भारतकोश
षोडश ग्रन्थाः (महाप्रभु वल्लभाचार्य - पुष्टिमार्ग सिद्धान्त एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

षोडश ग्रन्थाः (महाप्रभु वल्लभाचार्य - पुष्टिमार्ग सिद्धान्त एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Shodasha Grantha of Mahaprabhu Vallabhacharya with Commentary

महाप्रभु वल्लभाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 322, कुल 408 में से

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पृष्ठ 322

भावनाके रूपमें कही थी उसीका यहां अक्षरशः निरूपण है पञ्चाक्षर या गद्य मन्त्रका नहीं. जीव तो अनेक प्रकारके दोषोंसे भरे हुए हैं. उदाहरणतया (१) अविद्याके साथ सम्बन्ध, तत्कृत अहन्ता-ममताकी भ्रान्ति, तत्कृत प्राणधारणके प्रयत्न जैसे दोष आत्माके साथ लगे रहते हैं. सूक्ष्म शरीरमें काम-क्रोध-लोभ आदि तथा क्षुधा- पिपासा जैसे अनेक सहज दोष विद्यमान रहते हैं. इसी तरह स्थूल शरीरमें भी अनेक तरहकी अशुद्धि तथा रोगादि दोष सहज पाये जाते हैं. (२) पापब- हुल प्रदेशोंमें जन्मग्रहण करनेसे या कभी तो गमनमात्रसे भी शास्त्रोंके अनुसार दोष लग जाते हैं. (३) कलिकालके कारण अनेक धार्मिक व्यवस्था लुप्त हो गयी हैं. अतः कालजन्य दोषोंको भी शास्त्रमें स्वीकारा गया है. (४) कभी-कभी जान- बूझकर या मोहवश हम ऐसे आचरण कर बैठते हैं जिन्हें लोक एवम् शास्त्र में निन्दित माना जाता है. (५) कभी-कभी अपरिहार्य स्थितिमें अनचाहे अन- जाने ऐसे गलत काम हमसे हो जाते हैं या हठात् करने पडते हैं जो लोक- वेदनिन्दित हों. इस तरह लोक तथा वेदों में गर्हित अनेक प्रकारके दोषोंसे जीव भरा हुआ रहता है. किन्तु ब्रह्मसम्बन्ध होनेपर ये दोष निवृत्त चाहे हों या न हों पर पुष्टिजीवद्वारा की जानेवाली भगवत्सेवामें बाधक नहीं हो सकते. ब्रह्मसम्बन्ध के अलावा अन्य किसी भी प्रकारसे इन दोषोंकी निवृत्ति सम्भव नहीं है. ब्रह्मसम्बन्धका वास्तविक स्वरूप असमर्पित वस्तुके त्याग करनेपर ही सम्पन्न होता है. कुल मिलाकर बात इतनी ही है कि जिसने आत्मनिवेदन किया है उसे अपने सारे कामकाज समर्पणपूर्वक ही चलाने चाहिये. किन्तु इसमें एक सावधानी अपेक्षित है कि हम ऐसी किसी भी वस्तुका, जिसका उपभोग प्रथम हमने कर लिया हो, देवाधिदेव भगवान् श्रीकृष्णको समर्पण न करें. हमारे प्रथम उपभोगके कारण वस्तु हमारी अर्धभुक्त या उच्छिष्ट हो जाती है और उसे श्रीकृष्णको समर्पित करनेकी कोई तुक नहीं है. अतः हमारे उप- भोग करनेसे पूर्व सभी वस्तुओंका समर्पण आवश्यक है. भगवदर्थ सभी वस्तुओंको समर्पित कर देनेपर आत्मनिवेदीके दैनन्दिन व्यवहार कैसे निभ पायेंगे ? और असमर्पितका भी उपभोग निषिद्ध माना गया है तो यह दोनों बाते कैसे शक्य होंगी ?