आती! कई विद्वानोंको सन्देह होता है कि गद्यमन्त्र साक्षाद् भगवदुक्त है या श्रीमहाप्रभूक्त है या श्रीप्रभुचरणोक्त हे या श्रीगोकुलनाथजीने इसे परवर्ती कालमें जोड़ दिया है! तर्क वितर्क उठते रहते हैं कि “साक्षाद् भगवता प्रोक्तं तदक्षरश उच्यते” कहने के बाद जब गद्यमन्त्र नहीं कहा गया तो अवश्य ही वह परवर्ती कालमें श्रीप्रभुचरणके चतुर्थात्मज श्रीगोकुलनाथजीने जोड़ दिया होगा ! परन्तु इस अक्षरशः निरूपणमें तो पञ्चाक्षरमन्त्र भी नहीं दोहराया गया हैं, तो केवल गद्यमन्त्र ही क्यों—पञ्चा- क्षर मन्त्रको भी प्रक्षिप्त क्यों न मान लिया जाये. जबकि श्रीगोकुलनाथजीसे पूर्ववर्ती श्रीकृष्णदास अधिकारी —“श्रीगोपालमन्त्र अष्टाक्षर पञ्चाक्षर के श्रवन कराये, गद्यमन्त्र सब जीवनिको दे कृष्णचरण सबके चित लाये.” तथा “कृष्ण श्रीकृष्ण मनमाहि गति जानिये, देह इन्द्रिय प्राण दारागारादिवित्त आत्मा सकल श्रीकृष्णकी मानिये. कृष्ण मम स्वामी हों दास मनवचकरम कृष्ण कर्ता येही सदा जिय आनिये. कृष्णदास निनाथ हरिदासवर्यधरचरणरज वल्लभाधीश मन सानिये.” कहते हैं. इसे सुनते और निरन्तर गाते रहनेपर भी आज यह समझमें नहीं आता ! कतिपय विद्वानोंके अनुसार अतएव यह गद्यमन्त्र श्रीगोकुलनाथजी द्वारा नहीं किन्तु श्रीप्रभुचरण द्वारा पञ्चाक्षरके साथ जोडा गया माना जाता है. जबकि उनके ज्येष्ठभ्राता श्रीगोपीनाथजी स्वरचित साधनदीपिकामें—“नाय- मात्मा प्रवचनैः न धिया बहुना श्रुतैः, लभ्यते वरणं हित्वा वृतं संवृणुते श्रुतेः, स्मृत्वा