भारतकोश
षोडश ग्रन्थाः (महाप्रभु वल्लभाचार्य - पुष्टिमार्ग सिद्धान्त एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

षोडश ग्रन्थाः (महाप्रभु वल्लभाचार्य - पुष्टिमार्ग सिद्धान्त एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Shodasha Grantha of Mahaprabhu Vallabhacharya with Commentary

महाप्रभु वल्लभाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

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पृष्ठ 321

स्वीयवियोगाग्निं तापदाहो भवाम्बुधौ, ततः सर्वं समर्प्यैव श्रीगोपालमनुं श्रयेत इष्टं दत्तं तपो जप्तं वृत्तं यच्चात्मनः प्रियं दारान् सुतान् गृहान् प्राणान् यत्परस्मै निवेदनम्' कहते हैं तो स्पष्ट हो जाता है किं गद्यमन्त्र प्रभुचरणसे पूर्व ही दीक्षाविधिमें समाविष्ट हो गया था. किन्तु "महाराज! सुन्यो पर समुझ्यो नाही! " निवेदन समर्पण एवम् विनियोग उत्तरोत्तर एक-दूसरेके रहस्य या तात्पर्य- रूप हैं. पञ्चाक्षरमन्त्रके द्वारा जो आत्मनिवेदन किया जाता है, गद्यमंत्रमें उन्हीं 'आत्मा' तथा 'निवेदन' का रहस्य आत्मीय सकल पदार्थोंके समर्पणके रूपमें समझाया गया है. गद्यमन्त्रमें जिस आत्मा एवम् आत्मीय सकल पदार्थोंका समर्पण किया जाता है, उसका रहस्य अपने स्वामी श्रीकृष्णकी तनुवित्तजा सेवामें स्वयम् अपने तथा अपनेसे सम्बन्धित सभी पदार्थों के विनियोगमें निहित है. अन्यथा समर्पण पूर्णतया चरितार्थ हो नहीं पाता. समर्पितका विनियोग भी अतः आवश्यक है. श्रीमहाप्रभुको आत्मनिवेदनकी भावनाके रूपमें यही प्रभुने प्रकट होकर समझाया था-“असमर्पितवस्तूनां तस्माद् बर्जनमाचरेत् निवेदिभिः समर्प्यैव सर्वं कुर्यादिति स्थितिः". आत्मनिवेदीको असमर्पित वस्तुका त्याग करना चाहिये. अपने सारे कामकाज समर्पणपूर्वक ही चलाने चाहिये. यही ब्रह्मसम्बन्ध या आत्मनिवेदन की मूलभावना है. "निवेदनके समय अपनेसे सम्बन्धित सभी वस्तुओंका प्रभुसे-ब्रह्मसे सम्बन्ध हो जाता है... जिन्होंने अपने प्राणोंको कृष्णसात् कर लिया है उन्हें किस बातकी चिन्ता हो सकती है?" नवरत्नके इस वचनकी तथा सिद्धान्तरहस्यके "ब्रह्मसम्बन्ध करनेसे सभीके देह तथा जीव के सभी तरहके दोष निवृत्त हो जाते हैं" इस वचनकी परस्पर संगति बैठानेपर पञ्चाक्षरमन्त्रद्वारा आत्मनिवेदन तथा गद्यमन्त्रद्वारा वियोगाग्निके स्मरणपूर्वक आत्मीय सकल पदार्थोंके समर्पणको ही मिलाकर 'ब्रह्मसम्बन्ध' कहा जाता है. यही सिद्धान्तका रहस्य हमें सिद्धान्तरहस्य ग्रन्थमें सुनायी पड़ता है. यही रहस्य श्रावण शुक्ला एकादशीकी महानिशामें साक्षात् भगवान्ने प्रकट होकर श्रीमहाप्रभुको सुनाया था. उस पञ्चाक्षर तथा गद्यमन्त्र के अंशको गोप्य होनेके कारण छोड़कर समर्पणके सिद्धान्तके इस भगवदुक्त रहस्यको यहां अक्षरशः श्रीमहाप्रभुने दोहरा दिया हे. जो बात भगवान्ने गद्यमन्त्रकी